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नेट पर नंबर डालते ही किसान को पता चल जाएगा किस खेत को कौन-सी और कितनी खाद चाहिए

कैंसर के मरीजों में भी कमी आएगी यानी यूआईडी कैंसर रोकने का तोड़ बन सकता है।

bhaskar news | Last Modified - Dec 10, 2017, 06:54 AM IST

  • नेट पर नंबर डालते ही किसान को पता चल जाएगा किस खेत को कौन-सी और कितनी खाद चाहिए
    फाइल फोटो

    जालंधर. सूबे में पहली बार हर खेत का यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर (यूआईडी) होगा। किसान जैसे ही इंटरनेट पर यूआईडी डालेंगे पता चल जाएगा कि उनके खेत में कौन सा तत्व कम है अौर इसे पूरा करने को कौन सी खाद और कितनी डालनी चाहिए। केंद्र का प्रोजेक्ट हर राज्य में लागू होगा। कृषि विभाग का दावा है कि इससे पेस्टिसाइड खाद का अंंधाधुंध प्रयोग रुकेगा। सब्जियाें, अनाज पानी में केमिकल की मात्रा घटने से कैंसर के मरीजों में भी कमी आएगी यानी यूआईडी कैंसर रोकने का तोड़ बन सकता है।

    ग्रिड टेक्नोलाजी से खेतों का डाटा बैंक बनाना हुआ आसान
    ग्रिडटेक्नोलाजी के तहत कंप्यूटर से खेतों की मैपिंग हो चुकी है। मिट्टी के सैंपल जमा कराए जा रहे हैं। विभाग के पास 66 लैब हैं। अब सरकारी स्कूलों की लैब भी इस्तेमाल की जाएगी। हर खेत की जांच रिपोर्ट इंटरनेट पर भी डाली जाएगी। अभी किसान अंदाजे से खाद-पेस्टिसाइड का इस्तेमाल करते हैं तो कई गुना ज्यादा भी डाल देते हैं। -डॉ. नरेश गुलाटी, ट्रेनिंगब्लाॅक आॅफिसर, एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट

    मिट्टी की जांच के लिए सरकारी स्कूलों की लैब प्रयोग की जाएगी। यहां के बच्चों को ही ट्रेनिंग देकर मृदा जांच के लिए तैयार किया जाएगा। कृषि विभाग ने 250 से 300 प्रति सैंपल मेहनताना का भी प्रस्ताव रखा है। इस रकम से बच्चों के लिए स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने का सुझाव है। स्कूलों की स्वेच्छा से ही जांच की िजम्मेदारी दी जाएगी।

    खर्च सरकार उठाएगी
    सरकार अपने खर्च पर हर ढाई हेक्टेयर खेत से मिट्टी का सैंपल जमा करा रही है। एक बार सैंपल लेने पर 3 साल तक पता चलता रहेगा कि खेत में किस तत्व की कमी है। सूबे में करीब 9 लाख किसान परिवार और 42 लाख हेक्टेयर में खेती होती है। ये सारा एरिया कवर किया जाना है। किसान अमरीक सिंह और सतनाम सिंह ने कहा कि सटीक जानकारी का फायदा बहुत होगा। अभी प्राइवेट लैब का सहारा लेते हंै।

    मालवा क्षेत्र कैंसर से सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम ही कैंसर ट्रेन पड़ गया है। देश में एक हेक्टेयर जमीन पर औसतन 90 किलो यूरिया इस्तेमाल होती है लेकिन पंजाब के किसान एक फसल चक्र में ही 185 किलो तक यूरिया डाल देते हैं। इससे वातावरण तो खराब होता ही है, लागत भी बढ़ती है। इसके लिए ही कृषि विभाग ने सेटेलाइट से लिंक ग्रिड टेक्नोलाजी से खेतों की मैपिंग कराई है। अकेले जालंधर जिले में ही 5 साल में 1200 लोगों ने कैंसर होने पर सरकार से आर्थिक मदद मांगी है।

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Web Title: What Else The Farm Needs
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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