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एडीडास, रीबॉक, प्यूमा और नाइकी शूज़...यहां सब नकली उपलब्ध हैं, फर्स्ट कॉपी के नाम पर िमलेगा

3 वर्ष पहले
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ब्रांडेड प्रोडक्ट के नाम पर नकली माल बेचने वाली शहर में ठगी की कई दुकानें खुली हुई हैं। अगर आप भी कहीं ब्रांडेड शूज खरीदने के शौकीन हैं तो जरा ध्यान रखें। ऐसी दुकानों के बाहर हर ब्रांड के नकली जूते हैं। इतना ही नहीं, दुकानदारों ने दिखाने के लिए डिसप्ले में ओरिजनल के साथ-साथ ग्राहकों को ठगने के लिए अलग वैरायटी भी रखी हुई है। इसे देखकर पहचान करना बेहद मुश्किल हो सकता है कि कौन-सा असली है, और कौन-सा नकली। भास्कर रिपोर्टर ने शहर में 3 दिन के दौरान करीब 20 दुकानों में विजिट की। हर दुकानदार ने पहले तो ओरिजनल प्रोडक्ट दिखाए, जब थोड़ी बार्गेनिंग की तो तुरंत अन्य ब्रांड की फर्स्ट कॉपी के नाम पर दूसरे शूज दिखाने लगे।

‘कस्टम और एक्सपोर्ट शूज’ के नाम पर कर रहे फ्रॉड : सिटी में ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज के कई आउटलेट हैं। मगर उसके साथ मॉडल टाउन, रैणक बाजार, ज्योति चौक, भार्गव कैंप, अटारी बाजार, रेडक्रॉस मार्केट में कुछ दुकानदार कस्टमर को ब्रांडेड शूज के नाम पर फर्स्ट कॉपी, कस्टम का माल और एक्सपोर्ट के शूज कहकर धड़ल्ले से नाइक, प्यूमा, एडीडास, रीबॉक, स्कैचर, अंडरआर्मर, फिला, जॉर्डन, एसिक्स के शूज बेच रहे हैं। रेडक्रॉस मार्केट में तो कुछ दुकानदार ओरिजनल शूज की फर्स्ट कॉपी सरेआम बेच रहे हैं। किसी भी ब्रांड का कोई भी मॉडल यहां आसानी से मिल जाता है।

जािनए फ्रॉड का मैकेिनज़्म : मार्केट का 40 % शेयर डुप्लीकेट प्रोडक्ट्स का

400-500 करोड़ रुपए की लुधियाना की सालाना मार्केट का करीब 40 फीसदी शेयर डुप्लीकेट प्रोडक्ट्स का है। कस्टमर चार से पांच हजार रुपए की कीमत वाला सामान 1100 रुपए में खरीद कर खुश है।

4 से 5 मिनट में मिल जाएगा किसी भी ब्रांड का शूज
रैणक बाजार में कपड़े की कई ऐसी दुकानें हैं, जहां किसी भी ब्रांड का शूज मिल जाता है। रिपोर्टर के पूछने पर सेल्समैन ने पहले स्पोर्ट्स शूज नहीं होने की बात कही। फिर उसने बजट पूछा। बजट बताने पर उसने मोबाइल फोन पर अलग-अलग ब्रांड के 4 से 5 मॉडल दिखाए। मॉडल सिलेक्ट करने पर उसने शूज दे दिए। माडल टाउन स्थित एक शोरूम के सेल्समैन से जब शूज की ओरिजनेलिटी बारे पूछा तो उसने कहा कि उनके पास कस्टम से खरीदे हुए शूज हैं। ये ओरिजनल ही हैं। इसके अलावा वे ब्रांडेड कपंनियों से माल मंगवाते हैं। बिल मांगने पर उन्होंने क्लियर न बोल दी।

क्या है कस्टम माल
यह डुप्लीकेट शूज कस्टम ड्यूटी चोरी के भी हो सकते हैं क्योंकि एयरपोर्ट पर चाइना और थाईलैंड से असली ब्रांड की नकली कॉपी बनकर आती है। जोकि तीन कैटेगरी- फर्स्ट, सेकेंड और थर्ड कॉपी में डिवाइड होती है। बिना कस्टम ड्यूटी के आए ऐसे शूज की बिक्री सबसे ज्यादा दिल्ली और मुंबई में होती है। वहां से ऑलओवर इंडिया भेज दिया जाता है।

30% एफएमसीजी सेक्टर में नकली सामान बिक रहा है, लेकिन 80 फीसदी ग्राहक समझते हैं कि उत्पाद असली है। फिक्की कास्केड (अर्थव्यवस्था को नष्ट कर रही तस्करी और जालसाजी की गतिविधियों के खिलाफ कमेटी) की रिपोर्ट में ये बात कही गई है।

डुप्लीकेट प्रोडक्ट्स इन डिमांड
ऑनलाइन भी है डुप्लीकेट...ऑनलाइन शॉपिंग के इस दौर में किसी सामान को छूना या उसका वास्तविक अनुभव कर पाना संभव नहीं है। यह बायर के लिए तो एक समस्या की तरह है, लेकिन ऑनलाइन मार्केट प्लेस में बैठे लोगों के लिए नकली सामान बेचने का बड़ा जरिया भी है। कई बड़ी साइट्स पर मिलते-जुलते नाम वाले प्रॉडक्ट बिकते हैं। यहां तक कि कुछ वेबसाइट्स तो बस खुलती ही लोगों को लूटने के लिए हैं।

यहां सब नकली है
जानकारों के मुताबिक दुकानदार जिन शू्ज को फर्स्ट कहकर बेचते हैं, दरअसल वे डुप्लीकेट ही होते हैं। फर्स्ट, सेकेंड, थर्ड कॉपी, कस्टम या एक्सपोर्ट का कोई सामान नहीं होता। कंपनी के शूज की टाइम लिमिट होती है। कंपनी जब शूज (आर्टिकल) तैयार करती है तो उसके सोल की मियाद तय कर दी जाती है। जब स्टॉक समय रहते सेल नहीं होता तो उस आर्टिकल को ब्रांड के फैक्टरी आउटलेट स्टोर पर भेज देते हैं। अधिकतर लोगों को कंपनी के इन नियमों का पता नहीं होता, जिसका फायदा उठा दुकानदार एक्सपोर्ट या फर्स्ट कॉपी का माल कहकर बेच देते हैं।

सेल गिर रही है, 40 फीसदी काम कम हुआ
स्पोर्ट्स मार्केट में स्पोर्ट्स शूज के कारोबारी मनोज अरोड़ा ने कहा कि ब्रांडेड शूज की डुप्लीकेट कॉपी आने के कारण काम को फर्क पड़ा। पहले जो लोग ब्रांडेड शूूज नहीं खरीद पाते थे, वे स्पोर्ट्स मार्केट से शूज खरीदते थे। जबसे ब्रांड की कॉपी मिलनी शुरू हुई है 40 % काम कम हो गया है।

ऐसे करें वेरिफाई
ब्रांडेड कंपनी जब शूज तैयार करती है तो उसमें मॉडल का बार कोड और आर्टिकल नंबर शूज पर प्रिंट करती है। इससे शूज की ओरिजनेलिटी चेक की जा सकती है। हर शूज पर अलग-अलग बार कोड लिखा होता है। अगर आपको किसी शूज की ओरिजनेलिटी के बारे में पता करना है तो शूज मॉडल को कंपनी की साइट पर जा कर चेक करें आप को ओरिजिनल प्राइस भी मिल जाएगा या दुकानदार को बोलें।

माडल टाउन के शोरूम मालिक हरीश सहगल ने बताया कि ब्रांड चाहे कपड़े या शूज का, जब भी किसी प्रोडक्ट का डुप्लीकेट मार्केट में आता है तो फर्क ब्रांड को ही पड़ता है। मार्केट में पहले शूज की कॉपी बहुत कम देखने को मिलती थी लेकिन जबसे कपड़े की दुकानों में शूज मिलने शुरू हुए हैं, तबसे डुप्लीकेट प्रोडक्ट ओरिजनल पर हावी होते जा रहे हैं।

जािनए...क्या है कानून और कैसे बचें

कंज्यूमर फोरम में जाएं
आरोपियों के खिलाफ कॉपीराइट एक्ट के तहत ही कार्रवाई होती है, जिसमें सजा का सख्त प्रावधान नहीं है। इसी वजह से डुप्लीकेसी लगातार बढ़ती जा रही है। किसी भी उत्पाद के नकली होने के संदेह पर उसकी प्रयोगशाला में जांच करवाएं। परीक्षण में यदि सैंपल फेल होता है तो तत्काल उपभोक्ता फोरम में उक्त कंपनी के नाम पर केस करें। मुकदमे में खर्च हुई राशि, मानसिक प्रताड़ना और उत्पाद की राशि का खर्च कोर्ट उक्त कंपनी से वसूल कर ग्राहक को दिलाता है।

1. अगर डिस्काउंट एमआरपी की तुलना में 70-80 फीसदी कम है तो समझ लें कि आपके द्वारा खरीदा गया प्रोडक्ट नकली है।

2. पैकेजिंग खराब है, बॉक्स कटा-फटा है या देखने में बिलकुल घटिया हो तो या प्रोडक्ट बिना पैकिंग के मिल रहा है तो ये निश्चित रूप से नकली है।

4. कंपनी सामान पर कोड, सीरियल नंबर, मॉडल नंबर, ट्रेडमार्क और पेटेंट संबंधी सूचना जैसे बहुत से विवरण छापती है। नकली उत्पाद कंपनियां इनमें से बहुत-सी जानकारी कॉपी करना भूल जाती हैं। आप इन नंबर को चेक करके प्रोडक्ट के असली-नकली होने का पता लगा सकते हैं। स्पेलिंग की तरह नकली प्रोडक्ट पर लोगो, ब्रांड का नाम और ट्रेडमार्क भी धुंधला देखा जा सकता है।

ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान रखें ध्यान
1. अगर ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं तो वेबसाइट की सच्चाई पर गौर करें। अगर वेबसाइट ही फर्जी है तो प्रोडक्ट निश्चित रूप से नकली होगा। यूआरएल सावधानी से चेक करें और देखें कि वहां ताले का निशान बना है या नहीं। असली वेबसाइट https से शुरू होगी, जहां आपका पेमेंट करना सिक्योर होगा, बजाय http के। इन दो वेबसाइट पर यूआरएल का एड्रेस चिपकाकर भी आप उसकी सच्चाई चेक कर सकते है। www.scamadviser.com और whois. domaintools.com। यह आपको बता देगा कि साइट सही है या नहीं।

ऐसे बचें धोखे से
3. गलत स्पेलिंग या ग्रामर की गलतियां ब्रांड के साथ नामुमकिन हैं। कोई कंपनी कभी अपना नाम गलत नहीं लिखती। कहीं नाम गलत लिखा है तो प्रोडक्ट नकली है।

2. आपने जो सामान खरीदा है, उसमें मौजूद एक्सेसरीज के बारे में पैक पर जिक्र होता है. अगर अंदर कोई सामान नहीं है तो वह नकली उत्पाद की निशानी हो सकता है। इनमें इंस्ट्रक्शन मैनुअल, वारंटी कार्ड, वायर, प्लग और अन्य चीजें शामिल हैं। अगर कुछ भी गायब है तो आप सेलर या डिस्ट्रीब्यूटर को फोन करके इसकी जानकारी दे सकते हैं। अगर शॉपिंग ऑनलाइन हुई है तो बॉक्स खोलने की पूरी प्रक्रिया का वीडियो बना लें, अगर प्रोडक्ट डुप्लीकेट हो तो इससे आपको अपना पक्ष रखने में बहुत मदद मिलेगी।

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