गुरु पूर्णिमा विशेष / सच्चा सौदा के पहले गुरु भी कभी राधा स्वामी थे, 1861 में आगरा से हुई थी शुरुआत



an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
X
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima
an historical development story of Radha Soami Satsang, Guru Purnima

  • 15 फरवरी सन 1861 को शिव दयाल सिंह सेठ ने आगरा से की थी राधा स्वामी सत्संग की शुरुआत
  • पहले गुरु के निधन के 11 साल बाद 1889 में सेना से रिटायर उनके शिष्य जयमल सिंह ने पंजाब में ब्यास नदी के किनारे  नामदान देना शुरू कर दिया
  • राधा स्वामी दिनोद, सावन कृपाल मिशन और डेरा सच्चा सौदा की जड़ें भी इसी विचारधारा से

Dainik Bhaskar

Jul 16, 2019, 11:46 AM IST

जालंधर. आज गुरु पूर्णिमा है यानि गुरुपूजा दिवस। देश-दुनिया के तमाम धार्मिक और शैक्षणिक स्थानों पर आज गुरुपूजा को बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। पंजाब और हरियाणा में छोटे-बड़े धार्मिक डेरों की संख्या हजारों में है। इनमें से पंजाब का राधा स्वामी सत्संग ब्यास और हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा एक ही गुरु के शिष्यों के द्वारा स्थापित किए गए थे, या यूं कहिए कि डेरा सच्चा सौदा की जड़ें राधा स्वामी सत्संग में ही समाहित हैं तो कोई गलत नहीं होगा।

 

आज गुरुपूर्णिमा के खास मौके पर हम आपको रू-ब-रू करा रहे हैं राधा स्वामी सत्संग के उद्भव और विकास की कहानी से। आइए जानते हैं एक अनूठा इतिहास...

 

राधास्वामी मत के संस्थापक परम पुरुष पूरण धनी हुजूर स्वामी शिव दयाल सिंह सेठ थे। उनका जन्म 24 अगस्त 1818 को उत्तर प्रदेश के आगरा स्थित पन्नी गली में हुआ था। वे बचपन से ही शब्द योग के अभ्यास में लीन रहते थे। बरसों के अनुभवों के आधार पर 15 फरवरी सन 1861 को उन्होंने राधा स्वामी सत्संग की शुरुआत की। इस सत्संग का नाम राधा स्वामी रखने के पीछे कई मान्यताएं हैं, जैसे एक तो राधा स्वामी यानि भगवान श्री कृष्ण और दूसरा यह भी कहा जाता है कि इस मत के संस्थापक शिव दयाल की अर्धांगिनी का नाम भी राधा था। हालांकि इस मत पर थोड़ा संशय है। खैर जो भी हो, वा सब इतिहास की बातें हैं। मूल बात यही है कि राधा स्वामी के नाम से प्रभु का सिमरन आगरा से शुरू हुआ था। इस मत के सबसे पहले गुरु बाबा शिव दयाल 15 जून 1878 को अपनी सांसारिक भूमिका पूरी करने के बाद प्रभुचरणों में लीन हो गए।

 

इसके 11 साल बाद 1889 में सेना से रिटायर उनके शिष्य जयमल सिंह ने पंजाब आकर यहां ब्यास नदी के किनारे कुटिया बनाई और भक्तों को नामदान देना शुरू कर दिया। 1903 तक उन्होंने राधा स्वामी के नाम से सत्संग किया। भक्तों की संख्या बढ़ती ही चली गई। आखिर 1839 में जन्मे बाबा जयमल सिंह भी लगभग 64 साल की आयु में भक्तों से विदा ले गए, जिसके बाद सत्संग की कमान उनके शिष्य सावन सिंह ने संभाली। 27 जुलाई 1958 को जन्मे सावन सिंह भी 2 अप्रैल 1948 को स्वधाम चले गए। इसके बाद राधा स्वामी सत्संग ब्यास के चौथे गुरु के रूप में सावन सिंह के शिष्य बाबा जगत सिंह ने जिम्मेदारी संभाली, जिसे वह सिर्फ और सिर्फ 3 साल ही निभा सके।

 

जब राधा स्वामी सत्संग से निकले 3 अलग मत...

बाबा सावन सिंह के गद्दीनशीं होते हुए राधा स्वामी सत्संग तीन अलग-अलग विचारधाराओं में विभाजित हो गया। 1925 में सावन सिंह के शिष्य तारा चंद ने हरियाणा के भिवानी में राधा स्वामी सत्संग की शुरुआत की, लेकिन एक अलग नाम के साथ। तब से भिवानी में राधा स्वामी दिनोद के नाम से एक बड़ी धार्मिक संस्था चल रही है। इसके बाद 1948 में जहां दूसरे शिष्य कृपाल सिंह ने दिल्ली में सवान कृपाल मिशन की शुरुआत की, वहीं 2 अप्रैल 1949 को एक और शिष्य बाब खेमामल, जिन्हें हम बाबा मस्ताना शाह के नाम से भी जानते हैं, ने हरियाणा के सिरसा में सच्चा सौदा के नाम से छोटी सी कुटिया में सत्संग शुरू किया था।

 

राम रहीम के गुरु ने कही थी ये बात

आज डेरा सच्चा सौदा सिरसा के विकास और पतन की कहानी किसी छिपी नहीं है। एक पुरानी बात है कि जब शाह सतनाम सिंह के बाद गुरमीत राम रहीम सिंह गद्दी पर बैठे थे तो गुरु शाह सतनाम सिंह ने इस परम्परा को बिजनेस से नहीं जोड़ने और ऐसा नहीं करने यानि गुरु आज्ञा नहीं मानने पर डेरे के बिखर जाने की भविष्यवाणी की थी। ध्यान रहे कि डेरा सच्चा सौदा सिरसा के मौजूदा चीफ गुरमीत राम रहीम सिंह पर कई तरह के केस चल रहे हैं और इनमें से साध्वियों के यौन शोषण के दो मामलों के अलावा पत्राकार रामचंद्र छत्रपति के मर्डर केस में वह रोहतक केे सुनारियां स्थित जिला जेल में सजा काट रहे हैं।

 

...लेकिन ब्यास में चलता रहा राधा स्वामी सत्संग का कारवां

तीन अलग मत निकल जाने के बावजूद आज भी राधा स्वामी सत्संग का ब्यास में वह सफर जारी है, जो यहां ब्यास नदी के किनारे बाबा जयमल सिंह ने शुरू किया था। जुलाई 1884 में जन्मे बाबा जगत सिंह भी बाबा सावन सिंह के ही शिष्य थे। उन्होंने 1951 में बाबा सावन सिंह के देहावसान के बाद सत्संग की परम्परा को जारी रखा, मगर 23 अक्टूबर 1951 को वह भी सांसारिक भूमिका पूरी कर गए। इसके बाद 1990 तक बाबा चरण सिंह इस मत के पांचवें गुुरु के रूप में भक्तों को नामदान देते रहे। उनका जन्म 12 दिसम्बर 1916 को पंजाब में ही सिख मान्यता वाले एक ग्रेवाल परिवार में हुआ था। बाबा चरण सिंह के बाद 1990 से अब तक मोगा में जन्मे-पले उनके भानजे गुरिंदर सिंह इस परम्परा को न सिर्फ जारी रखे हुए हैं, बल्कि इतना बढ़ा दिया कि आज देश-दुनिया में जब भी कहीं राधा स्वामी सत्संग ब्यास का नाम आता है तो शीष अदब से झुक जाता है। इस विचारधारा से करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना