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  • For the first time, read Lohri from the eyes of famous celebrities ... who wrote, lived and sang on this festival

लोहड़ी दा पिंड / पहली बार पढ़िए नामचीन हस्तियों की नजर से लोहड़ी... जिन्होंने इस पर्व पर लिखा, जिया और गाया

बरसों से मनाए जा रहे मेल-मिलाप और प्रेम का पर्व । बरसों से मनाए जा रहे मेल-मिलाप और प्रेम का पर्व ।
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बरसों से मनाए जा रहे मेल-मिलाप और प्रेम का पर्व ।बरसों से मनाए जा रहे मेल-मिलाप और प्रेम का पर्व ।

Dainik Bhaskar

Jan 13, 2020, 02:06 PM IST
चंडीगढ़. लोहड़ी एक ऐसा त्योहार है जो पूरे पंजाब को एक पिंड की तरह प्यार में पिरो देता है। इसमें इतनी ताकत है कि लोग सभी गिले-शिकवे भूल एक हो जाते हैं। सामाजिक भेदभाव, जात-पात और धर्म जैसे शब्द यहां गौण हो जातेे हैं। हर ओर केवल उल्लास, उमंग और खुशियां ही नजर आती हैं। हर आंगन में गिद्दा और भंगड़ा डाला जाता है। लोहड़ी माघ के स्वागत और पौष महीने की आखिरी रात को मनाई जाती है। वैशाखी की तरह लोहड़ी का संबंध भी गांव, फसल और मौसम से है। पौष की कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए भाईचारे की सांझ और अग्नि का सुकून लेने को यह त्योहार मनाया जाता है। इसी कारण यह त्योहार पंजाब की सभ्यता का प्रतीक बन गया है। इसी को साकार करने की कोशिश की है भास्कर ने। साथ ही नामचीन हस्तियों ने विशेषतौर पर लोहड़ी पर भास्कर के पाठकों के लिए लिखा है। लंबे समय बाद आप इमरोज़ को भी पढ़िए, अमृता प्रीतम की बहू अलका की कलम से।  
  • देसी खाएं, स्वदेशी बचाएं और लोहड़ी ऐसे मनाएं वैरी भी सज्जन बन जाएं

    देसी खाएं, स्वदेशी बचाएं और लोहड़ी ऐसे मनाएं वैरी भी सज्जन बन जाएं

    पद्मश्री पूरण चंद वडाली ( सूफी गायक)

    इस ठंडे मौसम का अपना ही आनंद है, अंदाज है। इसी में चार चांद लगाने आया है हमारा रिवायती त्योहार लोहड़ी। वैसे तो इसे पूरा देश मनाता है लेकिन त्योहारों को मनाने का हम पंजाबियों का अपना ही रुतबा और रुआब है। भले ही बदलाव के दौर ने इसमें से बहुत कुछ खारिज कर दिया है, लेकिन फिर भी हमारी लोहड़ी तो हमारी ही है। परिवार और समाज को जोड़कर रखने वाले इस त्योहार को हम मनाते नहीं बल्कि जीते हैं। मुझे आज भी बचपन की लोहड़ी याद है। शाम को लोग अपने घरों में भुग्गा जलाते थे। हरेक अपने घर से चावल, तिल, गुड़, मक्की के दाने आदि लेकर आता। गीत-संगीत का दौर चलता। बड़े-बुजुर्ग किस्से-कहानियां सुनाते। मायके आई बेटियां और बहुएं मिलकर गिद्दा डालतीं, घर-आंगन खिलखिलाहट और पकवानों की खुशबू से सराबोर रहता। रातभर खुशी का आलम रहता, किसी से कोई वैर-विरोध नहीं। देसी खाएं, देसी उड़ाएं और स्वदेशी बचाएं। लोहड़ी ऐसे मनाएं कि वैरी भी सज्जन बन जाएं। मेरी अपील है मन की खटास मिटाकर परंपरागत तरीके से लोहड़ी मनाएं। 

    संदेश... समाज को जोड़ने का भाव लेकर मनाए जाने वाले लोहड़ी के पर्व पर हम संकल्प लें कि एक दूसरे के प्रति वैर के भाव को अग्निभेंट कर प्रेम व सौहार्द की लोहड़ी मनाएंगे।

  • बेटियों की लोहड़ी तो मनाते हैं पर हमें जमीनी स्तर पर भी बदलने की जरूरत

    बेटियों की लोहड़ी तो मनाते हैं पर हमें जमीनी स्तर पर भी बदलने की जरूरत

    गुरदास मान (पंजाबी गायक)

    गुरबाणी में भी लिखा है, ‘सो क्यों मंदा आखिए जित जम्मे राजान’ अर्थात जिसने राजाओं तक को जन्म दिया है उसे बुरा नहीं कहना चाहिए। समय बदल रहा है। बेटियों की लोहड़ी मनाने पर भी हमारी मानसिकता उतनी नहीं बदली है, जितना आज के युग में समाज में परिवर्तन आना चाहिए। मैं औरत को देवी का रूप मानता हूं और नतमस्तक होता हूं। उसमें जितनी नम्रता है उतना ही वह जरूरत पड़ने पर चंडी का रूप भी ले सकती है। परमात्मा ने उसे तीसरी आंख दे रखी है, उसे अच्छे बुरे की पहचान बड़ी जल्दी हो जाती है। किसी ने क्या खूब गीत लिखा है, ‘मां हुंदी ऐ मां वे दुनिया वालियो, मां दी पूजा रब्ब दी पूजा, वह महिला है। लेखक ने उसका बहुत अच्छे से वर्णन किया है। सहन शक्ति जो औरत के पास है, शायद किसी के पास नहीं है। इस बात से मैं दुखी हूं कि एक तरफ हम बेटियों की लोहड़ी मनाते हैं। दूसरी तरफ पंजाब में अभी भी भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। हम सबको लड़का हो या लड़की उसे समान रूप से ही देखना चाहिए। समाज में भ्रूण हत्या को लेकर लोगों को समय-समय पर जागरूक करने की भी जरूरत है।

    उपदेश देने वाली बातें नहीं, लड़का-लड़की में जमीनी स्तर पर भेद दूर करना जरूरी। अभी भी जारी भ्रूण हत्याएं रोकने के लिए लोगों को समय-समय पर जागरूक करने की जरूरत है। 

  • बंटवारे से पहले मनाई वो लोहड़ी आज भी याद है, मेरी पहली और आखिरी थी

    बंटवारे से पहले मनाई वो लोहड़ी आज भी याद है, मेरी पहली और आखिरी थी

    मेरे गांव का नाम एकलगड्डा था। तरनतारन से 5 कोस (10.05 किलोमीटर) दूर होगा। उम्र उस समय 12 साल रही होगी। दोस्त सुच्चा सिंह, रुड सिंह व कपूर सिंह मेरे घर आए और लोहड़ी मांगने जाना है। मैंने पूछा कौन सी लोहड़ी, कैसी लोहड़ी। दोस्त सुच्चा सिंह मुझे गले लगाते हुए बोला ‘अपनी लोहड़ी’। मैं तैयार हुआ और दोस्तों के साथ चल पड़ा। गांव में रौनक थी। लोहड़ी के गीत गूंज रहे थे। दोस्तों ने गीत सिखाया था ‘सुंदर मुंदरिए...हो, तेरा कौण विचारा..हो, दुल्ला भट्टी वाला...हो’, मुझे आज भी याद है। मेरे गांव में ज्यादातर सिख परिवार थे। हम लोहड़ी मांग रहे थे। सब एक थे। थैला भर गुड़, रेवड़ी, मक्की के दाने हो गए थे, मैं खुश था पर खुदा को कुछ और मंजूर था। क्या मालूम था ये पहली और आखिरी लोहड़ी थी। 7-8 महीने बाद बंटवारे का बिगुल बजा। हालात बिगड़े। मुसलमान परिवार गांव खिलचियां में बने कैंप में भेजे गए। पता चला पाकिस्तान जाना पड़ेगा। दोस्त रो पड़े। हम पाक में शब्बी गांव में आकर बस गए। 73 साल हो चुके हैं। आज भी लोहड़ी मनाना याद है। यह कहते बरकत अली की आंखों में आंसू आ गए।

    लोहड़ी तेरी और मेरी न होकर अपनी लोहड़ी के रूप में मनाई जाए। सभी के लिए लोहड़ी सुख-समृृद्धि लेकर आए।
    -बरकत पाक पंजाब में कई वर्षों तक मुखिया रहे हैं।

  • मन में कसक है कि लोहड़ी पर कोई गीत न गा पाया, कोई लिख दे तो गाऊं

    मन में कसक है कि लोहड़ी पर कोई गीत न गा पाया, कोई लिख दे तो गाऊं

    जसपाल सिंह (बॉलीवुड गायक)

    ‘श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करें मीरा को यंू ही बदनाम...’, ‘गीत गाता चल रे साथी गुनगुनाता चल...’,“सावन को आने दो...’ जैसे गीतों ने भले ही मुझे गायकी की दुनिया में पहचान दी लेकिन मेरे मन में अपनी मिट्टी से जुड़े लोहड़ी के गीत न गा पाने की कसक है। भले ही मैं उम्र के आखिरी पड़ाव पर हूं पर तमन्ना है कोई लोहड़ी के गीत लिख दे मैं उसे गाऊंगा। कभी-कभार अमृतसर जाता हूं। जसपाल बताते हैं कि बचपन में हम आसपास के लोगों के साथ मिलकर लाेहड़ी सेलिब्रेट करते थे। लड़के भी टोली बनाकर एक चादर ले लेते थे। 4 बच्चे उसके 4 कोने पकड़ते और साथ में एक टोकरी भी। सबको पता होता था कि वानर सेना आने वाली है इसलिए सब लोहड़ी देने का अच्छा इंतजाम करके रखते थे। कहीं किसी ने उम्मीद से कम दिया तो फिर उसकी खैर नहीं। उसके घर के सामने कम से कम 15 मिनट गाते- हुक्का वी हुक्का ऐह घर भुक्खा। ऐसी अपनी दुर्गत कोई नहीं करवाना चाहता था। मेरी मां, पड़ोस की चाची, ताई और मौसी सज धजकर लोहड़ी बांटने जाती थीं। फिर रात में लोहड़ी जलाई जाती थी।

    लोहड़ी परंपरा और सेलिब्रेशन का त्योहार है। रिश्तों की मजबूती और भाईचारे के प्रतीक इस पर्व में सभी का मंगल हो। किसानों के खेत सोना उगलें। रौनकें यूं ही लगती रहें।

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