श्रद्धांजलि / जब अंग्रेजों के लिए 10 हजार पठानों से भिड़ गए थे 21 सिख, शहादत के बाद मिला था विक्टोरिया क्रॉस



फिरोजपुर में ऐतिहासिक गुरुद्वारा सारागढ़ी। फिरोजपुर में ऐतिहासिक गुरुद्वारा सारागढ़ी।
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  • 19वीं शताब्दी में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत का एक छोटा-सा गांव था सारागढ़ी, 12 सितंबर 1897 को हुई थी लड़ाई
  • शहीद सिखों की याद में बनाए गए तीन गुरुद्वारे, एक फिरोजपुर में तो दूसरा है अमृतसर में
  • 1911 में जॉर्ज पंचम ने पहली बार घोषणा की कि भारतीय सैनिक भी विक्टोरिया क्रॉस जीतने के हकदार होंगे

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2019, 07:03 PM IST

जालंधर (बलराज सिंह). 12 सितंबर 1897 का वह दिन हम कैसे भुला सकते हैं, जब महज 21 सिख जवानों ने 10 हजार पठानों से लोहा लेते-लेते अपने प्राण वार दिए थे। प्राणों की यह आहूति इन वीरों ने उस अंग्रेजी हुकूमत के लिए दी थी, जिससे हम लगभग 3 सदी बाद आजाद हो पाए। इसी शहादत को सम्मान देते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें विक्टोरिया क्रॉस से नवाजा था। बता दें कि 19वीं शताब्दी में सारागढ़ी उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत का एक छोटा-सा गांव था, जो आज यह पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के पास पेशावर के बाहर कुछ दूरी पर स्थित है। बाद में 1902 में इन वीरों की याद में बनाए गए तीन गुरुद्वारों का निर्माण (एक फिरोजपुर में तो दूसरा अमृतसर में) किया।

 

यह है कहानी?
इतिहास के अनुसार 3 सितंबर 1897 को सुबह 8 बजे सारागढ़ी किले के संतरी ने दौड़कर अंदर खबर दी कि 10 हजार के करीब पठानों का एक लश्कर झंडों और भालों के साथ उत्तर की तरफ से सारागढ़ी किले की तरफ बढ़ रहा है। संतरी को फौरन अंदर बुला सैनिकों के नेता हवलदार ईशेर सिंह ने सिग्नलमैन गुरमुख सिंह को आदेश दिया कि पास के फोर्ट लॉकहार्ट में तैनात अंग्रेज अफसरों को तुरंत हालात से अवगत करा अगला आदेश जाना जाए। कर्नल हॉटन ने अपनी जगह पर डटे रहने का आदेश दिया।

 

किले को तीन तरफ से घेर लिया गया

एक घंटे के अंदर किले को तीन तरफ से घेर लिया गया और ओरकजईयों का एक सैनिक हाथ में सफेद झंडा लिए किले की तरफ बढ़ा। उसने चिल्ला कर कहा, "हमारा तुमसे कोई झगड़ा नहीं है। हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है। तुम तादाद में बहुत कम हो, मारे जाओगे। हमारे सामने हथियार डाल दो। हम तुम्हारा ख्याल रखेंगे और तुमको यहां से सुरक्षित निकल जाने का रास्ता देंगे।" बताया जाता है कि ब्रिटिश फौज के मेजर जनरल जेम्स लंट द्वारा किए वर्णन के मुताबिक "ईशेर सिंह ने इस पेशकश का जवाब ओरकजईयों की ही भाषा पश्तो में गालीभरे लहजे में कहा कि ये अंग्रेजों की नहीं महाराजा रणजीत सिंह की जमीन है और हम इसकी आखिरी सांस तक रक्षा करेंगे"।

 

सारागढ़ी लड़ाई पर बहुचर्चित किताब 'द आइकॉनिक बैटल ऑफ सारागढ़ी' लिखने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह बताते हैं, "हवलदार ईशेर सिंह ने अपने जवानों को आदेश दिया कि गोली न चलाई जाए और पठानों को आगे आने दिया जाए और उन पर तभी फायरिंग की जाए, जब वो फायरिंग रेंज में आ जाएं"। सिख जवानों के पास सिंगल शॉट 'मार्टिनी हेनरी .303' राइफलें थी, जो 1 मिनट में 10 राउंड फायर कर सकती थीं। हर सैनिक के पास 400 गोलियां थी, 100 जेबों में और 300 रिजर्व में। उन्होंने पठानों को चुन-चुनकर निशाना बनाना शुरू कर दिया।

 

घास में लगा दी थी पठानों ने आग

पहले एक घंटे में ही पठानों के 60 सैनिक मारे जा चुके थे। सिखों की तरफ से सिपाही भगवान सिंह की मौत हो चुकी थी और नायक लाल सिंह बुरी तरह से घायल हो चुके थे। पहले हमले में नाकाम पठान बिना किसी मकसद के इधर-उधर दौड़ने लगे, लेकिन उन्होंने सिखों पर गोली चलानी बंद नहीं की। उत्तर की तरफ से चलने वाली तेज हवा का सहारा लेते हुए पठानों ने घास में आग लगा दी और धुएं का सहारा लेते हुए किले की दीवार के बिल्कुल पास चले आए, लेकिन सिखों की निशाना लेकर की जा रही सटीक फायरिंग की वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा।

 

उधर, घायलों की संख्या के बढ़ते सिख खेमे से सिपाही बूटा सिंह और सुंदर सिंह वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लॉकहार्ट किले से रॉयल आयरिश राइफल्स के 13 जवानों ने आगे बढ़कर सारागढ़ी पर मौजूद जवानों की मदद करनी चाही, लेकिन संख्या काफी कम होने के साथ-साथ एक और कारण से अपने किले वापस लौट गए। दो पठान मुख्य किले के दाहिने हिस्से की दीवार के ठीक नीचे पहुंच गए और तेज छुरों से दीवार की नेह और नीचे के पत्थरों के पलास्टर को उखाड़ना शुरू कर दिया। इसी बीच ईशेर सिंह अपने चार लोगों को किले के मुख्य हॉल में ले आए, जबकि खुद ऊपर से फायरिंग करते रहे। बावजूद इसके पठान किले की दीवार के निचले हिस्से में सात फीट बड़ा छेद करने में कामयाब हो गए। पठानों ने एक और तरकीब निकाली कि चारपाइयों को अपने सिर पर उठा उनकी आड़ में आगे बढ़ने लगे।

 

यह सब देख रहे गुलिस्तां किले के कमांडर मेजर दे वोए ने सारागढ़ी के जवानों को सिग्नल भी भेजे, लेकिन सिग्नलमैन गुरमुख सिंह लॉकहार्ट से आ रहे सिग्नलों को पढ़ने में व्यस्त थे। मदद की कोशिश नाकाम हुई तो इसी बीच लांस नायक चांद सिंह के साथ मुख्य ब्लॉक में तैनात तीन जवान साहिब सिंह, जीवन सिंह और दया सिंह मारे गए। अंदर घुसे पठानों को गोली मारकर और संगीन घुसाकर मार दिया गया, लेकिन बाहर किनारों पर कोई सिख तैनात न होने की वजह से पठान बांस की बनी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ आए।


लेफ्टिनेंट मन और कर्नल हॉटन ने एक बार फिर 78 सैनिकों के साथ सारागढ़ी में घिर चुके अपने साथियों की मदद के लिए फायरिंग शुरू की। अब सारागढ़ी किला गिर चुका था। इसी बीच आखिरी संदेश भेज गुरमुख सिंह राइफल उठा मुख्य ब्लॉक में लड़ रहे बचे-खुचे साथियों के पास पहुंचे। तब तक ईशेर सिंह समेत सिख टुकड़ी के अधिकतर जवान मारे जा चुके थे। पठानों की लाशें भी चारों तरफ बिखरी पड़ी थी। बनाया गया छेद और जल चुका मुख्य द्वार पठानों की लाशों से अटा पड़ा था। आखिर में नायक लाल सिंह, गुरमुख सिंह और एक असैनिक दाद बच गए, मगर इनमें से बुरी तरह जख्मी लाल सिंह चल नहीं पा रहे थे। वह एक जगह पड़े-पड़े लगातार पठानों को धराशायी करते रहे। जब अंत समय आया तो कानून तोड़ दाद ने अपनी सांस थमने से पहले पांच पठानों को मार डाला।

 

आखिर में अकेले बचे गुरमुख सिंह जवानों के सोने वाले कमरे की तरफ पोजिशन ले बीस पठानों को मारा। पठानों ने लड़ाई ख्त्म करने के लिए पूरे किले में आग लगा दी। गैरबराबरी की ये लड़ाई करीब 7 घंटे तक चली, जिसमें सिखों की तरफ से 22 और पठानों की तरफ से 180 से 200 के बीच लोग मारे गए। कम से कम 600 लोग घायल भी हुए। 14 सितंबर को कोहाट से 9 माउंटेन बैटरी वहां अंग्रेजों की मदद के लिए पहुंची तो पठान अभी भी सारागढ़ी के क़िले में मौजूद थे। तोप के गोलों के साथ हमला करते हुए अंग्रेज सैनिकों ने सारागढ़ी को पठानों के चंगुल से छुड़ा लिया।

 

ब्रिटिश संसद ने खड़े हो किया सम्मान, अब बन चुकी फिल्म 'केसरी'
इस लड़ाई को दुनिया के सबसे बड़े 'लास्ट स्टैंड्स' में जगह दी गई। जब इन सिखों के बलिदान की खबर लंदन पहुंची तो उस समय ब्रिटिश संसद का सत्र चल रहा था। सभी सदस्यों ने खड़े होकर इन सैनिकों को 'स्टैंडिंग ओवेशन' दिया। उधर महारानी विक्टोरिया को इसकी खबर मिली तो उन्होंने सभी 21 सैनिकों को इंडियन ऑर्डर ऑफ मैरिट देने का ऐलान किया। ये उस समय तक भारतियों को मिलने वाला सबसे बड़ा वीरता पदक था जो तब के विक्टोरिया क्रॉस और आज के परमवीर चक्र के बराबर था। तब तक विक्टोरिया क्राॅस सिर्फ अंग्रेज सैनिकों को ही मिल सकता था और वो भी सिर्फ जीवित सैनिकों को। 1911 में जॉर्ज पंचम ने पहली बार घोषणा की कि भारतीय सैनिक भी विक्टोरिया क्रॉस जीतने के हकदार होंगे। लड़ाई के बाद मेजर जनरल यीटमैन बिग्स ने कहा, "21 सिख सैनिकों की बहादुरी और शहादत को ब्रिटिश सैनिक इतिहास में हमेशा स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।" अब वीरता की इस महान कहानी पर केसरी नामक फिल्म बेहद चर्चित रही है।

 

 

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