एक दिन पहले डीसी ने कहा-गर्भवतियों को जच्चा-बच्चा की सुविधाएं बताएं

2 वर्ष पहले
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सिविल अस्पताल में एक महीने से करीब 100 से अधिक बच्चों को निक्कू वार्ड बंद होने के कारण प्राइवेट अस्पतालों में रेफर किया गया है। निक्कू वार्ड में प्रीमेच्योर और नवजन्मे बच्चाें काे कोई बीमारी या परेशानी हो तो उन्हें 20 से 25 डिग्री तापमान में मशीनों में रखा जाता है। कई बच्चों को स्वाभाविक तौर पर पैदा होते ही पीलिया हो जाता है। वहीं, सिविल अस्पताल में अपनी प|ी की डिलीवरी करवाने आए तरसेम सिंह ने बताया कि चार दिन पहले प|ी ने बेटे को जन्म दिया है। पैदा होने के बाद बच्चे को एक दिन बाद पीलिया हो गया। सिविल अस्पताल के डॉक्टरों के कहने पर उसे प्राइवेट अस्पताल में डाॅक्टराें की निगरानी में रखा गया है। प्राइवेट अस्पताल में रोजाना 3 से 4 हजार रुपए जमा करवाने पड़ रहे हैं।

नर्सिंग स्टाफ के कमरे में एसी, वार्ड्स में कूलर तक नहीं
प्रभमीत सिंह | जालंधर

सिविल अस्पताल के जच्चा-बच्चा वार्ड में बच्चों के मां-बाप के लिए भीषण गर्मी में दोहरा दुख पैदा हो गया है। चंद दिनों के नवजात बच्चों के चेहरे से लेकर पैरों तक घमोरियां हो गई हैं। पाउडर लगाने के बाद परिवार के एक मेंबर का सारा दिन पंखी से हवा करने में निकल जाता है। कारण यह कि निक्कू वार्ड एक महीने से बंद पड़ा है अाैर वार्डों में कूलर तक नहीं हैं। कई पंखे चलते नहीं अाैर जाे थाेड़े-बहुत चलते हैं वाे गर्म हवा देते हैं। शुक्रवार को डीसी वरिंदर कुमार शर्मा ने कहा था कि जिले की हर गर्भवती महिला की सेहत की जिम्मेदारी सेहत विभाग की है। घरों में होने वाली डिलीवरियों को रोका जाए। वर्किंग स्टाफ को निर्देश जारी कर गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल में मिलने वाली सुविधा के बारे में जागरूक किया। जिला प्रशासन जहां लोगों को सरकारी अस्पतालाें में इलाज करवाने की नसीहत दे रहा है वहीं, सिविल अस्पताल में पैदा होने वाले बच्चों की हालत पूरे सिस्टम की हकीकत बयान कर रही है।

एक महीने से बंद पड़ा है निक्कू वार्ड, 40% प्रसूताओं को प्राइवेट हॉस्पिटल में जाना पड़ रहा
और हकीकत ये है...नवजात गर्मी से बिलबिला रहे, शरीर पर छाले पड़ रहे
वार्ड में 10 से 15 बच्चे पीलिया से हैं पीड़ित
किसी से उधार पैसे लेकर मार्केट से पाउडर लाए हैं
जच्चा-बच्चा वार्ड में भर्ती किशनपुरा की रहने वाली महिला ने बताया कि पिछले हफ्ते शनिवार को बेटी पैदा हुई थी। तीन दिन तक डॉक्टरों ने मुझे पहली मंजिल पर बने 2 नंबर कमरे में रखा। इसके बाद मुझे दूसरी मंजिल पर बने कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। जिस दिन दूसरी मंजिल पर शिफ्ट किया उस दिन से बच्चे का सारा चेहरा घमोरियों से भर गया है। सारा दिन बच्चा रोता रहता है। अगर स्टाफ से दवा के लिए कहें ताे जवाब मिलता है कि इस बीमारी की दवा हमारे पास नहीं है। इसके बाद किसी से पैसे उधार लेकर बाहर से पाउडर लेकर आए हैं ताकि बच्चा जख्मों के ताव से कम से कम रोए तो न।

अधिकारियों ने मीटिंग में डीसी के सामने जच्चा-बच्चा वार्ड का मुद्दा ही नहीं रखा
जच्चा-बच्चा वार्ड में भीषण गर्मी के कारण तीन दिन के बच्चाें की स्किन खराब हाेनी शुरू हाे गई है। सेहत विभाग अाैर सिविल अस्पताल में व्यवस्था का अालम यह है कि बच्चाें के लिए पाउडर तक नहीं है। सिविल अस्पताल में एक हफ्ते में पैदा होने वाले 40 फीसदी बच्चों को दूसरे अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है। इसका कारण 30 मई से बंद पड़े जच्चा-बच्चा वार्ड के निक्कू वार्ड का बंद होना है। निक्कू वार्ड एक महीने से बंद है। शुक्रवार को सिविल अस्पताल के अधिकारियों ने डीसी वरिंदर कुमार शर्मा के साथ हुई मीटिंग इस मुद्दे को नहीं उठाया।

रिपोर्ट लेकर जल्द खुलवाएंगे निक्कू वार्ड : डीसी
सिविल अस्पताल में गर्मी के कारण बच्चाें की दयनीय हालत और पिछले एक महीने से बंद पड़े निक्कू वार्ड के बारे में डीसी वरिंदर कुमार शर्मा ने से बात की गई तो उन्हाेंने कहा कि मुझे दैनिक भास्कर से ही इस बारे में पता चला है। इस मामले की पूरी जानकारी सिविल अस्पताल के अधिकािरयों से लूंगा। सिविल अस्पताल से निक्कू वार्ड की रिपोर्ट मांगी जाएगी। जिन कारणों से निक्कू वार्ड पिछले कई महीनों से बंद है, उसे ठीक करवाकर जल्द से जल्द खोला जाएगा।

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