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सामान्य वर्ग को आरक्षण देने के फैसले पर पंजाब सरकार कायम, पर सामने खड़ी हैं कई चुनौतियां

5 महीने पहले
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आरक्षण के मुद्दे पर बात करते पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह। फाइल फोटो
  • आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर सामान्‍य वर्ग को 30 मई 2019 के नोटिफिकेशन में राहत दी थी पंजाब सरकार ने
  • हाईकोर्ट में विरोध में याचिका दायर करने वाले वकील एसके शर्मा का कहना-संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं
  • मध्यम, उच्च मध्यम और कुलीन परिवारों से संबंधित सामान्य वर्ग के होनहार विद्यार्थियों को भी हो सकता है नुकसान
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जालंधर. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को 15 फीसदी आरक्षण के मुद्दे पर अपना रुख साफ कर दिया है। उन्होंने बुधवार को विधानसभा के बजट सत्र के बाद दो-टूक कह डाला कि हर हाल में सरकार की आरक्षण नीति जारी रहेगी। भले ही कैप्टन ने अपना स्टैंड साफ कर दिया, लेकिन असल में सामान्य वर्ग को आरक्षण देना इतना आसान नहीं है। इस डगर में कई तरह के रोड़े हैं। कहीं राजनैतिक पेंच है तो कहीं कोर्ट का डंडा। ऊपर से मध्यम, उच्च मध्यम और कुलीन स्तर के सामान्य विद्यार्थियों को नुकसान उठाना पड़ेगा सो अलग। इन सब प्रभावों के बारे में जानने के लिए पहले प्रदेश की आरक्षण व्यवस्था को समझना जरूरी है।

ध्यान रहे, विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान 18 जनवरी को विधानसभा सत्र में मुख्यमंत्री और सदन के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के संविधान के 126वें संशोधन की पुष्टि करने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया। इससे पंजाब में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को मिलने वाले आरक्षण की व्यवस्था में 10 साल का विस्तार हो जाएगा।

126वें संशोधन को लोकसभा में 10 दिसंबर, 2019 को और राज्यसभा में 12 दिसंबर, 2019 को पास किया गया था। वहीं विधानसभा कैप्टन सिंह ने अपने प्रसताव में कहा था, 'डॉ. बीआर अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान निर्माताओं की ओर से एससी, एसटी को 10 साल के लिए आरक्षण दिया था। उस समय से अब तक समय-समय की सरकारें इसमें विस्तार करती रही हैं। हालांकि भेदभाव विरोधी नीतियां व राजनैतिक नुमाइंदगी और नौकरियों में आरक्षण से बीते 70 साल में इस भाईचारे के सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। इसके बावजूद वह बाकी समाज के बराबर नहीं रहे। इसके नतीजे के तौर पर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण में 10 साल का  विस्तार करने का मजबूत केस बनता है, जिससे समाज के गरीबों और दबे-कुचले वर्गों के विकास के अधूरे कार्य को पूरा किया जा सके'।

सामान्य वर्ग के लिए पंजाब सरकार ने की थी ये घोषणा
दूसरी ओर इससे थोड़ा अतीत में झांकें तो लंबे समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते आ रहे सामान्‍य वर्ग के लोगों को राहत देने का काम भी 30 मई 2019 के नोटिफिकेशन के जरिये कर डाला। इसके अनुसार आर्थिक आधार पर सामन्‍य वर्ग के लोगों को नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया गया। 

आठ लाख से कम आमदनी वाले परिवारों को मिलेगा लाभ
सामाजिक न्याय एवं अल्पसंख्यक सशक्तीकरण विभाग के आरक्षण सैल की तरफ से जारी नोटिफिकेशन की कॉपी अलग-अलग विभागों के प्रमुखों, बोर्डों, निगमों के प्रमुखों, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार, अनुसूचित जाति व पिछड़ी श्रेणी आयोग को भेजी गई। नोटिफिकेशन में स्पष्ट है कि सामान्‍य वर्ग के जिन परिवारों को अब तक कोई लाभ नहीं मिला और जिस परिवार की सालाना आमदन आठ लाख रुपए तक है, उसे आरक्षण का लाभ मिलेगा। आरक्षण का लाभ लेने वाले परिवार में पति, पत्‍नी व 18 साल से कम उम्र के बच्चे को लाभ लेने वालों की सूची में शामिल किया गया है।


नोटिफिकेशन के हिसाब से इनको नहीं मिलेगा ल
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नोटिफिकेशन में यह स्पष्ट किया कि जिस परिवार के पास पांच एकड़ या इससे अधिक जमीन, एक हजार वर्ग फीट में घर, निगम के क्षेत्र में 200 गज का प्लॉट और शहरी क्षेत्र में 100 गज या इससे अधिक का प्लॉट होगा, तो उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। कैप्टन ने अच्छी शिक्षा, प्रशिक्षण व नौकरियों में नुमाइंदगी देकर इन वर्गों की भलाई के प्रति अपनी वचनबद्धता के लिए साझा यत्न करने की जरूरत पर जोर दिया।

हाईकोर्ट में लगाई गई है सरकार के खिलाफ याचिका

इस मसले पर पंजाब सरकार को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने इस मामले में केन्द्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। केन्द्र को अगली सुनवाई 13 मार्च तक जवाब दाखिल करना है। याचिका दायर करने वाले वकील एसके शर्मा ने बताया कि संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को ही माना गया है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी अपने फैसलों में इस आधार को स्थापित किया गया है।
 
केंद्र की भाजपा सरकार का ऐलान है बड़ी राजनैतिक चुनौती
इसके अलावा अगस्त 2019 में केंद्र सरकार की तरफ से ऐलान कर दिया गया कि आर्थिक आधार पर कमजोर सवर्णों को सरकारी नौकरी में 15 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। इस फैसले पर भले ही उस कांग्रेस भी सहमत नजर आई, लेकिन जानकारों की मानें तो यही असल में बड़ी दिक्कत है। वरिष्ठ राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण अशोक पाण्डेय कहते हैं कि इस फैसले से अव्वल सवर्ण बिरादरी की नाराजगी काफी हद तक कम होगी, यूपी-बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में एनडीए की खिलाफत करने वाली पार्टियों की ताकत भी कमजोर हो सकती है। एक तरफ गुजरात में पटेल, महाराष्ट्र में मराठा, राजस्थान में गुर्जर और यूपी में जाट बिरादरी आरक्षण मांग रही हैं। वहीं पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस और भाजपा दोनों इसे भुनाने की कोशिश करेंगी।

होनहार छात्रों को उठाना पड़ सकता है नुकसान
जहां तक दिक्कत की बात है, आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए अधिकतम 50 फीसदी की लक्ष्मण-रेखा को लांघना होगा और इसके संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। फिलहाल, ओबीसी को 27 फीसदी, दलित को 15 फीसदी और आदिवासियों को 7.5 फीसदी आरक्षण मिलता है। यह मिलाकर 49.5 फीसदी होता है, यानि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए 50.5 फीसदी सीट बाकी बचती हैं। वैसे आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 50 फीसदी से 65 फीसदी किया जाना आसान है, लेकिन पिछड़ी और दलित जातियों के आरक्षण में कटौती के बगैर आरक्षण की नई नीति को लागू किया गया तो बाकी 50 फीसदी की होड़ में रहने वाले होनहार छात्रों को नुकसान उठाना होगा। मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के साथ-साथ कुलीन वर्ग के छात्रों के लिए सिर्फ 35 फीसदी सीट ही बचेंगी।

पहले खारिज हो चुका है आर्थिक आधार पर आरक्षण का मसौदा
संविधान के जानकार त्रियुगी नारायण पाण्डेय की मानें तो इस दिशा में नब्बे के दशक में भी पहल हुई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना को खारिज कर दिया था। मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने के बाद अगड़ी जातियों की नाराजगी को दूर करने के लिए 2 सितंबर 1991 को तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक आधार पर पिछड़ों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का मसौदा तैयार किया था। इस आशय की अधिसूचना को इंदिरा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया और अदालत की नौ सदस्यीय पीठ ने अधिसूचना को खारिज करते हुए कहा था कि संविधान में आरक्षण का आधार किसी समूह या जाति की सामाजिक स्थिति है, आर्थिक स्थिति नहीं। इसके बाद वर्ष 2001 में यूपी के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने ओबीसी में अति पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आरक्षण देने का प्रयास किया था, लेकिन कामयाब नहीं हुए।

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