गदरी बाबा बंता सिंह / अपनों ने ही झूठी कसम दे फंसा दिया, फिर फांसी से पहले बढ़ गया था साढ़े 11 पौंड वजन



गदरी बाबा बंता सिंह संघवाल। गदरी बाबा बंता सिंह संघवाल।
Story Of a Real Hero Revolutuon Movement for India Independence, Banta Singh Sanghwal
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गदरी बाबा बंता सिंह संघवाल।गदरी बाबा बंता सिंह संघवाल।
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  • जालंधर जिले के गांव संघवाल में 1890 में बूटा सिेह और गुजरी के घर जन्मे थे बलवंत सिंह
  • डीएवी स्कूल से 10वीं पास कर अमेरिका गए थे पढ़ने को, गुलामी के तानों से तंग आ गदर पार्टी में शामिल हुए
  • आज 104वें शहीदी दिवस पर सांसद चौधरी संतोख सिंह करेंगे उनके बुत्त वाले पार्क के नवीनीकरण का उद्घाटन

Dainik Bhaskar

Aug 12, 2019, 10:38 AM IST

जालंधर (बलराज सिंह). अंगेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजाने वाली आजादी की सबसे पहली गदरी लहर का नाम आते ही सिर्फ 25 साल की उम्र में फांसी के फंदे पर झूल गए शहीद बंता सिंह संघवाल की अमर गाथा अपने आप स्मरण हो आती है। 104 साल पहले शहीद बाबा बंता सिंह को भले ही उनके अपनों ने झूठी कसम दे फंसा दिया था, मगर उन्हें वतन पर कुर्बान होने की इतनी खुशी थी कि गिरफ्तारी से लेकर फांसी के तख्ते तक पहुंचने के अंतराल में उनका साढ़े 11 पौंड वजन बढ़ गया था।

 

जालंधर जिले के गांव संघवाल में 1890 में जन्मे बंता सिंह का बचपन का नाम बलवंत सिंह था। हर सुख-सुविधा के धनी पिता बूटा सिंह और माता गुजरी के लाल बलवंत सिंह ने गांव के स्कूल से पांचवीं तक पढ़ाई की। इसके बाद जालंधर के डीएवी स्कूल में पढ़ते वक्त घर से अनाज की बोरियां लेजाकर उन्होंने कांगड़ा जिले में भूकंप पीड़ितों की मदद की। 10वीं के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए तो वहां अंगेजों द्वारा भारतीयों को गुलाम बनाने के तानों से तंग आकर उन्होंने गदरी लहर में कूद पड़े। गदर पार्टी के प्रधान बाबा सोहन सिंह भकना ने 'मेरी राम कहानी' पुस्तक में लिखा, "हमारी सभी विपत्तियों की जड़ हमारी गुलामी है। इसे खत्म करने के लिए हमें शूरवीरों की जरूरत है तो अपने नाम प्रसतुत करने वाले देशभक्तों में सबसे पहला नाम भाई बंता सिंह का था।"

 

1913 में अमेरिका से वापस आए बलवंत सिंह उर्फ बंता सिंह ने 1914 में अपने और आसपास के गांवों के लोगों को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था। उनके विचारों से प्रभावित उनके गांव के रूड़ सिंह सबसे आगे होकर साथ चले। गांव संघवाल में पंचायत का गठन कर सरकार विरुद्ध प्रचार शुरू किया। गांव में पशुओं का अस्पताल खोला, एक स्कूल और लाइब्रेरी खोली। गांव की पंचायत में कत्ल को छोड़कर सभी मुकद्दमों का फैसला किया जाता था। गांव में गदरी साहित्य छापने को एक प्रिंटिंग पेसे भी लगाई गई।

 

बंता सिंह ने साथियों के साथ मिलकर कपूरथला असलाहखाने में हमला करके हवलदार भगवान सिंह को अपने साथ मिला लिया। 25 अप्रैल 1915 को बूटा सिंह अकालगढ़ के साथ मिलकर नंगल कलां होशियारपुर टोडी के जैलदार चंदा सिंह का कत्ल किया। 26 अप्रैल 1915 को कुल 82 गदरियों पर पहला साजिश का केस दर्ज हुआ और बंता सिंह को फरार करार दिया गया। 12 जून को बल्ला पुल पर तैनात दिल्ली रेजिमेंट के दो सिपाहियों फूल सिंह और चतर सिंह को मारकर राइफलें व गोलियां लूटी, वहीं जैलदार कपूर सिंह की हत्या की कोशिश में भी नाम आया। लाहौर और सप्लीमेंटरी लाहौर साजिश केसों में फैसले के वक्त उनकी पहचान सोने के दांतों वाला मशहूर बंता सिंह संघवाल के तौर पर की गई थी।

 

1992 में चौक का नामकरण, दो साल बाद लगा बुत्त

महान स्वतन्त्रता संग्रामी बाबा भगत सिंह बिलगा और शहीद बंता सिंह संघवाल वेलफेयर ट्रस्ट जालन्धर के प्रधान डॉ. जीएस गिल की कोशिशों के कारण 1992 में पठानकोट बाईपास चौक का नाम शहीद बंता सिंह संघवाल चौक रखा गया और 1994 में शहीद ऊधम सिंह वेलफेयर ट्रस्ट बर्मिंघम के सहयोग से इस चौक पर शहीद बंता सिंह संघवाल का बुत्त लगाया गया। गांव संघवाल में शहीद बंता सिंह, शहीद रूड़ सिंह स्टेडियम बनाया गया, जहां हर वर्ष गदरी बाबाओं की याद में मैराथन रेस और टूर्नामेंट करवाए जाते हैं। आज उनके शहीदी दिवस पर जालंधर के सांसद चौधरी संतोख सिंह उनके बुत्त वाले पार्क के नवीनीकरण का उद्घाटन करेंगे।

 

ये है देशभक्त से धोखे की कहानी

बताया जाता है कि बल्ला पुल लूट के बाद पुलिस से मुकाबला करते हुए किसी तरह गांव पहुंचे, लेकिन 60 मील पैदल दौड़ने की वजह से बंता सिंह संघवाल के पैर जख्मी हो गए थे। गुरु ग्रंथ साहिब की हुजूरी में होशियारपुर के जोड़ा निवासी उनकी साली का ससुर प्रताप सिंह इलाज कराने के लिए अपने साथ ले गया। वहां 25 जून को देशभक्त के साथ धोखा करते हुए प्रताप सिंह ने होशियारपुर पुलिस को मुखबिरी देकर पकड़वा दिया। इसके बाद 12 अगस्त 1915 को लाहौर की जेल में बंता सिंह संघवाल और बूटा सिंह अकालगढ़ को फांसी दे दी गई।

 

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