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एक सिद्ध हैं, महायोगी हैं निराले बाबा

महावीर का प्रेम। आचार्य दिव्यानंद सुरि निराले बाबा। महावीर एक दार्शनिक की भांति नहीं है। एक सिद्ध हैं, महायोगी...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 03:30 AM IST
महावीर का प्रेम। आचार्य दिव्यानंद सुरि निराले बाबा। महावीर एक दार्शनिक की भांति नहीं है। एक सिद्ध हैं, महायोगी हैंं। दार्शनिक बैठकर जीवन के संबंध में विचार करता है।योगी जीवन को जीता है।दार्शनिक सिद्धांतो पर पहुंचता है पर योगी सिद्धावस्था में पहुंच जाता है। आज से 2617 वर्ष पूर्व ऐसे ही एक महामानव का जन्म बिहार के नालंदा जिले के कुण्डपुर गांव में माता त्रिशला की कुक्षि से हुआ। जन्म के समय उनका नाम वर्धमान रखा गया। जो बाद में उनके वीर से कार्य अनुरुप महावीर हो गया। महावीर के जीवन में कुक्षि से ही करुणा भरी थी। इसका विकास धीरे-धीरे जीवन के साथ बढ़ता गया। समपूर्ण विकास उनके केवल ज्ञान पर हुआ। उस युग में हो रही नर बली, पशु बली,नारी पर अत्याचार महावीर को असहनीय थे। उनका हृदय वेदना से भर उठा। वे इतने करुणामयी थे कि उन्हें अत्याचारी पर भी करुणा आई। अपने संयम काल में जब तक केवल ज्ञान नहीं हुआ खूब प्रयोग किए। इन प्रयोगोंं को करने में कई कठिनाइयां आई। लेकिन जो श्रम जानता है वह घबराता नहीं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। अपनी ध्यानस्थ अवधि में महावीर ने जीव के दुख दर्द को समझा और संपूर्ण ज्ञान हासिल होने पर बताया कि सभी जीवोंं को अपने तुल्य समझो जैसा तुम जीना चाहते हो प्रत्येक जीव भी जीना चाहता है। जैसा तुम व्यवहार की अपेक्षा रखते हो ऐसे ही व्यवहार की दूसरे भी अपेक्षा रखते हैं। महावीर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने मानव के अलावा अन्य जीवोंं का दुख दर्द समझा। महावीर का प्रेम इतना विराट प्रेम था कि मनुष्य ही नहीं वरन सभी जीवो के प्रति अपने तुल्य प्रेम था।महावीर को समझने के लिए चित्त को उस जगह ले जाना होगा जहां महावीर पहुंचे थे।