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केस प्राॅपर्टी अफसरों के लिए बनी आफत

2 वर्ष पहले
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थानों पर लगा केस प्राॅपर्टी का ग्रहण अब अफसरों के लिए परेशानी बन गया है। दो महीने में प्राॅपर्टी को मालिक को चार बार नोटिस करने के बाद भी कोई थाने सुपुर्दगी लेने नहीं पहुंचा। हालात ये है कि पिछले चार सालों में थानों में 5 हजार दो पहिया व चौ-पहिया वाहन जमा हो गए। जिनके पार्ट्स खराब हो गए है या फिर थानों के बाहर से ही चोरी हो गए। लिहाजा पुलिस की परेशानी बढ़ गई है। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक थानों में बंद इन वाहनों में 3 हजार दो पहिया वाहन है, एक हजार तीन व चार पहिया और एक हजार बड़े वाहन (ट्रॉले, बस और जेसीबी) है। ये सभी वाहन ज्यों के त्यों थानों के बाहर खड़े है। इसकी नीलामी की चेतावनी पुलिस ने चार से पांच बार प्राॅपर्टी के मालिकों को दी, लेकिन एक भी शख्स थाने में अपना वाहन लेने नहीं पहुंचा। इस वजह से थानों की जगह पर भी वाहन भरते जा रहे हैं।

3000 दोपहिया, 1000 तीन और चार पहिया वाहन और बाकी के ट्राले, बसें-जेसीबी मशीनें

इन मामलों में बंद हैं वाहन: थानों में खड़े ये वाहन अलग-अलग मामलों में बंद है। इनमें नशा तस्करी, नाके पर बिना दस्तावेज, हादसों में पकड़े, लूट या डकैती के मामलों में इस्तेमाल और चोरी के बाद बरामद हुए वाहन शामिल है। नशे और हादसों में पकड़े वाहनों की गिनती अढ़ाई हजार है। लूट-डकैती के एक हजार और नाके पर बिना दस्तावेज के 1500 के करीब वाहन बंद हैं।

29 थानों में 5 हजार वाहन, चेतावनी के बाद नहीं पहुंचा एक भी मालिक, अब अदालत के आॅर्डर से होगी नीलामी

परेशानी में बनाना पड़ा अलग सेल, अब कोर्ट से मिले ऑर्डर: इन वाहनों की थानों के बाहर हो रही खस्ताहाल और चोरी हो रहे सामान से परेशान होकर पुलिस ने अधिकारियों से शिकायत की। इसके बाद इन वाहनों की नीलामी और रखरखाव संबंधी अलग सेल बना दिया गया। इसके हेड एडीसीपी क्राइम को बनाया गया, जोकि वाहनों की डिटेल थानों से जुटा रहे हैं। थानों के बाहर पड़े इन वाहनों को लेकर पुलिस अफसरों ने कोर्ट में पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि थानों में लोग वाहन लेने नहीं आ रहे। एेसे में थानों की जगह कम होने की वजह से उनकी हालत बिगड़ती जा रही है। लिहाजा नीलामी के ऑर्डर दिए जाएं। इसके बाद अब कोर्ट ने एक हजार वाहनों की नीलामी के ऑर्डर दिए हैं।

इसलिए नहीं लेते सुपुर्दगी

एक्सीडेंट हुए वाहनों को लोग अशुभ मानते है, लिहाजा वो उसे दोबारा लेना नहीं चाहते।

थानों और कोर्ट के चक्करों में न उलझने से बचने के लिए लोग वाहन नहीं लेते। उनका तर्क रहता है कि जितने पैसे सपुर्दगी के लिए लगाने है, उतने में नया वाहन आ जाता है।

नशा तस्करी के मामलों में बंद वाहनों को आरोपी लेते ही नहीं, क्योंकि वो खुद थानों में बंद है और केस की पैरवी करने वाला कोई नहीं।

वाहनों को नीलाम करने के लिए अब कोर्ट से ऑर्डर लिए गए हैं। ये वाहन हमारे लिए परेशानी बनी हुई है, लेकिन जल्द ही इसे हल कर लिया जाएगा और थाने अब कंडम वाहनों से मुक्त होंगे। -जगतप्रीत सिंह, एडीसीपी क्राइम

पुलिस का तर्क, थानों में न खड़े करने की जगह और न ही संभाल सकतेे

सुपुर्दगी का प्रोसेस भी लंबा

किसी केस में बंद वाहन को छुड़वाने के िलए सबसे पहले कोर्ट में एप्लीकेशन देनी होती है। इसे मेजिस्ट्रेट संबंधित थाने को भेजकर वाहन और केस की डिटेल मांगते हैं। इसके बाद थाना उक्त केस की पूरी डिटेल लिखकर कोर्ट में पेश करता है। फिर कोर्ट इसकी जमानत लेती है। इस सारे प्रोसेस में एक हजार का स्टांप पेपर, वकील की फीस लगती है। वहीं, पुलिस मुलाजिम भी इसमें अपना खर्चा पानी सेट कर लेते हैं।

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