पैसा होते हुए भी दान की भावना न जागे वो होता है दरिद्र : अचल मुनि

Ludhiana News - एस.एस जैन सभा शिवपुरी के तत्वावधान में जैन स्थानक, शिवपुरी में विराजमान गुरु अचल मुनि जी म.सा. आदि ठाणे-5 ने धर्म सभा...

Bhaskar News Network

Jul 14, 2019, 08:10 AM IST
Ludhiana News - despite the money donation of donation does not have to be awkward poor akal muni
एस.एस जैन सभा शिवपुरी के तत्वावधान में जैन स्थानक, शिवपुरी में विराजमान गुरु अचल मुनि जी म.सा. आदि ठाणे-5 ने धर्म सभा में श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए फरमाया कि दरिद्र के लिए दान देना बड़ा कठिन है। पर दरिद्र कौन होता है? जिसके पास पैसा होते हुए भी दान देने की भावना ना जागे वो ही दरिद्र होता है। दान तो सदा खुले दिल से देना चाहिए। जितना आप दान दोगे उससे कई गुना आपके पास लौट कर आएगा। अतः दान संकीर्ण हृदय से नहीं उदारता से कीजिए। संग्रह भी एक प्रकार का महा रोग है। अगर शरीर में खून ना घूमे, कुएं से जल ना निकाला जाए, गाय का दूध ना निकाला जाए तो याद रखना सड़ांध पैदा हो जाएगी। अतः दान बहुत जरूरी है। जितना हम धन कमाते हैं उसमें जो भी पाप की कमाई आती है, उसका प्रायश्चित शुद्धि दान है। दान में हमेशा दूसरे की अपेक्षा रहती है। आप खाना खाते हो, अगर दूसरे को भूखा देख कर भी उसे कुछ नहीं देते तो हम भी चोर हैं। दान कभी भी छपा कर नहीं बल्कि छिपा कर देना चाहिए। दान किसी के हाथ जुड़वा कर नहीं बल्कि हाथ जोड़ कर करना चाहिए। अरे, अगर कोई मेहमान हमारे घर आता है यह आपकी पुण्यवाणी है। कभी भी मेहमान को दुत्कारो मत। दान कई प्रकार का होता है। पहला अनुकंपा दान, दूसरा संग्रह दान-यह सोच कर देना कि एक के बदले दस मिलेंगे। तीसरा भय दान-डर कर देना। चौथा लज्जा दान-समाज के प्रमुख होने के कारण ये सोच कर दान देना कि लोग क्या कहेंगे? पांचवा गौरव दान-अपना गौरव बढ़ाने के लिए दान देना। छठा धर्म दान- रोगी, गरीब की सेवा में दान देना। गुरुदेव ने फरमाया कि अतिथि देवता है। घर में अतिथि आया हुआ हो तो अमृत ही क्यों ना हो, अकेले नहीं पीना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार नहीं होता है वह घर-घर नहीं श्मशान है। उस घर की चौखट पर भूल कर भी पैर पड़ जाए तो स्नान करना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार में कभी चूूूक नहीं होती, वह घर-घर नहीं तीर्थ है। उस घर की चौखट को छूने मात्र से तीर्थ यात्रा का फल मिलता है। जो गृहस्थ अतिथि को खिला कर फिर ख़ुद खाता है, वह कभी भूखा नहीं सोता। जो व्यक्ति जाने वाले अतिथि की सेवा कर चुका है और आने वाली अतिथि का इंतजार करता है वह खुद देवताओं का अतिथि बनता है। शीतल मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि हमेशा निम कर चलो। किसी व्यक्ति ने एक संत से पूछा कि आप बड़े हैं फिर भी नीचे क्यों बैठते हैं? तब संत ने कहा कि नीचे बैठने वाला कभी नहीं गिरता। अतिशय मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि स्वयं से बात करें। आज हर व्यक्ति की जेब में फोन है और वो फोन भी आपको कहता है कि स्वयं से बात करें। अंतर्मुखी बनें। बाहर बात करने पर क्लेश, झगड़ा, फसाद ही बढ़ता है। पर अंतर्मुखी भगवान को प्राप्त करता है। इस मौके पर भारी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने गुरु महाराज के प्रवचन श्रवण कर गुरु कृपा प्राप्त की।

धर्म सभा में श्रावक-श्राविकाओं ने लिया अशीर्वाद।

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