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पब्लिक बाइक शेयरिंग स्कीम में चीन की सस्ती साइकिलों की डंपिंग से हमारी इंडस्ट्री संकट में

स्मार्ट सिटी स्कीम में चयनित देश के 100 शहरों और तमाम निजी संस्थानों में पब्लिक बाइक शेयरिंग (पीबीएस) प्रोजेक्ट्स...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:45 AM IST

पब्लिक बाइक शेयरिंग स्कीम में चीन की सस्ती साइकिलों की डंपिंग से हमारी इंडस्ट्री संकट में
स्मार्ट सिटी स्कीम में चयनित देश के 100 शहरों और तमाम निजी संस्थानों में पब्लिक बाइक शेयरिंग (पीबीएस) प्रोजेक्ट्स में चीन की सस्ती साइकिलों की इंट्री से भारतीय साइकिल इंडस्ट्री के सामने गंभीर संकट आ गया है। खासकर लुधियाना के साइकिल उद्योग पर। असल में चीन की दो कंपनियां पीबीएस प्रोजेक्ट्स में हिस्सा ले रही हैं और वे चीन में करोड़ों की तादाद में कबाड़ हो रहीं साइकिल्स भारत में खपाना चाहती हैं। इससे भारत में साइकिल निर्माण से जुड़ीं घरेलू कंपनियाें के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। अगर केंद्र सरकार ने चीनी कंपनियों और साइकिलों पर अंकुश नहीं लगाया तो लुधियाना की साइकिल इंडस्ट्री 10 सालों में पूरी तरह से बंद हो जाएगी।

लुधियाना की साइकिल इंडस्ट्री की देश की मार्केट में 80% की हिस्सेदारी है। इस मुद्दे पर शहर के साइकिल निर्माता कार्पोरेट घराने और एसोसिएशंस एक मंच पर आए। सोमवार को यहां एक प्रेसवार्ता में उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि पीबीसी प्रोजेक्ट्स से चीन की कंपनियों को बाहर किया जाए। साथ ही चीनी साइकिलों पर इंपोर्ट ड्यूटी 30 से बढ़ाकर 60 फीसदी की जाए। दरअसल, आम आदमी के बेहतर स्वास्थ्य और शहरों में बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए देश के कई शहरों में पीबीएस प्रोजेक्ट लॉन्च किए जा रहे हैं। देश भर में इन प्रोजेक्टों के लिए लगभग चीन के आेफो और मोबाइक समेत 10 ऑपरेटर कंपनियां भाग ले रही हैं। चीन की सस्ती साइकिल्स की डंपिंग की आशंका से भारतीय साइकिल कंपनियां ओफो-मोबाइक को बड़ा खतरा मानती हैं। इसीलिए प्रेसवार्ता के दौरान हीरो साइकिल के एमडी एसके राय और एवन साइकिल के चेयरमैन ओंकार सिंह पाहवा ने जोर देकर कहा कि अगर देश की साइकिल इंडस्ट्री को बचाना है तो केंद्र सरकार को पीबीएस योजना से चाइना की साइकिल को बाहर करे। इसमें केवल मेक इन इंडिया साइकिल इस्तेमाल की जाएं।

बढ़ते पॉल्यूशन से निपटने के लिए कई शहरों में पीबीएस प्रोजेक्ट्स पर दिया जा रहा जोर साइकिल कारोबारी बोले- चीनी साइकिलों पर लगाई जाए 60% इंपोर्ट ड्यूटी

कार्पोरेट घराने, एसोसिएशंस एक साथ आए, बोले-मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिले

प्रेसवार्ता में एवन साइकिल के चेयरमैन ओंकार सिंह पाहवा, हीरो साइकिल के एमडी एसके राय, नीलम साइकिल के मालिक, फीको चेयरमैन केके सेठ, फीको प्रधान गुरमीत सिंह कुलार, यूसीपीएमए के प्रधान इंद्रजीत सिंह नवयुग, एटलस साइकिल के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राहुल कपूर, एसके बाइक्स के डायरेक्टर राकेश कपूर जैसे कारोबारी और ऑल इंडिया साइकिल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन(एआईसीएमए) नई दिल्ली, यूनाइटेड साइकिल पार्ट्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (यूसीपीएमए), फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल ऑर्गेनाइजेशन (एफआईसीओ) व जी-13 बाइसाइकिल फोरम जैसे संगठन शामिल हुए।

पीबीएस. भारत में डॉक सिस्टम, चीन में डिजीटल

पीबीएस के लिए भारतीय कंपनियां फिलहाल डॉक टेक्नोलॉजी अपना रही हैं। लुधियाना के रख बाग और पीएयू में इसी सिस्टम से पब्लिक के लिए साइकिल उपलब्ध हैं। इस सिस्टम में तय स्थान से साइकिल लेकर फिर वहीं पर देना होता है। वहीं, चीन में 2014 में ओफो व मोबाइक ऑपरेटर डॉक लैस टेक्नोलॉजी लेकर आए। इसके जरिए व्यक्ति स्मार्टफोन से पीबीएस का सॉफ्टवेयर लोड कर साइकिल की सवारी कर सकता है। ऑनलाइन भुगतान की सुविधा के साथ ही आरएफआईडी चिप होने के चलते साइकिल को कहीं भी खड़ा किया जा सकता है। दो सालों में ही दोनों ऑपरेटरों ने इस तकनीक से चीन के कई शहरों में 20 करोड़ साइकिलों की बाढ़ ला दी। इससे पीबीएस की वृद्धि 2017 में 735% तक पहुंच गई। चीन की गर्वमेंट को इसे रेगुलराइज करना पड़ा। अब 2019 में यह 32% होने का अनुमान है। इसलिए चीन में सरप्लस नई-पुरानी साइकिल्स भारत में खपाने की तैयारी है।

चुनौती इसलिए गंभीर

जर्मन की एक कंपनी भोपाल में 500 जीपीएस युक्त साइकिलें उतार चुकी है। 50 स्टेशन व 24 किमी. लंबा, 5 मीटर चौड़ा ट्रैक भी बनाया गया है। यहां साइकिलें 999 रुपए सालाना पास पर उपलब्ध हैं।

इसी तरह से पुणे में एक निजी ऑपरेटर ‘पेडल’ नाम की स्कीम से 300 साइकिलें लॉन्च कर चुका है। यह साइकिलें मेड इन इंडिया नहीं हैं। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत पुणे में तीन साल के लिए ऐसी एक लाख साइकिलों की डिमांड है।

कोयम्बटूर और मैसूर में भी जल्द ही पीबीएस स्कीम लागू करने की तैयारी है।

मोदी सरकार से चार महीने से बातचीत, लेकिन नहीं दी राहत

इस मुद्दे पर इंडस्ट्रियलिस्ट चार माह से केंद्र सरकार और स्मार्ट सिटी के सीईओ से बातचीत कर अपनी डिमांड रख चुके हैं। इंडस्ट्री ने कहा कि विदेशी ऑपरेटरों के साथ पीबीएस डाटा साझा करना सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक हो सकता है। यूराेप में इसी आधार पर चीन के इन ऑपरेटरों को इंट्री नहीं मिली। कारोबारियों ने कहा कि चीनी साइकिलों में 10 अनिवार्य रिफ्लेक्टर्स का इस्तेमाल हो और विदेशी ऑपरेटरों को इंट्री देने के मामले में पर्याप्त सावधानी बरती जाए।

80% साइकिलें लुधियाना से ही

सालाना 1.25 करोड़ साइकिल का प्रोडक्शन, छोटी-बड़ी 4000 निर्माता कंपनियां, 10 लाख कर्मचारी-वर्कर।

देश में सालाना करीब 1.65 करोड़ साइकिलें बनती हैं। इसमें से करीब 1.25 करोड़ साइकिलें अकेले लुधियाना में।

सालाना टर्नओवर 6 हजार करोड़ रुपए के आसपास है।

देश की करीब 11 करोड़ आबादी साइकिल्स का इस्तेमाल करती है।

पीबीएस स्कीम में भारतीय साइकिल कंपनियों को वरीयता हमारी इंडस्ट्री को बिग बूस्ट साबित होगा। हमारी कंपनियां बिना किसी एक्सपेंशन के मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर सालाना 2 करोड़ यूनिट तक साइकिलें बना सकती हैं।

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