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नगर निगम में डीसीएफए को ‘खुड्डे लाइन’ लगाकर अकाउंटेंट को दिया गया है बिल पास करके चेक इश्यू करने का जिम्मा

नगर निगम में डिप्टी कंट्रोलर (फाइनेंस एंड अकाउंट्स) यानि डीसीएफए को ‘खुड्डे लाइन’ लगा अकाउंटेंट से बिल पास कराने...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:45 AM IST

नगर निगम में डिप्टी कंट्रोलर (फाइनेंस एंड अकाउंट्स) यानि डीसीएफए को ‘खुड्डे लाइन’ लगा अकाउंटेंट से बिल पास कराने और चेक साइन कर इश्यू करने का जिम्मा दिया गया है। यह सिलसिला लगभग एक साल से चल रहा है। डीसीएफए एसके गुप्ता इसके खिलाफ लोकल गवर्नमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी से लेकर मंत्री नवजोत सिद्धू के पीए तक को मिल चुके हैं, लेकिन सिस्टम अभी भी वही चल रहा है। वहीं, तीन बार वो कमिश्नर से भी मिल चुके हैं। डीसीएफए गुप्ता ने इसे म्यूनिसिपल कार्पोरेशन एक्ट का उल्लंघन भी करार दिया है, जिसमें बिल पास करने से लेकर चेक पर साइन व इश्यू करने की अथॉरिटी कमिश्नर के साथ फाइनेंस ब्रांच के हेड की है, लेकिन यह पावर अकाउंटेंट इस्तेमाल कर रहा है।

झुलसे 4 मुलाजिमों के मुआवजे के बाद गिरी गाज

डीसीएफए एसके गुप्ता के मुताबिक फैक्ट्री में चार मुलाजिमों के झुलसने के बाद उन्हें उनके मुआवजे के तौर पर 4 लाख का चेक काटने के लिए कहा गया था। उन्होंने नियमों के मुताबिक पहले इसे तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर नीरू कत्याल, फिर कमिश्नर से अप्रूव कराने के बाद प्री-ऑडिट करा अगले दिन चेक काटा। अफसर इसी बात से नाराज हैं, जब सीनियर अफसरों ने कह दिया था तो फिर उन्होंने यह फॉर्मेलिटीज क्यों की। गुप्ता का तर्क है कि ऐसा न करते तो बाद में वो बिना नोटिंग व प्री-ऑडिट के खुद ही फंस जाते। जैसे मोहाली में 90 लाख की बिल पेमेंट को लेकर डीसीएफए पर एक्शन हुआ है।

डीसीएफए दो महीने छुट्टी पर रहे, वह कुछ बीमार भी हैं, इसलिए थोड़ा काम दिया, जैसे ठीक होंगे और काम देंगे

डीसीएफए दो महीने छुट्टी पर रहे। ऐसे में निगम का काम कैसे चलेगा। वह कुछ बीमार भी हैं। इसलिए थोड़ा काम दिया है। जैसे-जैसे ठीक होंगे, और काम दे देंगे। बजट बनाना था तो भी वो छुट्टी पर चले गए। ऐसे में बहुत दिक्कत हुई। रही बात एक्ट की तो वो मैंने भी पढ़ा है। दफ्तर मुझे चलाना है तो उसी हिसाब से जिम्मेदारी दी गई है। दूसरा कोई इश्यू नहीं है। -जसकिरन सिंह, निगम कमिश्नर।

एक ही दिन में बदला निगम कमिश्नर का ऑर्डर

डीसीएफए एसके गुप्ता से सारे काम पिछले साल 12 मई को वापस लेकर अकाउंटेंट पंकज कुमार को दे दिए गए। दो महीने खाली बैठाने के बाद 14 जुलाई को ईपीएफ, बिजली बिल समेत 5 काम दिए गए। दो महीने बाद 22 सितंबर को एक काम और दिया गया। इसके विरोध में डीसीएफए ने एक्ट का हवाला देकर विरोध जताया, लेकिन 16 जनवरी 18 को 5 काम और अलॉट कर दिए गए। 17 जनवरी को निगम कमिश्नर ने गुप्ता को पूरा काम सौंप दिया। मगर, अगले ही दिन यानि 18 जनवरी को 10 काम सौंप बाकी वापस ले लिए गए। इसके बाद गुप्ता को बजट बनाने को कहा गया तो गुप्ता ने एडिशनल कमिश्नर को इसका जवाब भेजा कि अलग-अलग ब्रांचों से रिकॉर्ड लेकर बजट अकाउंटेंट तैयार करता है। गुप्ता ने अकाउंटेंट को हिदायत के लिए कहा तो एडिशनल कमिश्नर ने नाराजगी जताते हुए गुप्ता को ब्रांच हेड मानते हुए कहा कि अकाउंटेंट को सीधे उन्हें कहना चाहिए। उन्होंने गुप्ता पर ड्यूटी से कन्नी काटने को लेकर कार्रवाई तक की चेतावनी दी। कामकाज छिनने की वजह से गुप्ता छुट्टी पर चले गए थे।

क्या कहता है एक्ट

एमसी एक्ट 1976 की धारा 78 के मुताबिक कोई भी बैंक तब तक किसी चैक पर पेमेंट रिलीज नहीं कर सकता, जब तक कि उस पर अकाउंट ब्रांच के इंचार्ज (जो यहां डीसीएफए गुप्ता है) और कमिश्नर या उनके ऑथोराइज्ड किए अफसर के साइन न हों। चैक अकाउंटेंट के जरिए डीसीएफए को आते हैं लेकिन अभी अकाउंटेंट सीधे चैक साइन कर बैंक को भेज रहे हैं।

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