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आंसुओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ीं, अपनी कामयाबी से समाज की सोच बदली

Ludhiana News - मेरा जन्म लुधियाना जिले के गांव चकर में 1995 को हुआ। मां राजपाल कौर को कबड्डी खेलने का शौक था। उनके माता-पिता ने सहयोग...

Dec 09, 2019, 08:05 AM IST
Ludhiana News - leaving behind the tears she went ahead changed the thinking of the society with her success
मेरा जन्म लुधियाना जिले के गांव चकर में 1995 को हुआ। मां राजपाल कौर को कबड्डी खेलने का शौक था। उनके माता-पिता ने सहयोग नहीं किया, इसलिए वे जिलास्तर से आगे नहीं खेल पाईं। मां ने तभी सोच लिया था कि अगर उनकी बेटियां हुईं तो उन्हें खेलने से नहीं रोकेंगी। वैसे भी उस वक्त पंजाब में आज जितना फ्री माहौल नहीं था। पिता कमलजीत एक दुकान पर काम करते थे, उन्हें तीन हजार रुपए महीना मिलता था। उन्हीं पैसों से हम दो बहनों तथा दो छोटे भाइयों समेत छह लोगों का गुजारा होता था। जब मैं स्कूल जाती थी तो ग्राउंड पर बच्चों को कई तरह के खेल, खेलते देखती थी। घर आकर मां से खेलने के लिए पूछती थी तो उनका जवाब होता था ये सब फालतू के खेल हैं, तुम्हें बॉक्सिंग में पूरा ध्यान लगाना है बस। मां को शायद बॉक्सिंग पसंद थी, इसलिए उन्होंने मुझे और मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को इसके लिए प्रेरित किया। पिता के वेतन से बस गुजारा होता था, स्पोर्ट्स के बारे में कैसे सोचते?

मेरे पिता नहीं चाहते थे कि बेटियां स्पोर्ट्स में जाएं। वे तो जल्द हमारी शादी करना चाहते थे। हम सभी भाई-बहनों को खेल के लिए मां बहुत सपोर्ट करती थीं। शायद उनके बचपन के अधूरे ख्वाब वे हम बच्चों में पूरे होते देखना चाहती थीं। इसके लिए वे भी कुछ छोटामोटा काम कर हमें पौष्टिक भोजन देने का प्रयास करती थीं। उन्होंने मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को बॉक्सिंग सीखने एकेडमी भेजा। बहन को देख मैं भी इंस्पायर होने लगी (वह नेशनल चैंपियन है)। ट्रेेनिंग के लिए मुझे 2006 से ‘शेर-ए-पंजाब स्पोर्ट्स एकेडमी’ में भेजा जाने लगा। मैं बताना चाहूंगी कि हमारे क्षेत्र के दो एनआरआई भाइयों ने यह एकेडमी शुरू की जहां फ्री ट्रेनिंग दी जाती है। मेरे पुराने खयालात वाले गांव, जहां लड़की का कमीज पहनना लोगों को पसंद नहीं था, ऐसे में सिर्फ मां का सपोर्ट मिला। बड़ी बहन बॉक्सिंग कर ही रही थी, इन सबका असर यह हुआ कि एकेडमी में कुछ ज्यादा ही अच्छे रिजल्ट देेने लगी तो एकेडमी से मदद भी मिलने लगी। कक्षा 10वीं में पढ़ते वक्त 2011 में मैंने सीधे जूनियर नेशनल वुमन चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीत लिया। इसके बाद 2012 में पटियाला तथा विशाखापट्टमन में सिल्वर व ब्रांज मेडल लगातार जीते। वहीं जुलाई, 2013 में अंडर-19 में गोल्ड जीतकर सभी को चौंका दिया। तब पहली बार इंडिया की टी-शर्ट पहनकर गर्व महसूस हुआ, उस दिन मेरा जन्मदिन था। मैं जिला, राज्यस्तर पर लगातार जीत दर्ज करने लगी तो गांव का नाम रोशन होने लगा। पिता को बधाइयां मिलने लगीं और इसी के साथ लोगों की सोच बदलने लगी।

एक वाकया बताना चाहती हूं- 2018 में वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की तैयारी कर रही थी तभी पिताजी का देहांत हो गया। आंसू रुक नहीं रहे थे। उनके देहांत के फौरन बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए ट्रायल थे। स्पर्धा में भाग लेने का जरा मन नहीं था। मां ने मुझे हिम्मत दी। नतीजा, टर्की में वुमन बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता। साथ ही वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए भी चुन ली गई, नवंबर 2018 वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीत लाई। देश तभी बदलेगा, जब लड़कियों के प्रति नजरिया बदलेगा। जरूरत है बस माता-पिता को लड़के-लड़कियों का भेद मिटाकर बेटियों को मौका देने की।

मैं इंटरनेशनल खिलाड़ी तो बन गई, लेकिन सरकार से खास सहयोग नहीं मिला। पंजाब में बॉक्सिंग के संसाधन नहीं हैं। ऐसे में मुक्केबाजी में पहचान बनाना लड़कियों के लिए दोहरी चुनौती है। हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी बेटियों को खेलों में आगे आने से रोक रहा है। सुरक्षा और समानता का माहौल मिले तो पंजाब की लड़कियां आसमान छू सकती हैं। मैं सोचती हूं कि एक लड़की की कामयाबी परिवार, रूढ़ीवादी समाज व अपने शहर की सोच बदल सकती है। मेरे बाद अभी तक 20 से ज्यादा लड़कियां बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेकर पारंगत हो चुकी हैं। मैं इन लड़कियों को टिप्स देती रहती हूं। अभी मोहाली के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में ओलंपिक 2020 की तैयारी कर रही हूं। खिलाड़ी यदि लड़की है तो उसके लिए स्थितियां हमेशा संघर्षपूर्ण होती हैं, ऐसे माहौल में मुझे पंजाब की पहली महिला बॉक्सर के खिताब से नवाजा गया। बचपन में सोचा नहीं था कि बड़ी होकर कई देश घूमने को मिलेंगे। मैं गोल्ड, सिल्वर ब्रांज मिलाकर अभी तक 45 मेडल जीत चुकी हूं। अपनी इस कामयाबी का पूरा श्रेय मेरी मां को जाता है।

(जैसा उन्होंने दैनिक भास्कर लुधियाना की मनप्रीत कौर को बताया)

इस सप्ताह

पंजाब की पहली अंतरराष्ट्रीय महिला बॉक्सर सिमरनजीत कौर

मेरा जन्म लुधियाना जिले के गांव चकर में 1995 को हुआ। मां राजपाल कौर को कबड्डी खेलने का शौक था। उनके माता-पिता ने सहयोग नहीं किया, इसलिए वे जिलास्तर से आगे नहीं खेल पाईं। मां ने तभी सोच लिया था कि अगर उनकी बेटियां हुईं तो उन्हें खेलने से नहीं रोकेंगी। वैसे भी उस वक्त पंजाब में आज जितना फ्री माहौल नहीं था। पिता कमलजीत एक दुकान पर काम करते थे, उन्हें तीन हजार रुपए महीना मिलता था। उन्हीं पैसों से हम दो बहनों तथा दो छोटे भाइयों समेत छह लोगों का गुजारा होता था। जब मैं स्कूल जाती थी तो ग्राउंड पर बच्चों को कई तरह के खेल, खेलते देखती थी। घर आकर मां से खेलने के लिए पूछती थी तो उनका जवाब होता था ये सब फालतू के खेल हैं, तुम्हें बॉक्सिंग में पूरा ध्यान लगाना है बस। मां को शायद बॉक्सिंग पसंद थी, इसलिए उन्होंने मुझे और मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को इसके लिए प्रेरित किया। पिता के वेतन से बस गुजारा होता था, स्पोर्ट्स के बारे में कैसे सोचते?

मेरे पिता नहीं चाहते थे कि बेटियां स्पोर्ट्स में जाएं। वे तो जल्द हमारी शादी करना चाहते थे। हम सभी भाई-बहनों को खेल के लिए मां बहुत सपोर्ट करती थीं। शायद उनके बचपन के अधूरे ख्वाब वे हम बच्चों में पूरे होते देखना चाहती थीं। इसके लिए वे भी कुछ छोटामोटा काम कर हमें पौष्टिक भोजन देने का प्रयास करती थीं। उन्होंने मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को बॉक्सिंग सीखने एकेडमी भेजा। बहन को देख मैं भी इंस्पायर होने लगी (वह नेशनल चैंपियन है)। ट्रेेनिंग के लिए मुझे 2006 से ‘शेर-ए-पंजाब स्पोर्ट्स एकेडमी’ में भेजा जाने लगा। मैं बताना चाहूंगी कि हमारे क्षेत्र के दो एनआरआई भाइयों ने यह एकेडमी शुरू की जहां फ्री ट्रेनिंग दी जाती है। मेरे पुराने खयालात वाले गांव, जहां लड़की का कमीज पहनना लोगों को पसंद नहीं था, ऐसे में सिर्फ मां का सपोर्ट मिला। बड़ी बहन बॉक्सिंग कर ही रही थी, इन सबका असर यह हुआ कि एकेडमी में कुछ ज्यादा ही अच्छे रिजल्ट देेने लगी तो एकेडमी से मदद भी मिलने लगी। कक्षा 10वीं में पढ़ते वक्त 2011 में मैंने सीधे जूनियर नेशनल वुमन चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीत लिया। इसके बाद 2012 में पटियाला तथा विशाखापट्टमन में सिल्वर व ब्रांज मेडल लगातार जीते। वहीं जुलाई, 2013 में अंडर-19 में गोल्ड जीतकर सभी को चौंका दिया। तब पहली बार इंडिया की टी-शर्ट पहनकर गर्व महसूस हुआ, उस दिन मेरा जन्मदिन था। मैं जिला, राज्यस्तर पर लगातार जीत दर्ज करने लगी तो गांव का नाम रोशन होने लगा। पिता को बधाइयां मिलने लगीं और इसी के साथ लोगों की सोच बदलने लगी।

एक वाकया बताना चाहती हूं- 2018 में वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की तैयारी कर रही थी तभी पिताजी का देहांत हो गया। आंसू रुक नहीं रहे थे। उनके देहांत के फौरन बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए ट्रायल थे। स्पर्धा में भाग लेने का जरा मन नहीं था। मां ने मुझे हिम्मत दी। नतीजा, टर्की में वुमन बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता। साथ ही वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए भी चुन ली गई, नवंबर 2018 वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीत लाई। देश तभी बदलेगा, जब लड़कियों के प्रति नजरिया बदलेगा। जरूरत है बस माता-पिता को लड़के-लड़कियों का भेद मिटाकर बेटियों को मौका देने की।

मैं इंटरनेशनल खिलाड़ी तो बन गई, लेकिन सरकार से खास सहयोग नहीं मिला। पंजाब में बॉक्सिंग के संसाधन नहीं हैं। ऐसे में मुक्केबाजी में पहचान बनाना लड़कियों के लिए दोहरी चुनौती है। हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी बेटियों को खेलों में आगे आने से रोक रहा है। सुरक्षा और समानता का माहौल मिले तो पंजाब की लड़कियां आसमान छू सकती हैं। मैं सोचती हूं कि एक लड़की की कामयाबी परिवार, रूढ़ीवादी समाज व अपने शहर की सोच बदल सकती है। मेरे बाद अभी तक 20 से ज्यादा लड़कियां बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेकर पारंगत हो चुकी हैं। मैं इन लड़कियों को टिप्स देती रहती हूं। अभी मोहाली के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में ओलंपिक 2020 की तैयारी कर रही हूं। खिलाड़ी यदि लड़की है तो उसके लिए स्थितियां हमेशा संघर्षपूर्ण होती हैं, ऐसे माहौल में मुझे पंजाब की पहली महिला बॉक्सर के खिताब से नवाजा गया। बचपन में सोचा नहीं था कि बड़ी होकर कई देश घूमने को मिलेंगे। मैं गोल्ड, सिल्वर ब्रांज मिलाकर अभी तक 45 मेडल जीत चुकी हूं। अपनी इस कामयाबी का पूरा श्रेय मेरी मां को जाता है।

(जैसा उन्होंने दैनिक भास्कर लुधियाना की मनप्रीत कौर को बताया)

मेरा जन्म लुधियाना जिले के गांव चकर में 1995 को हुआ। मां राजपाल कौर को कबड्डी खेलने का शौक था। उनके माता-पिता ने सहयोग नहीं किया, इसलिए वे जिलास्तर से आगे नहीं खेल पाईं। मां ने तभी सोच लिया था कि अगर उनकी बेटियां हुईं तो उन्हें खेलने से नहीं रोकेंगी। वैसे भी उस वक्त पंजाब में आज जितना फ्री माहौल नहीं था। पिता कमलजीत एक दुकान पर काम करते थे, उन्हें तीन हजार रुपए महीना मिलता था। उन्हीं पैसों से हम दो बहनों तथा दो छोटे भाइयों समेत छह लोगों का गुजारा होता था। जब मैं स्कूल जाती थी तो ग्राउंड पर बच्चों को कई तरह के खेल, खेलते देखती थी। घर आकर मां से खेलने के लिए पूछती थी तो उनका जवाब होता था ये सब फालतू के खेल हैं, तुम्हें बॉक्सिंग में पूरा ध्यान लगाना है बस। मां को शायद बॉक्सिंग पसंद थी, इसलिए उन्होंने मुझे और मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को इसके लिए प्रेरित किया। पिता के वेतन से बस गुजारा होता था, स्पोर्ट्स के बारे में कैसे सोचते?

मेरे पिता नहीं चाहते थे कि बेटियां स्पोर्ट्स में जाएं। वे तो जल्द हमारी शादी करना चाहते थे। हम सभी भाई-बहनों को खेल के लिए मां बहुत सपोर्ट करती थीं। शायद उनके बचपन के अधूरे ख्वाब वे हम बच्चों में पूरे होते देखना चाहती थीं। इसके लिए वे भी कुछ छोटामोटा काम कर हमें पौष्टिक भोजन देने का प्रयास करती थीं। उन्होंने मेरी बड़ी बहन अमनदीप कौर को बॉक्सिंग सीखने एकेडमी भेजा। बहन को देख मैं भी इंस्पायर होने लगी (वह नेशनल चैंपियन है)। ट्रेेनिंग के लिए मुझे 2006 से ‘शेर-ए-पंजाब स्पोर्ट्स एकेडमी’ में भेजा जाने लगा। मैं बताना चाहूंगी कि हमारे क्षेत्र के दो एनआरआई भाइयों ने यह एकेडमी शुरू की जहां फ्री ट्रेनिंग दी जाती है। मेरे पुराने खयालात वाले गांव, जहां लड़की का कमीज पहनना लोगों को पसंद नहीं था, ऐसे में सिर्फ मां का सपोर्ट मिला। बड़ी बहन बॉक्सिंग कर ही रही थी, इन सबका असर यह हुआ कि एकेडमी में कुछ ज्यादा ही अच्छे रिजल्ट देेने लगी तो एकेडमी से मदद भी मिलने लगी। कक्षा 10वीं में पढ़ते वक्त 2011 में मैंने सीधे जूनियर नेशनल वुमन चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीत लिया। इसके बाद 2012 में पटियाला तथा विशाखापट्टमन में सिल्वर व ब्रांज मेडल लगातार जीते। वहीं जुलाई, 2013 में अंडर-19 में गोल्ड जीतकर सभी को चौंका दिया। तब पहली बार इंडिया की टी-शर्ट पहनकर गर्व महसूस हुआ, उस दिन मेरा जन्मदिन था। मैं जिला, राज्यस्तर पर लगातार जीत दर्ज करने लगी तो गांव का नाम रोशन होने लगा। पिता को बधाइयां मिलने लगीं और इसी के साथ लोगों की सोच बदलने लगी।

एक वाकया बताना चाहती हूं- 2018 में वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की तैयारी कर रही थी तभी पिताजी का देहांत हो गया। आंसू रुक नहीं रहे थे। उनके देहांत के फौरन बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए ट्रायल थे। स्पर्धा में भाग लेने का जरा मन नहीं था। मां ने मुझे हिम्मत दी। नतीजा, टर्की में वुमन बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता। साथ ही वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए भी चुन ली गई, नवंबर 2018 वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीत लाई। देश तभी बदलेगा, जब लड़कियों के प्रति नजरिया बदलेगा। जरूरत है बस माता-पिता को लड़के-लड़कियों का भेद मिटाकर बेटियों को मौका देने की।

मैं इंटरनेशनल खिलाड़ी तो बन गई, लेकिन सरकार से खास सहयोग नहीं मिला। पंजाब में बॉक्सिंग के संसाधन नहीं हैं। ऐसे में मुक्केबाजी में पहचान बनाना लड़कियों के लिए दोहरी चुनौती है। हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी बेटियों को खेलों में आगे आने से रोक रहा है। सुरक्षा और समानता का माहौल मिले तो पंजाब की लड़कियां आसमान छू सकती हैं। मैं सोचती हूं कि एक लड़की की कामयाबी परिवार, रूढ़ीवादी समाज व अपने शहर की सोच बदल सकती है। मेरे बाद अभी तक 20 से ज्यादा लड़कियां बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेकर पारंगत हो चुकी हैं। मैं इन लड़कियों को टिप्स देती रहती हूं। अभी मोहाली के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में ओलंपिक 2020 की तैयारी कर रही हूं। खिलाड़ी यदि लड़की है तो उसके लिए स्थितियां हमेशा संघर्षपूर्ण होती हैं, ऐसे माहौल में मुझे पंजाब की पहली महिला बॉक्सर के खिताब से नवाजा गया। बचपन में सोचा नहीं था कि बड़ी होकर कई देश घूमने को मिलेंगे। मैं गोल्ड, सिल्वर ब्रांज मिलाकर अभी तक 45 मेडल जीत चुकी हूं। अपनी इस कामयाबी का पूरा श्रेय मेरी मां को जाता है।

(जैसा उन्होंने दैनिक भास्कर लुधियाना की मनप्रीत कौर को बताया)

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