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लोक अदालत की मेंबर बनीं पंजाब की पहली ट्रांसजेंडर मोहिनी, किन्नरों की दशा व बेहतरी पर करेंगी पीएचडी

9 साल से लुधियाना में रह रही राजस्थान की मोहिनी किन्नरों की बेहतरी के लिए सोसायटी चला रही हैं

Dainik Bhaskar

Aug 13, 2018, 05:32 AM IST
Punjabs first transgender became a member of the Lok Adalat

लुधियाना. नेशनल लोक अदालत की मेंबर बनी पंजाब की पहली ट्रांसजेंडर मोहिनी अब अपने समाज के लोगों की दशा-दिशा पर पीएचडी करने की तैयारी कर रही हैं। राजस्थान में झुंझनूं के एक छोटे से गांव में जन्मीं मोहिनी तकरीबन 9 साल से लुधियाना में रह रही हैं। पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में ग्रेज्युएट, सोशल वर्क में मास्टर डिग्री कर चुकी मोहिनी जुरिस्ट बनने के बाद भी अपने समाज से जुड़ी हुई हैं। बधाइयां मांगना, डेरे में सेवा करना सब कुछ पहले की तरह ही है। वह किन्नर समाज के लोगों के लिए एक सोसाइटी भी चला रही हैं। वह कहती हैं कि किन्नरों को स्वरोजगार की ट्रेनिंग देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं ताकि पेट पालने के लिए किसी को गलत काम न करना पड़े।

घर-परिवार, दोस्त, स्कूल सब छूटा लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी : 12-13 साल की उम्र में मेरे शरीर में कुछ बदलाव आने लगे थे जो बाकी लड़कों से अलग थे। मेरे कपड़े जरूर लड़कों वाले थे, लेकिन हाव-भाव और चाल लड़कियों जैसी होती जा रही थी। लड़कों के बीच मैं असहज महसूस करने लगी थी। जल्द ही घर वालों को पता चल गया कि मैं किन्नर हूं तो उन पर मानो मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा। सारा समाज एकाएक मेरा दुश्मन सा हो गया। दोस्त छूटे, स्कूल छूटा, घर-परिवार भी। मैं तब 7वीं क्लास में पढ़ती थी। लड़के मेरा उत्पीड़न करने लगे और यह कई बार वायलेंस का रूप लेने लगी। जीना मुश्किल हो गया था, मेरे सामने किन्नर समाज में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

काम के साथ पढ़ाई जारी रखी: वहां मुझे एक दोस्त मिला, उसने मुझे नाचना-गाना और बधाई मांगना सिखाया। मैंने अपना पेट पालने के साथ पढ़ाई भी जारी रखी। समाज के बहुत लोगों को यह अच्छा नहीं लगता था, लेकिन चोरी-छिपे कभी कैंडल लाइट में और कभी नहर किनारे बैठकर पढ़ाई करती रही। हायर सेकेंडरी प्राइवेट करने के बाद डिस्टेंस एजुकेशन के जरिए बीए, एमए पूरा किया। मैं खुश थी कि शायद अब मुझे कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाएगी। लेकिन इंटरव्यू में सेलेक्ट होने के बावजूद भी किन्नर को कोई नौकरी देने का तैयार नहीं था। मुझे पर मर्दाना वेश-भूषा अपनाने का दबाव बनाया जाता।

अपने समाज के लिए कुछ करने को बनाई सोसाइटी: इसी सब के बीच 2009 में मैं लुधियाना आ गई। यहां भी समाज एक किन्नर को स्वीकार करने को तैयार नहीं था, लेकिन कुछ अच्छे लोगों ने साथ दिया और मैं बन्तो हाजी (मेरी दादी गुरु) के डेरे से जुड़ गई। यहीं से 2011 में एलजीबीटी (सेक्सुअल माइनॉरिटीज) कम्युनिटी के हकों की लड़ाई के लिए ‘मनसा फाउंडेशन वेलफेयर सोसाइटी’ का गठन किया। सोसाइटी के एक सेमिनार में लुधियाना के डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज गुरबीर सिंह और सीजेएम गुरप्रीत कौर से मुलाकात हुई। उन्होंने ही मुझे प्रेरित किया और नेशनल लोक अदालत का सदस्य मनोनीत कराने में मदद की।

डॉक्टरेट के लिए भी कोई तैयार नहीं हो रहा था, बमुश्किल मिला गाइड: डॉक्टरेट के लिए गाइड न मिलने से मोहिनी निराश थीं, लेकिन अब पुलिस अकादमी फिल्लौर, के पूर्व डीन व जॉइंट डायरेक्टर डॉ. डीजे सिंह उन्हें पीएचडी कराने के लिए तैयार हो गए हैं। पीएचडी पूरा करने के बाद वह देश की पहली किन्नर होंगी मोहिनी। डॉ. सिंह यूजीसी की एक्सपर्ट कमिटी के मेंबर भी हैं। वह कहते हैं कि डॉक्टरेट कराने में ढाई से तीन लाख खर्च आएगा, बस इसी की व्यवस्था कराने में लगे हैं। मोहिनी का सब्जेक्ट भी ट्रांसजेंडर को समाज में आने वाली समस्याओं से संबंधित ही होगा।

किन्नरों को लेकर समाज में गलत धारणाएं, डर से पुलिस मदद भी नहीं लेते: मोहिनी का एक और दर्द है कि किन्नरों को लेकर समाज में गलत धारणाएं हैं, जबकि वे लोग भी सामान्य लोगों की तरह ही इंसान है। उन्हें भी सुख-दुख का अहसास होता है, लेकिन सामाजिक गैप के कारण किन्नरों के प्रति लोगों का नजरिया अच्छा नहीं रहता है। अच्छे-बुरे तो हर समाज में होते हैं। किन्नर लोग खुद वायलेंस और सेक्सुअल हरासमेंट का शिकार हैं। समाज के डर से ये पुलिस कंप्लेंट भी नहीं करते। असल में पुलिस की मदद लेनी चाहिए। मदद न मिलने पर कानून का सहारा लेना चाहिए।

अंतिम विदाई के लिए अलग कब्रिस्तान की भी लड़ाई: मोहिनी किन्नरों के लिए अलग कब्रिस्तान की लड़ाई भी लड़ रही हैं। क्योंकि पूरे देश में इनके लिए अलग श्मशान या दफनाने की जगह नहीं है। इसके लिए वह वक्फ बोर्ड और चीफ जुडिशयल मजिस्ट्रेट, सेक्रेटरी डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी को प्रजेंटेशन दिया है। मदद का आश्वासन मिला है। मोहिनी कहती हैं, ‘एलजीबीटी कम्यूनिटी को न सिर्फ सामान्य जीवन जीने का हक है, बल्कि उन्हें सम्मान जनक अंतिम संस्कार का अधिकार भी मिलना चाहिए। लिंग निर्धारण का अधिकार हमारे हाथ में नहीं है लेकिन कम से कम मरने के बाद तो अपमान न झेलना पड़े।’

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