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दया का दान ही मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत

2 वर्ष पहले
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खन्ना| जैन स्थानक में महासती मधुरता महाराज ने उपस्थिति सभा को उपदेश दिया कि कवि तुलसीदास ने संसार में पांच र|ों का उल्लेख किया है। उन्हीं में से तीसरा र| है दया का। संसार के सभी धर्मों में दया को ही धर्म का मूल बताया गया है। जब तक मन में दया और करुणा के भाव उत्पन्न नहीं होंगे, तब तक व्यक्ति दूसरों का दुख दूर नहीं कर सकता। जो व्यक्ति इंसानियत को भूल जाता है, उसके जीवन से दया समाप्त हो जाती है। अणगार मुनि के जीवन में दया के भाव थे तभी तो उन्होंने चींटियों की रक्षा के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दे दी। जो व्यक्ति क्रूर होता है, उसके जीवन में दया नहीं आ सकती। व्यक्ति 48 पुराणों और 32 आगमों का अध्ययन कर लें, दया के बिना सारा ज्ञान आत्मा को बर्बाद करने वाला बन जाता है। दया का दान ही मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत है। वहीं, सबसे विशुद्ध धर्म है, इस लिए दयावान बनिए।

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