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सांसारिक मोह-माया में लिप्त व्यक्ति प्रभु का सिमरन भूल रहा : साध्वी भारती

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के धार्मिक कार्यक्रम में प्रवचन करती हुईं साध्वियां। (दाएं) कार्यक्रम में उपस्थित...

Danik Bhaskar | Apr 02, 2018, 02:45 AM IST
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के धार्मिक कार्यक्रम में प्रवचन करती हुईं साध्वियां। (दाएं) कार्यक्रम में उपस्थित संगत। -भास्कर

भास्कर संवाददाता| नवांशहर

साध्वी मोनिका भारती जी ने कहा कि संसार की माया से लिप्त होकर संसार का होकर रह जाना अस्थिरता का प्रतीक है और माया के विषय को जान उससे निरलेप रहना स्थिरता का सूचक है। वह दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से राहों रोड स्थित गोमती नाथ मंदर में आयोजित सत्संग प्रवचन के दौरान उपस्थित लोगों को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि कहा कि संसार की सारी प्रक्रियाएं स्थिरता के नियम पर आधारित है। स्थिरता शब्द का विपरीत शब्द अस्थिरता है। एक इंसान की जिन्दगी में इस शब्द का एक अहम स्थान है। संसार की माया में लिप्त हो कर संसार का होकर रह जाना अस्थिरता की प्रतीक है और माया के विषय में जानकर उससे निरलेप रहना स्थिरता का सूचक है। अस्थिरता आवागमन के चक्कर में घुमाती है और स्थिरता इस चक्कर से सदा सदा के लिए निजात दिलवा देती है। एक बंधन है और दूसरी आजादी है। जैसे एक कमल का फूल और कीड़ा दोनों ही कीचड़ में पैदा होते है कीड़ा कीचड़ का संग करता है और कीचड़ के विषय में ही जानता है, लेकिन कमल से फूल से ऐसा नही होता वह कीचड़ से दोस्ती ना सूरज के साथ अपना रिश्ता जोड़ता है। वह खुद तो आनंद को प्राप्त करता ही है और साथ-साथ ही दुनिया को भी संदेश दे जाता है। यहां पर हमें यह संदेश मिलता है कि जो इंसान है उसका जीवन भी उस कीड़े की भांति है। इंसान भी संसार रूपी कीचड़ में जन्म लेकर इस संसार की ही होकर रहा जाता है। संसार में विषय विकारों रूपी कीचड़ में इंसान फंसकर इसमें धंसता ही जाता है और एक दिन अपने प्राणों का त्याग कर इस संसार से कूच कर जाता है। वह जिंदगी की सच्चाई को जान ही नही पाता। उसका मन अस्थिर ही रह जाता है उसे स्थिरता का आधार मिल ही नही पाता। इस इंसानी जिन्दगी की बुझारत को स्थिरता को जानने से ही समझा जा सकता है। इससे ही ईश्वर की प्राप्ति होगी।