मनुष्य जीवन प्रभु के सिमरन के लिए मिला है : शास्त्री

Nawashahar News - मंदिर शिव धाम नेहरु गेट में जारी श्री मदभागवत कथा के दौरान गोपाल कृष्ण शास्त्री ने बताया कि मनुष्य जीवन का जो उतम...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 08:30 AM IST
Nawanshahr News - human life is found for the lord of god shastri
मंदिर शिव धाम नेहरु गेट में जारी श्री मदभागवत कथा के दौरान गोपाल कृष्ण शास्त्री ने बताया कि मनुष्य जीवन का जो उतम अवसर तुम्हे मिला है वह बार-बार नहीं मिलेगा। इसके बाद भजन ‘तुम पग पग पर समझाते, हम फिर भी समझ न पाते’ सुना कर संगत को मनुष्य जीवन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गोविन्द का चिंतन करले ये समय बार-बार नहीं मिलेगा। नहीं तो पछताना पड़ेगा, बार-बार जीना, बार-बार जन्म, बार-बार मरना पड़ेगा। इसलिए राजाओं ने भी अपने राज्य पद का त्याग किया, बड़े-बड़े धनवान लोगों ने धन का त्याग किया। हरी की शरण में जो लोग जाते है, उनका कल्याण होता है। शांति किसको नहीं चाहिए जब तक आप अपने लक्ष्य पर ध्यान नहीं देंगे तब तक आपको शांति प्राप्त नहीं होगी। महाराज ने बताया की सब कुछ छोड़ कर जो लोग गोविन्द की भक्ति-भजन और गोविन्द में खो गए उन्हें शांति प्राप्त हो गई। जिन लोगों ने कृष्ण भगवान की भक्ति करली उन सभी भक्तों का कल्याण हुआ है और शांति प्राप्त हुई है। जो सबसे महत्पूर्ण है उसकी तरफ चलना चाहिए। वो है शांति, वो है आत्म, वो है कल्याण, वो है मोक्ष। कथा में विशेष तौर पर गौ सेवा मिशन के राष्ट्रीय प्रधान स्वामी कृष्णानंद भी शामिल हुए।

श्रीकृष्ण व सुदामा की दोस्ती का वृतांत सुना पंडाल में मौजूद भक्तजनों का जीवन धन्य किया

भजनों पर झूमती संगत। (इनसेट) संबोधित करते स्वामी कृष्ण नंद।

उन्होंने बताया कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा का सबको ज्ञान है। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। सुदामा ने अपनी प|ी को बतया कि वह श्रीकृष्ण के साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की प|ी ने पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर सुदामा को अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा अपने मित्र के महल पहंुच जाते है। श्रीकृष्ण के कानों तक जैसे ही यह बात पहुंची तो वह नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया श्रीकृष्ण सुदामा को सम्मान के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। वह जब घर पहुंचा तो सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी प|ी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे।

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