एनएसएस के 1500 समूहों ने किसानों को किया जागरूक नतीजा-2019 में 12% घट गईं पराली जलाने की घटनाएं

Patiala News - पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर एसएस मरवाहा ने धान की पराली जलाने के मुद्दे पर पंजाब...

Bhaskar News Network

Sep 16, 2019, 07:15 AM IST
Patiala News - 1500 groups of nss made farmers aware result 12 incidence of stubble burning in 2019
पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर एसएस मरवाहा ने धान की पराली जलाने के मुद्दे पर पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में विचार-विमर्श किया। उन्होंने किसानों से पराली जलाना बंद करने को कहा। इस विषय को लेकर और इसमें हुई प्रगति पर उन्होंने पीएयू के वाइस चांसलर पद्मश्री डॉ. बलदेव सिंह ढिल्लों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की। इस चर्चा में चार स्टेट यूनिवर्सिटी पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (जीएनडीयू) अमृतसर, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय लुधियाना ने भाग लिया। डॉ. ढिल्लों ने बताया कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए जागरूकता जरूरी है। उन्होंने फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी और पराली से खाद बनाने के लिए सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग की विकसित तकनीक के बारे में भी बताया। राज्य में अवशेष जलाने को रोकने के लिए पीएयू के योगदान को देखते हुए प्रो. मरवाहा ने कहा कि पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला से संबंद्ध कॉलेजों के लगभग 30,000 एनएसएस स्वयंसेवकों ने पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने खुलासा किया कि 2018-19 के दौरान 2017-18 की तुलना में आग जलने की घटनाओं में 12 फीसदी कमी आई है। राज्य में 4,500 गांवों का दौरा करने वाले 20-20 छात्रों के 1500 समूहों ने किसानों को पराली जलाने के हानिकारक प्रभावों से अवगत कराया।

कृषि अवशेष जलाने के प्रति सबसे ज्यादा सजगता मालवा में हुईं : डॉ. चरणजीत सिंह

पीपीसीबी के अधिकारी डॉ. चरणजीत सिंह ने बताया कि अक्टूबर-नवंबर में कम तापमान और हवा की दिशा, धान की पराली जलने, वाहनों के प्रदूषण से वातावरण पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि पीपीसीबी के जागरूकता मॉडल का पंजाब की मालवा बेल्ट में सराहनीय परिणाम निकला है। डॉ. डीएस भट्टी (अतिरिक्त शिक्षा निदेशक पीएयू) ने कहा कि प्रशिक्षण, किसान मेले, किसान-वैज्ञानिकों की मीटिंग्स, स्कूल और कॉलेज के छात्रों का जागरूकता अभियान, टीवी और धार्मिक नेताओं की प्रेरणा से पराली लगाने की घटनाआें में कमी आई है।

फसल के अवशेष आधुनिक यंत्रों से मिट्टी में दबाएं : किसान सूरज भान

नरेश कुमार | फिरोजपुर

फिरोजपुर के गांव मोरांवाली के सफल किसान सूरज भान ने बताया कि अवशेष को आग लगाने से जहां वातावरण दूषित होता है वहीं किसानों के कई मित्र कीड़े भी मर जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे अपनी 61 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। 55 एकड़ में बासमती 1121 की बिजाई की हुई है। उन्होंने कहा कि 4 एकड़ में अमरूद के बाग और 1 एकड़ में नीबू और किन्नू का बाग लगाया हुआ है। वह अपने बाग में सिर्फ आर्गेनिक ढंग के साथ ही उपज प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह कृषि विभाग की सिफारश अनुसार ही खेती करते हंै और कृषि के साथ सबंधित जिले में लगाए जाते कैंपों में उपस्थित हो कर खेती से सबंधित जानकारी हासिल कर अपने ज्ञान में विस्तार करते हैं। वह पिछले 12 सालों फसलों के अवशेष को आग लगाने की बजाय आधुनिक यंत्रों का प्रयोग कर जमीन में ही दबा रहे हैं।

7 साल से पराली न जलाने पर मानसा के किसान को राष्ट्रीय अवार्ड

परविंदर बराड़ | मानसा

सात साल से पर्यावरण समर्थक विधि के साथ धान की पराली न जलाने के बदले मानसा जिले के गांव घरागणा के किसान बलविंदर सिंह को कृषि खोज और कृषि विभाग की भारतीय सभा व किसान भलाई द्वारा एनएएससी कांप्लेक्स नई दिल्ली में सम्मानित किया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए गए बलविंदर सिंह पंजाब के उन 10 किसानों में शामिल है जिन्होंने पराली के प्रबंधन मंे अहम योगदान दिया है। समारोह में में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और नई दिल्ली के 1500 किसानों ने भाग लिया था।

तीन किसानों की कहानी, जिनसे आप भी पराली न जलाने की ले सकते हैं प्रेरणा...

अवशेष मिट्‌टी में दबाने से उपजाऊ शक्ति बनी रहती है

उन्होंने किसान भाइयों के सलाह दी कि अवशेष को खेत में एसएमएस कम्बाईन के द्वारा कटाई के बाद हैप्पीसीडर से मिट्टी में ही मिला दिया जाए तो जमीन की उपजाऊ शक्ति में भी विस्तार होता है। इसके अलावा खेत में पानी जरूरत के अनुसार ही प्रयोग किया जाना चाहिए। एक एकड़ को क्रमवार 8 दिन बाद पानी दिया जाना चाहिए।

पराली प्रबंधन में योगदान देने वाले पंजाब के 10 किसानों में बलविंदर सिंह भी

महिमा सरजा के जगतार सिंह ने 4 साल से धान की पराली को नहीं लगाई आग

एग्रो भास्कर | बठिंडा

बठिंडा जिले के गांव महिमा सरजा के किसान जगतार सिंह पिछले 4 साल से धान व गेहूं की पराली की रहंद-खुहंद को बिना आग लगाए खेती कर रहे हैं। जगतार का कहना है कि वे 2009 दिल्ली में आयोजित इंडिया एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई) में एग्रोटेक मशीनरी मेले से प्रभावित होकर धान व गेहूं की पराली को आग लगाना बंद कर दिया। जगतार संयुक्त परिवार के साथ खेती करते हैं। उन्होंने कुछ एकड़ में धान व गेहूं की नाड़ को आग न लगाने से शुरुआत की थी, लेकिन अब वो पूरी जमीन में ही गेहूं व धान की नाड़ को बिना आग लगाए खेती कर रहे हैं। जगतार के पास अपनी पुश्तैनी जमीन 46 एकड़ है जबकि उन्होंने ठेके पर भी जमीन ले रखी है, जिसे मिलाकर वे 90 एकड़ पर खेती करते हैं। जगतार का कहना है कि वो धान की फसल को मलचर, रिवर्सल पलाऊ, रोटावेटर से बिजाई करते हैं।

23 एकड़ जमीन के मालिक किसान बलविंदर सिंह विगत सात साल से पराली जलाने के बजाए वह इसको मिट्टी में वाह कर देते हैं। और इसे खाद के तौर पर इस्तेमाल कर कम पानी और कम कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करते फसल की बिजाई करेत हैं। वे कहते हैं कि सीआर 212 धान की किस्मों की बिजाई से घनी पराली का उत्पादन होता है। बहुत से किसान सोचते हैं कि धान की सीधी बिजाई के लिए हैपी सीडर का प्रयोग घनी पराली वाली किस्मों के लिए संभव नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि उनकी सलाह पर पहले अपने उनके भाइयों और फिर पड़ोसियों ने धान की पराली को आग लगाना की रिवायत कोे बंद कर दिया है। ऐसा करने से उन लोगों को एहसास हुआ कि उनकी मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में विस्तार हुआ है। बलविंदर कहते हैं कि वे अब खेती में किसी भी रसायन का प्रयोग नहीं करते हैं। क्योंकि जैसे जैसे पराली मं आग लगाना बंद होता है मिट्टी में बीमारियों के खिलाफ लड़ने के तत्व खुद ब खुद बढ़ने लगते हैं। मित्र जीव जमीन में अच्छे गुण लेकर आते हैं।

पराली को आग न लगाएं, खेती के लिए आधुनिक यंत्रों का प्रयोग करें

जगतार का कहना है कि वे 9 एकड़ में मिर्च और 70 एकड़ में धान की बिजाई करते हैं। इस साल चालू वित्तवर्ष के दौरान उन्होंने 20 एकड़ में आलू और 65 एकड़ में गेहूं की बिजाई की है। उन्होनंे अन्य किसानों से आग्रह किया कि वे वातावरण की शुद्धता को बनाए रखने के लिए धान व गेहूं की नाड़ में आग न लगाए और खेती के लिए आधुनिक यंत्रोंं का प्रयोग करें।

23 एकड़ जमीन के मालिक किसान बलविंदर सिंह विगत सात साल से पराली जलाने के बजाए वह इसको मिट्टी में वाह कर देते हैं। और इसे खाद के तौर पर इस्तेमाल कर कम पानी और कम कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करते फसल की बिजाई करेत हैं। वे कहते हैं कि सीआर 212 धान की किस्मों की बिजाई से घनी पराली का उत्पादन होता है। बहुत से किसान सोचते हैं कि धान की सीधी बिजाई के लिए हैपी सीडर का प्रयोग घनी पराली वाली किस्मों के लिए संभव नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि उनकी सलाह पर पहले अपने उनके भाइयों और फिर पड़ोसियों ने धान की पराली को आग लगाना की रिवायत कोे बंद कर दिया है। ऐसा करने से उन लोगों को एहसास हुआ कि उनकी मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में विस्तार हुआ है। बलविंदर कहते हैं कि वे अब खेती में किसी भी रसायन का प्रयोग नहीं करते हैं। क्योंकि जैसे जैसे पराली मं आग लगाना बंद होता है मिट्टी में बीमारियों के खिलाफ लड़ने के तत्व खुद ब खुद बढ़ने लगते हैं। मित्र जीव जमीन में अच्छे गुण लेकर आते हैं।

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