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फ्री इलाज के लिए 75 मरीज पहले चरण में चुने जाएंगे

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 03:10 AM IST

Patiala News - पटियाला स्थित सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर रेस्पिरेटरी डिसऑर्डर क्रॉनिक ब्रांकाइटिस मतलब पुरानी...

फ्री इलाज के लिए 75 मरीज पहले चरण में चुने जाएंगे
पटियाला स्थित सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर रेस्पिरेटरी डिसऑर्डर क्रॉनिक ब्रांकाइटिस मतलब पुरानी खांसी पर रिसर्च करने जा रहा है। रिसर्च का मकसद पुरानी खांसी को साइंटिफिक तरीके से ठीक करना है आैर इसके लिए आयुर्वेदिक दवा खोजना है। अगर अापको लगातार खांसी आ रही है और इसका ठीक से इलाज नहीं हो पा रहा है तो आप आयुर्वेद पद्धति से भी इलाज करवा सकते हैं।

इसके लिए एक प्रोजेक्ट सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद साइंसेस की तरफ से चलाया जा रहा है। पटियाला में इंस्टिट्यूट के डॉयरेक्टर डॉ. सुभाष की देखरेख में चल रहे इस प्रोजेक्ट के माध्यम से काली खांसी के मरीजों की पहचान करके उनका इलाज करना है। इंस्टीट्यूट के सहायक निदेशक और रिसर्च प्रोजेक्ट के प्रिंसिपल इनवेस्टीगेटर डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि प्रोजेक्ट में प्रिंसिपल इनवेस्टीगेटर डॉ. अमित कुमार, डॉ. दीप शिखा, डॉ. अंजली सहयोग दे रहे हैं। अभी तक आयुर्वेद में खांसी की विभिन्न दवा थीं लेकिन कोई साइंटिफिक दवा नहीं थी। अगर रिसर्च सही दिशा में रही तो जल्द ही आयुर्वेद में पुरानी खासी का पक्का इलाज संभव होगा। उन्होंने बताया कि दवाओं में जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

मरीजों को आने जाने का मिलेगा खर्च

पुरानी खांसी से परेशान आैर आयुर्वेद में इलाज करवाने के इच्छुक सेंट्रल आयुर्वेद इंस्टीट्यूट में जाकर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं। चेकअप शुरू होगा। रिपोर्ट के आधार पर सिलेक्ट किया जाएगा। सारा इलाज इंस्टीट्यूट की तरफ से फ्री होगा। तीन महीने तक मरीज को दवा दी जाएगी। इसके बाद हर 14 दिन बाद दवा के लिए इंस्टिट्यूट आना होगा। आने-जाने का खर्च भी इंस्टिट्यूट देगा।

शशांक सिंह|पटियाला

पटियाला स्थित सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर रेस्पिरेटरी डिसऑर्डर क्रॉनिक ब्रांकाइटिस मतलब पुरानी खांसी पर रिसर्च करने जा रहा है। रिसर्च का मकसद पुरानी खांसी को साइंटिफिक तरीके से ठीक करना है आैर इसके लिए आयुर्वेदिक दवा खोजना है। अगर अापको लगातार खांसी आ रही है और इसका ठीक से इलाज नहीं हो पा रहा है तो आप आयुर्वेद पद्धति से भी इलाज करवा सकते हैं।

इसके लिए एक प्रोजेक्ट सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद साइंसेस की तरफ से चलाया जा रहा है। पटियाला में इंस्टिट्यूट के डॉयरेक्टर डॉ. सुभाष की देखरेख में चल रहे इस प्रोजेक्ट के माध्यम से काली खांसी के मरीजों की पहचान करके उनका इलाज करना है। इंस्टीट्यूट के सहायक निदेशक और रिसर्च प्रोजेक्ट के प्रिंसिपल इनवेस्टीगेटर डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि प्रोजेक्ट में प्रिंसिपल इनवेस्टीगेटर डॉ. अमित कुमार, डॉ. दीप शिखा, डॉ. अंजली सहयोग दे रहे हैं। अभी तक आयुर्वेद में खांसी की विभिन्न दवा थीं लेकिन कोई साइंटिफिक दवा नहीं थी। अगर रिसर्च सही दिशा में रही तो जल्द ही आयुर्वेद में पुरानी खासी का पक्का इलाज संभव होगा। उन्होंने बताया कि दवाओं में जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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