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एनेस्थीसिया डाॅक्टर पर्दे के पीछे बड़ी भूमिका निभाते हैं : डीअारएमई

एक वर्ष पहले
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एनेस्थीसिया के क्षेत्र में मरीज को बेहोश करने की नई तकनीकों के आने से गंभीर रोगियों का इलाज अधिक सुरक्षित हो गया है। इनमें एक ब्लॉक तकनीक है। इसमें अंग विशेष (सर्जरी जहां होनी है) को सुन्न किया जाता है। रिसर्च बताती है कि हर 20 में से एक मरीज एनेस्थीसिया लेने के बाद भी हाेश में रहता है, लेकिन उसका शरीर हिलने-डुलने की हालत में नहीं होता। यह बात मेडिकल काॅलेज के एनेस्थीसिया डिपार्टमेंट की अाेर से कराई गई वर्कशाॅप के दाैरान डाॅ. प्रमाेद कुमार ने रखे। उन्हाेंने बताया कि एनेस्थीसिया में भी जिस प्रकार की दवाओं का इस्तेमाल होता हो मरीज की उम्र, ऊंचाई, और वजन के मुताबिक दिया जाता है। साथ ही ये भी देखा जाता है कि मरीज किसी अन्य प्रकार की दवा तो नहीं ले रहा है या वो सिगरेट पीने का आदी तो नहीं है।

वर्कशाॅप में बताैर मुख्य मेहमान के ताैर पर डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च डाॅ. अवनीश कुमार ने शिरकत की। उनके साथ अाेएसडी सीएम डाॅ. ग्रिरीश साहनी, मेडिकल काॅलेज के प्रिंसिपल डाॅ. हरजिंदर सिंह माैजूद रहे। प्राेग्राम का शुभारंभ शमाराेशन करने के बाद अाेर राष्ट्रीय गान के बाद हुअा। मुख्य मेहमान डाॅ. अवनीश ने कहा कि इनके हाथ में ही मरीज की जान अटकी होती है। बेहोशी की दवा थोड़ा भी कम या ज्यादा होने पर मरीज की मौत तक हो सकती है। ये डॉक्टर पर्दे के पीछे बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिस तरह किसी फिल्म में लेखक व डायरेक्टर की होती है। शहर में कई बेहतर एनेस्थेसिया के डॉक्टर मौजूद है, जो गंभीर मरीजों की सफल सर्जरी कर उनको दूसरी जिंदगी देने का काम किया है। उन्होंने कई ऐसे मरीजों की जान बचाई है, जिसकी आस परिजनों ने छोड़ दी थी। उन मरीजों की दूसरे अस्पतालों ने सर्जरी से इंकार कर दिया था। यहां डाॅ. पारस पांडव ने कहा कि सर्जरी दिल की हो या फिर दिमाग की। छोटी हो या बड़ी। इन डॉक्टरों के बिना संभव नहीं है। जिन्हें बेहोशी वाला डॉक्टर भी कहा जाता है।

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