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न्यायपालिका को डटकर लड़ाई लड़नी होगी

भारतीय न्यायपालिका को घटनाएं जिस खतरनाक मोड़ पर ले आई हैं क्या उसके लिए कोई रूपक है? देश के शीर्ष न्यायाधीशों को जिस...

Danik Bhaskar | May 01, 2018, 02:55 AM IST
भारतीय न्यायपालिका को घटनाएं जिस खतरनाक मोड़ पर ले आई हैं क्या उसके लिए कोई रूपक है? देश के शीर्ष न्यायाधीशों को जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, वह कितना गंभीर है? जज आपस में बहस कर रहे हैं, न्यायपालिका में लोगों का भरोसा कमजोर पड़ा है और कार्यपालिका इस पर वार करने के लिए तैयार है।

जब सरकार किसी गरीब नागरिक को अधिकारों से वंचित कर देती है तो वह अदालतों में नहीं तो कहां जाता है? यदि वह देखे कि सर्वोच्च न्यायालय को उसी सरकार से संरक्षण की जरूरत है तो उसके भरोसे का क्या होगा? पिछले ही हफ्ते सरकार चीफ जस्टिस का बचाव करती दिखी। उसी हफ्ते कानून मंत्री ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर कॉलेजियम की दो लंबे समय से लंबित नियुक्तियों में से एक को मंजूरी देते हुए दूसरे को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया। सरकार की इस दलील में दम नहीं है कि केरल के कई जज हैं या वरिष्ठता वाले कई जज हैं। सरकार तो न्यायपालिका को सिर्फ यह याद दिला रही है कि स्पष्ट बहुमत के साथ वही अंतिम बॉस है। नेता जानते हैं कि जजों ने काफी नैतिक जगह गंवा दी है। अब वे उस पर कब्जा करने के लिए बढ़ रहे हैं। मामला सत्तारूढ़ दल तक सीमित नहीं है। न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति ने लोकसभा में 10 फीसदी से कम सांसदों वाली पार्टी को भी महाभियोग प्रस्ताव लाने की हिम्मत दे दी। राजनीतिक लाभ तो कुछ हुआ नहीं, सुप्रीम कोर्ट और खासतौर पर देश के मुख्य न्यायाधीश को और कमजोर जरूर कर दिया। ऐसी हालत में उस सरकार के जोशीले बचाव की उन्हें बिल्कुल जरूरत नहीं थी, जिससे जवाब मांगने की उनसे अपेक्षा रहती है। भाजपा-कांग्रेस एक-दूसरे को चाहे जितना नापंसद करती हों पर न्यायपालिका को उसकी जगह दिखाने में वे एक हैं। याद है इस बंटी हुई संसद ने भी वह कानून किस तेजी से पारित किया था, जिसमें जजों को नियुक्त करने की उच्च न्यायपालिका की शक्तियों में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) गठित कर कटौती का प्रावधान था। 4-1 के आदेश से एनजेएसी के गठन को रद्द करने वाली पांच जजों की बेंच ने यही तर्क दिया था कि वे ‘कार्यपालिका के एहसान के जाल’ में फंसना नहीं चाहते। लेकिन, अब यह एनजेएसी के बिना हो रहा है।

चीफ जस्टिस पर कॉलेजियम के शेष चार जजों ने सवाल उठाए हैं। वे लोया फैसले व मेडिकल कॉलेज केस पर आंदोलनकारी वकीलों के निशाने पर हैं। कांग्रेस से महाभियोग की धमकी मिलने और भाजपा सरकार के उनके बचाव में आने के बाद वे रक्षात्मक मुद्रा में हैं। क्या उनसे अपने संस्थान के लिए लड़ने की अपेक्षा की जा सकती है, खासतौर पर तब जब वे अपने असंतुष्ट सहयोगी जजों से चर्चा के अनिच्छुक हैं? कॉलेजियम द्वारा मंजूर की गई नियुक्तियों में विलंब आम है। एक मामले में कॉलेजियम ने हाई कोर्ट जज को जो कार्यकाल दिया था, वह भी बदल दिया और कॉलेजियम ने अनिच्छा से ही सही स्वीकार कर लिया। इससे उसकी हिम्मत बढ़ी और उसने केएम जोसेफ की नियुक्ति को पुनर्विचार के लिए भेज दिया। यदि कॉलेजियम झुक गया या इसके भीतर विवाद जारी रखा तो सरकार अगला और अधिक दुस्साहसी कदम उठा सकती है। वह क्या होगा, अटकलें लगाई जा सकती हैं। कोई यह भी सोच सकता है जो आज असंभव लगता है : सरकार वरिष्ठता का सिद्धांत तोड़कर वरिष्ठतम जज जस्टिस रंजन गोगोई को अगले चीफ जस्टिस के रूप में मंजूरी न दे।

सरकार का यह मानना सही है कि न्यायपालिका हाल ही में जन सहानुभूति काफी खो चुकी है। अदालतों में लंबित मामले होते हुए जनहित याचिकाओं से सुर्खियां बटोरने की इसकी प्रवृत्ति अनदेखी नहीं रही है। एनजेएसी को तत्काल खारिज किए जाने से इस धारणा की पुष्टि हुई कि जज केवल अपने हितों की रक्षा में ही तेजी दिखाते हैं। यदि लोया फैसले के आलोचकों पर कार्रवाई की मांग वाली जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस जोर देते हैं तो यह छवि और पुख्ता होगी। यही वक्त है कि जजों और विधि जगत की हस्तियों को आपस में झगड़ने की बजाय संस्थान के लिए मिलकर लड़ना चाहिए।

न्यायपालिका के मौजूदा संकट के लिए रूपक की तलाश मुझे स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दौर में ले गई। 1906-07 में अंग्रेज एक बिल लेकर आए जो उन्हें बिना उत्तराधिकारी के मरने वाले किसान (या जाट, जो पंजाब में उसे कहा जाता था) की जमीन पर कब्जे के अधिकार देता था। भगत सिंह के चाचा अजित सिंह और लाला लाजपत राय ने इसके खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया। उसका गीत अब के फैसलाबाद के संपादक बांके दयाल ने लिखा था : ‘पगड़ी संभाल जट्‌टा, पगड़ी संभाल जट्‌टा ओए तेरा लुट न जाए माल जट्‌टा।’ इतिहास में इसे पगड़ी संभाल आंदोलन ही कहा गया। लाला लाजपत राय और अजित सिंह को बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। मैं इसे पूरी सावधानी और बहुत विचारपूर्वक लिख रहा हूं। यह भारतीय न्यायपालिका का ‘पगड़ी संभाल जट्‌टा’ पल है। प्रतिबद्ध न्यायपालिका की इंदिरा गाधी की खोज और 1973 के बाद उसके दमन के पश्चात यह इस संस्थान के लिए सबसे बड़ा खतरा है। न्यायपालिका ने फौलादी कॉलेजियम से अपने को हमेशा के लिए सुरक्षित मानने के करीब दो दशक बाद यह खतरा आया है। इस दौरान इसने कमजोर नियुक्तियों, तीव्र सुधार टालने, प्रभावशाली लोगों के मामलों में विलंब के प्रति बढ़ते अधैर्य की अनदेखी करने, प्रचार के प्रति जजों की कमजोरी पर अविश्वास जैसा काफी कुछ गलत किया है, जिससे यह इस हद तक कमजोर हो गई है। जजों को हमने इस सब में सावधान किया था।

यदि न्यायपालिका यह लड़ाई हार गई तो इसे अपूरणीय क्षति होगी और हम सारे नागरिकों को खमियाजा भुगतना होगा। चीफ जस्टिस को पसंद हो या न हो पर वे ऐसी स्थिति में है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट और उनके कॉलेजियम के लिए डटकर लड़ना होगा। जहां तक उनके सहयोगी जजों की बात है, 1973-77 के इतिहास की याद पर्याप्त होगी। इंदिरा गांधी के दमन से लाभ लेने वाले जज का नाम किसी को याद नहीं है। लेकिन, जिन जजों ने उनकी वरिष्ठता की अनदेखी करने पर विरोध में इस्तीफे दिए थे वे भारतीय न्यायपालिका के हॉल ऑफ फेम के सदस्य हैं। आज के कुछ जजों को फिर ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta