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घाटी में बिगड़े माहौल के 2 साल बाद गुरुद्वारा श्री पत्थर साहिब में संगत की संख्या रोज 10 गुणा बढ़ी

लद्दाख स्थित गुरुद्वारा पत्थर साहिब में इस साल श्रद्धालुओं की गिनती में खासा इजाफा हुआ है। गुरु नानक देव जी से...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 19, 2018, 02:35 AM IST

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    लद्दाख स्थित गुरुद्वारा पत्थर साहिब में इस साल श्रद्धालुओं की गिनती में खासा इजाफा हुआ है। गुरु नानक देव जी से जुड़े इस गुरुद्वारे में रोजाना 5 हजार के करीब श्रद्धालु माथा टेकने पहुंच रहे हैं। 2016 से आतंकियों के खिलाफ शुरू हुए ऑपरेशन आल आउट, बुरहान वानी की मौत और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद श्रीनगर मार्ग से लेह जाने यात्रियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई थी। तब यहां सीजन में श्रद्धालुओं की संख्या 500 से 1000 के बीच रह गई थी। इस गुरुद्वारे का निर्माण सेना द्वारा किया गया है और संचालन भी सेना ही करती है। लेह स्थित सेना की 14 कोर में तैनात अलग-अलग यूनिट्स को इस गुरुद्वारे में सेवा की जिम्मेदारी दी जाती है। 2016 से फ़र्स्ट सिख रेजीमेंट गुरुद्वारे का संचालन कर रही है। गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने वालों में लेह लद्दाख घूमने आने वाले यात्रियों के अलावा स्थानीय लोग शामिल हैं।

    गुरुद्वारा साहिब का निर्माण सेना ने ही करवाया लंगर सुबह 7:30 से रात 9:30 बजे तक श्रद्धालुओं के ठहरने की फिलहाल कोई व्यवस्था नहीं

    किसी कमेटी की बजाय सेना करती है सारा बंदोबस्त

    गुरुद्वारा के प्रमुख सेवादार सूबेदार हरपाल सिंह ने बताया कि सेना की अलग-अलग बटालियन और यूनिट्स को इस गुरुद्वारा साहिब की सेवा का मौका मिलता है। सिख रेजीमेंट को सालों बाद यह मौका मिला है। हमारे सैनिक अलग-अलग शिफ्टों में गुरुद्वारा साहिब में लंगर से लेकर सारे प्रबंधन के काम में जुटे हैं। यहां मई से सितंबर तक पांच महीने श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। सिविलियन को खास हिदायत यह है कि यहां उनके रहने का कोई प्रबंध नहीं है।

    लद्दाख स्थित गुरुधाम की यात्रा मई से सितंबर तक, 5000 श्रद्धालु रोज पहुंच रहे

    इतिहास...

    गुरु नानक देव अपनी तीसरी विश्व यात्रा (उदासी) के दौरान तिब्बत और नेपाल की यात्रा पर गए थे। लौटते हुए वह लेह लद्दाख होते हुए आए थे। मान्यता है कि इसी स्थान पर उन्होंने एक राक्षस के प्रकोप से स्थानीय लोगों को राहत दिलवाई थी। राक्षस ने भक्ति में लीन गुरु नानक देव जी पर एक चट्टान फेंकी थी। वह चट्टान गुरु साहिब की पीठ से जा टकराई। आज भी वह चट्टान गुरुद्वारा में स्थित है और माना जाता है कि उस पर गुरु साहिब की पीठ और राक्षस के घुटने की छाप मौजूद है। इसी चट्टान के चलते गुरु घर का नाम पत्थर साहिब पड़ा। जालंधर से लगभग 850 किमी दूर यह गुरुद्वारा लेह कारगिल मार्ग पर स्थित है। लेह शहर की दूरी यहां से 23 किमी है। श्रीनगर लेह मार्ग अक्टूबर में बर्फबारी के चलते मई तक बंद रहता है। लेह एयरपोर्ट के चलते हवाई मार्ग से साल के 12 महीने यहां पहुंचा जा सकता है।

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