• Hindi News
  • Punjab
  • Sangat
  • मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए
--Advertisement--

मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए

मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए सरकार के ‘टैक्स टेररिज्म’ को खत्म करने का। चार साल बाद भी वादा अधूरा...

Dainik Bhaskar

May 22, 2018, 03:00 AM IST
मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए
मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए सरकार के ‘टैक्स टेररिज्म’ को खत्म करने का। चार साल बाद भी वादा अधूरा है। बीजेपी के धुर समर्थक भी मानते हैं कि आयकर विभाग को अव्यावहारिक लक्ष्य देने से सभी करदाताओं का टैक्स असेसमेंट असंगत तरीके से होने लगा। इसका मकसद करदाताओं पर इस बात के लिए दबाव डालना है कि अपील प्रक्रिया तो लंबी चलेगी, तब तक वह टैक्स डिमांड की 20% राशि पहले जमा कर दें। रेवेन्यू बढ़ाने का दबाव इतना है कि टैक्स विभाग 31 मार्च से पहले बैंकों पर मार्च का टीडीएस देने के लिए दबाव डाल रहा था, जबकि इसे जमा करने की अंतिम तारीख अप्रैल तक होती है। इससे इस साल तो कलेक्शन ज्यादा दिखेगा, लेकिन अगले साल घट जाएगा। लेकिन दबाव इतना अधिक है कि अगले साल की परेशानी को भुला दिया जाता है।

ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि यह बड़ी कंपनियों की समस्या है, उन्हें ऐसे मामलों में कोर्ट से स्टे ऑर्डर लेना पड़ेगा। लेकिन दुर्भाग्यवश मध्य वर्गीय लोगों को भी सरकार की ज्यादा रेवेन्यू जुटाने की नीति का शिकार होना पड़ रहा है। इसका उदाहरण देखिए। मुंबई में खाली जमीन बहुत कम है। इसलिए नया कंस्ट्रक्शन पुरानी बिल्डिंग को गिराकर ही होता है। पिछले कई दशकों में फ्लोर स्पेस इंडेक्स कई गुना बढ़ गया है। जब डेवलपर बिल्डिंग बनाने आता है तो वहां पहले से मौजूद फ्लैट मालिकों को नई बिल्डिंग में फ्लैट देने के साथ पैसे भी देता है। टैक्स विभाग इसमें हिस्सेदारी चाहता है, जबकि कोर्ट का फैसला इसके खिलाफ है। विभाग का तरीका ज्यादा कष्टप्रद है। कोऑपरेटिव सोसायटी के मेंबरों को हुई परेशानी के बदले डेवलपर ने उन्हें जो ‘हार्डशिप अलाउंस’ दिया, उसके बदले टैक्स विभाग ने सोसायटी से टैक्स की डिमांड की। टैक्स अधिकारियों का तर्क था कि अलाउंस भले मेंबरों को मिला हो, जमीन और बिल्डिंग की मालिक सोसायटी है। सोसायटी ने कहा कि इस तर्क से तो जब कोई मेंबर फ्लैट बेचेगा तो सोसायटी को कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ेगा। टैक्स विभाग के खिलाफ अपील दायर करने से पहले सोसायटी यानी इसके मेंबरों को करोड़ों रुपए के विवादित टैक्स का 20% जमा करना पड़ा।

सोसायटी को मेंबरों से पैसे जुटाकर टैक्स जमा करना पड़ा और न्याय पाने के लिए भी अलग से फंड देना पड़ा। कटे पर नमक छिड़कते हुए टैक्स विभाग ने मेंबरों का दोबारा असेसमेंट किया और उनके सामने भी टैक्स की डिमांड रख दी। मेंबरों को आश्चर्य हुआ कि टैक्स अफसर उनसे टैक्स वसूलने के लिए वही तर्क दे रहा है, जो उसने सोसायटी के सामने रखा था। यानी टैक्स अफसर अपने ही पुराने आदेश के विपरीत जा रहा था। अब मेंबरों को अपील में जाने से पहले विवादित राशि का 20% जमा करना पड़ेगा। मेंबरों को भले दो टैक्स देने के लिए पैसे जुटाने पड़े हों, टैक्स अफसर का कलेक्शन टारगेट तो पूरा हो गया।

बहुत संभव है कि कोर्ट में सोसायटी और मेंबर, दोनों जीत जाएं। उसके बाद उन्हें रिफंड के लिए चक्कर लगाने पड़ेंगे। टैक्स विभाग का यही बर्ताव लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि ईमानदारी से टैक्स जमा करने का कोई मतलब नहीं। सरकार को लग सकता है कि इन अमीर करदाताओं से उनका राजनीतिक भविष्य प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे करदाताओं की संख्या बहुत कम है। लेकिन इससे सेंटिमेंट और निवेश का वातावरण प्रभावित होता है। निवेश नहीं हुआ तो नई नौकरियां नहीं निकलेंगी और वोट नौकरियों को प्रभावित करता है। क्या सरकार इस दिशा में कुछ करेगी?

- (ये लेखक के निजी विचार हैं)

पर्सनल फाइनेंस/इंवेस्टमेंट

हर्ष रूंगटा

इन्वेस्टमेंट एडवाइजर

आम लोग हो रहे हैं ऊंचे टैक्स टारगेट का शिकार

X
मौजूदा सरकार ने 2014 में एक वादा किया था- यूपीए
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..