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संघर्षों से जूझकर ही बनते हैं बड़े लीडर

डेविड नोवाक, दुनिया की सबसे बड़ी रेस्टोरेंट कंपनी ‘यम ब्रांड्स’ के पूर्व सीईओ। दुनिया के 135 देशों में करीब 44 हजार...

Dainik Bhaskar

Jun 25, 2018, 03:15 AM IST
संघर्षों से जूझकर ही बनते हैं बड़े लीडर
डेविड नोवाक, दुनिया की सबसे बड़ी रेस्टोरेंट कंपनी ‘यम ब्रांड्स’ के पूर्व सीईओ। दुनिया के 135 देशों में करीब 44 हजार रेस्टोरेंट। 66 साल के नोवाक बिजनेसमैन के साथ लेखक और परोपकारी भी हैं। इसके अलावा डिजिटल लीडरशिप डेवलपमेंट प्लेटफॉर्म ‘ओगोलीड्स’ के फाउंडर हैं। हाल ही में नोवाक ने अमेरिका के दिग्गज सीईओ के संघर्षों के बारे में बताया। नोवाक कहते हैं कि समस्याएं सभी के जीवन में आती हैं, लेकिन उनसे घबराने की बजाय दृढ़ रहकर सीखना बड़ी बात है। इन लीडर्स ने जीवन की विसंगतियों को तरक्की के रास्ते में बदला। पढ़िए इनके प्रेरक किस्से...

तीन बड़ी कंपनियों के सीईओ बता रहे हैं विषम परिस्थितियों में आगे बढ़ने के तरीके- कड़े फैसले लें, चुनौतियां स्वीकारें, हर काम को बड़ा समझें

चुनौती : वैश्विक मंदी के दौर में भयंकर दबाव

जेमी डाइमन

सीईओ, जेपी मॉर्गन चेज (अमेरिका का सबसे बड़ा बैंक)

उपाय  इनके फोन पर हजारों कर्मचारी जुटे, बैंक को बचाया

जेमी जेपी मॉर्गन और इसकी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी बेयर स्टर्न्स को 2008 के आर्थिक संकट से उबारने के लिए जाने जाते हैं। बेयर स्टर्न्स पर डूबने का खतरा था। उन्होंने रात को कंपनी के शीर्ष अधिकारियों को फोन किया और कहा कि हमें इसे बचाना है। इसके बाद हजारों कर्मचारी वीकेंड में दफ्तर आए। डाइमन ने अपने सभी दौरे रद्द किए, ताकि उनसे किसी भी समय घर या दफ्तर में संपर्क किया जा सके। इस घटना से सीख के तौर पर वह कहते हैं, ‘संकट से निपटने के लिए पहले से तरीके होने चाहिए। हमारे बैंक में रिपोर्टिंग का बेहद मजबूत सिस्टम था, जिसकी वजह से हम बच पाए।’ स्टाफ के बारे में वह कहते हैं, आप बिना आर्मी के युद्ध शुरू नहीं कर सकते। संकट के समय सरकार ने 9 बड़े बैंकों को पैकेज दिया था, जेपी मॉर्गन ने सबसे पहले लौटाया था।

चुनौती : अमेरिकी कल्चर से तालमेल में मुश्किल

इंदिरा नूयी

सीईओ, पेप्सिको

(अमेरिका की सबसे बड़ी बेवरेज कंपनी)

उपाय  बेसबॉल के जरिए अमेरिका से गहरा रिश्ता जोड़ा

इंदिरा 1978 में येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में पढ़ने अमेरिका आई थीं। इससे पहले वह कभी भारत से बाहर नहीं गई थीं। वह कहती हैं, ‘शुरू के दो हफ्ते तो बेहद परेशानी वाले थे। हमारे साथ कोई भारतीय नहीं था। दूसरे देशों से आए स्टूडेंट्स को समझना काफी मुश्किल था। कई बार मन में आया कि प्लेन में बैठूं और घर चली जाऊं। धीरे-धीरे दूसरे देशों के स्टूडेंट्स के साथ घुलने-मिलने लगी। बेसबॉल अमेरिका के रग-रग में है। इसलिए वहां के माहौल में खुद को रमाने के लिए मैंने भी बेसबॉल देखना-सीखना शुरू किया। मैं बेसबॉल टीम न्यूयॉर्क यांकीज के हॉस्टल में अक्सर जाती। उन्होंने मुझे बेसबॉल सिखाया। मैं खेल से तो पूरी तरह नहीं जुड़ी, लेकिन यांकीज मेरी जिंदगी का हिस्सा हो गए। यांकीज ने ही मुझे फिट रहना और दूसरों से जुड़ना सिखाया।

चुनौती : संघर्ष से भरा बचपन, कोई सुविधा नहीं

ब्रायन कॉर्नेल

सीईओ, टारगेट

(अमेरिका का दूसरा बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर रिटेलर)

उपाय  हर तरह काम किया ताकि खुद का वजूद बना सकें

कॉर्नेल का बचपन देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह कभी सीईओ बनेंगे। बचपन में ही पिता की मौत हो गई। मां हमेशा बीमार रहती थी। परिवार चलाने के लिए उन्होंने लॉन की सफाई और गाड़ियां धोने जैसे काम भी किए। लेकिन वह कहते हैं, ‘मुझे कभी अपने बैकग्राउंड पर अफसोस नहीं हुआ। मैंने सोचा कि मुझे परफॉर्म करना है, मौके का फायदा लेना है और आगे बढ़ना है। मैं आर्थिक स्थिति को किसी बात में आड़े नहीं आने देना चाहता था। स्कूल में था तो सोचता था कि टेस्ट का रिजल्ट पर बात पर निर्भर नहीं करेगा कि मेरे पिता कौन हैं या मैं कितना अमीर हूं। खेल के मैदान पर होता तो सोचता कि जो बेहतर परफॉर्म करेगा वही आगे बढ़ेगा। ऑफिस में भी यही देखा जाएगा कि आपके सामने जो काम और चुनौतियां हैं, उनसे आप कैसे निपटते हैं।’

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