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गो-हत्या मुसलमानों के लिए नहीं, डॉलर के लिए हो रही है

Danik Bhaskar | Jun 07, 2018, 03:50 AM IST

जवाब : सबसे बड़ी बात तो यह थी कि 104 सीट आने के बाद हर जगह नगाड़े बज रहे थे। नगाड़े आप तब बजाते जब आपको बहुमत मिल गया होता। क्या जरूरत थी, ऐसा करने की। आप यह क्यों कहते हैं कि हम सब जगह अपना राज स्थापित कर लेंगे। आप तो सबकी सेवा करिए और वो करिए जो आप कह रहे थे। प्रधानसेवक, चौकीदार बनकर रहिए। झूठ मत बोलिए।


जवाब : इस प्रकार के सम्मान के पात्र कुछ विशिष्ट व्यक्ति ही होते हैं। ऐसे ही लोगों को सम्मानित किया जाता है। किंतु जो केवल सरकार के ही सम्मान से सम्मानित हो रहे हैं, वो इसके पात्र नहीं हैं।


जवाब : हम लोगों को मोदी के कार्यकाल से बहुत निराशा हुई है। निराशा का कारण उनका प्रधानमंत्री होना नहीं है। उन्होंने कहा था कि ‘यूपीए सरकार के जमाने में भारत गो-मांस का निर्यात करता है। इससे मेरा हृदय जल रहा है, अापका जला है कि नहीं?’ हमें उम्मीद थी कि उनके प्रधानमंत्री बनते ही यह कलंक मिट जाएगा। आज तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अपितु बढ़ा ही है। दूसरा, कॉमन सिविल कोड लाएंगे, वह भी नहीं आया। कश्मीर की स्थिति, धारा 370 भी समाप्त नहीं हुई। आतंकवाद में कोई कमी नहीं आई। हमें उम्मीद थी कि काशी में गंगोत्री से गंगा की अविरल धारा लाएंगे, लेकिन नहीं आ पाई। हमारा तो मुंह ही बंद कर दिया इन्होंने। अगर अब इनकी सरकार गई तो लोग कहेंगे- हिंदुओं की सरकार बनी थी, तब तुमने गो-हत्या बंद क्यों नहीं करवाई।


जवाब : भारत में आंशिक रूप से गो-हत्या बंद है। कुछ प्रदेशों में गो-हत्या धड़ल्ले से होती है। गो-भक्त ऐसा होने से रोकते हैं। प्राय: यह देखा जाता है कि पुलिस रुपए लेकर गो-हत्या करने वालों को छोड़ देती है। इससे गो-भक्तों का दिल दुखता है। पुलिस वाले नहीं देखते हैं तो इनके हाथ-पैर भी चलते हैं। आप ये क्यों कहते हैं कि ये असामाजिक तत्व हैं। देश के हित में गो-हत्या बंद होना चाहिए। गो-हत्या मुसलमानों के लिए नहीं हो रही है, डॉलर के लिए हो रही है। गोमाता केवल हिंदू की नहीं है, मुसलमान की भी है।


जवाब: प्रारंभ से ही जनता को भ्रम में रखा गया है। मामला कोर्ट में था और कोर्ट से वहां स्टे लगा हुआ है। आप कोर्ट में तो कुछ कर नहीं रहे हैं और जनता से कहते हैं कि हमें वोट दो तो हम मंदिर बना देंगे। ये धोखा है। राम मंदिर के लिए इन्होंने शिलान्यास करवाया था, शिलान्यास गर्भगृह से दूर करवाया। जबकि जनता की मांग थी कि जहां भगवान राम का जन्म हुआ है, उसी जन्मभूमि पर राम मंदिर बनाया जाए। जब हम गए थे शिलान्यास करने तो इसी भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार ने हमें कैद कर लिया था। हमने राम जन्मभूमि पुनर्निर्माण समिति बनाई और उसमें एक पक्ष बने। हमने सिद्ध कर दिया कि इस जन्मभूमि पर मस्जिद पहले भी कभी नहीं थी, आज भी नहीं है।


जवाब : सरकार में ताकत है तो देश में जहां शरणार्थी आ रहे हैं, उन्हें वहीं बसवाओ। म्यांमार से रोहिंग्या निर्वासित हो रहे हैं तो उन्हें म्यांमार में ही बसवाना चाहिए।


जवाब : दलित समाज के अभिन्न अंग हैं। उनके साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होना चाहिए। अगर हमारे पास भोजन है, और दलित और हम दो ही खाने वाले हैं, तो हम चाहेंगे कि दलित पहले खाए। बचे तो हम खाएं। हम समझा रहे हैं और हम काम कर रहे हैं उनके बीच। हम दलितों-आदिवासियों के बीच जाते हैं, जाएंगे।


जवाब : मंदिर जाएं आपत्ति नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि भारत में अभी ऐसे लोग हैं, जो निर्णायक हैं और उनकी शरण में आपको जाना ही पड़ेगा। आज नहीं तो कल।





सत्ता लोलुपता, अदूरदर्शिता से कोई भी दल मुक्त नहीं है


जवाब : किसी राजनीतिक दल या राजनेता की समीक्षा मैं नहीं करता। सत्ता लोलुपता, अदूरदर्शिता की चपेट से कोई भी दल मुक्त नहीं है। मैकाले की चलाई शिक्षा पद्धति से जिनका मस्तिष्क और हृदय बना है वो भारत को स्वस्थ्य राजनीति नहीं दे सकते। वो किसी भी दल के क्यों ना हों। वो भारत को परख भी नहीं सकते।


जवाब : ये सब राजनीतिक दलों के हथकं‌डे हैं। संप्रदाय शब्द का अर्थ विकृत ढंग से लिया गया है। संप्रदाय का अर्थ है सनातन परंपरा से, ज्ञान विज्ञान को प्राप्त करने की विधा। सनातन गुरु परंपरा। विवाद राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की देन है। सद्भावपूर्वक संवाद न होने के कारण विवाद होता है। सिर्फ हिंदू-मुस्लिम का ही एक विवाद नहीं है। पति-प|ी तलाक के लिए भी विवाद होता है। व्यक्ति और समाज की संरचना गलत है, उसका विस्फोट है यह।


जवाब : सत्ता लोलुपता और अदूरदर्शिता भारत में राजनीति का पर्याय बन चुकी हैं। सैद्धांतिक धरातल पर भारत घोर परतंत्र देश है। इसकी शिक्षा की प्रणाली सनातन वैदिक आर्य सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। शिक्षण संस्थान आदि में विसंगति की पराकाष्ठा है। रक्षा की प्रणाली, सेवा और उद्योग के प्रकल्प भी भारत में अपने नहीं हैं। संविधान की आधारशिला भी भारत की अपनी नहीं है। संवैधानिक धरातल पर हिंदू एक नंबर का नागरिक नहीं है। पाश्चात्य जगत की अंधानुकृति भारत के पतन का एक मुख्य कारण है। हमारी कोई पहचान नहीं रह गई है। राजनीतिक दलों में भी अपने दल की सीमा में सद्‌भावपूर्वक संवाद खत्म हो गया है। माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने जैसे पत्रकारिता का सहारा लेकर वक्तव्य प्रसारित किया, उससे सिद्ध होता है कि न्यायतंत्र में भी पर्याप्त विसंगति है।


जवाब : अभी सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। निर्णय कब आएगा? अनुकूल निर्णय आएगा या प्रतिकूल निर्णय आएगा? निर्णय में कितना समय लगता है? निर्णय हिंदुओं के प्रतिकूल आया, तब क्या होगा? अनुकूल ही आ गया, तो मुस्लिम क्या प्रतिक्रिया करेंगे? इसलिए सब भविष्य के गर्भ में है। विभाजन के बाद का भारत जैसा होना चाहिए था, उस ढंग से नींव डाली जाती तो यह समस्या ही नहीं होती।


जवाब : मुझे मध्यस्थता करने की क्या जरूरत है। मध्यस्थता तब होती है, जब दोनों पक्ष स्वीकार करें। किसी ने उनको स्वीकार नहीं किया? आज रामलला तंबू में हैं। वो मेरे कारण हैं। मैंने अगर रामालय ट्रस्ट में हस्ताक्षर कर दिया होता तो मंदिर-मस्जिद दोनों का निर्माण हो गया होता। मैंने जो निर्णय दिया नरसिंहराव और वाजपेयी सरकार ने भी उसके विरोध में कदम उठाने का साहस नहीं किया। मुस्लिम तंत्र भी हमारे प्रतिकूल आज तक तो नहीं हुआ कभी, तो हमको मध्यस्थता करने की जरूरत क्या है?


जवाब : सरकार जाने सरकार की बात। हम तो यह जानते हैं कि अवैध रीति से मध्य प्रदेश हो या बंगाल, सब प्रांत भरे हुए हैं। कल अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं पर विपत्ति आ जाती है, तो वो कहां जाएंगे? कल अमेरिका की सरकार ही खदेड़ना प्रारंभ कर दें, तो हमारे व्यक्तियों को हम लेंगे कि नहीं? इसलिए किसी भी नीति के निर्धारण में पूरे राष्ट्रीय-विश्वस्तर का दृष्टिकोण होना चाहिए। मानवता का पक्ष होना चाहिए और राष्ट्र की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। यह देखना पड़ेगा कि व्यक्ति राष्ट्रद्रोही न हों, हमारे देश के प्रति आस्था रखते हों।

विभाजन के बाद भारत जैसा होना चाहिए था, उस ढंग से नींव डालते तो समस्या नहीं होती- स्वामी निश्चलानंद


जवाब : असंतोष पैदा किया गया है। किसी भी जगह आप रहना चाहेंगे तो उसकी कुछ मर्यादाएं होती हैं। असंतोष राजनेताओं ने पैदा किया। ब्राह्मणों के यहां यज्ञोपवित, विवाह, दाह-संस्कार, यज्ञ, श्राद्ध आदि कर्म होता था, उसमें सबकाे लाभ होता था कि नहीं? कटुता स्वतंत्रता के बाद पैदा की गई है।