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क्या भारत बड़े दिल वाला राष्ट्र बन सकता है?

हम जानते हैं कि असम में शरणार्थी समस्या है। पिछले हफ्ते एनआरसी (द नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स) में अत्यधिक विलंब के...

Dainik Bhaskar

Aug 02, 2018, 04:00 AM IST
क्या भारत बड़े दिल वाला राष्ट्र बन सकता है?
हम जानते हैं कि असम में शरणार्थी समस्या है। पिछले हफ्ते एनआरसी (द नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स) में अत्यधिक विलंब के साथ अपडेट करके शायद हमने समस्या को और भी खराब बनाकर राज्य में एक तरह से टाइम बम ही रख दिया है।

लेकिन आइए, पहले उस समस्या की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें, जिसकी हम सारे भारतीयों को चिंता होनी चाहिए। माना जाता है कि असम की 3.3 करोड़ आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अवैध आप्रवासियों का है (अनुमान तो 50 से 20 फीसदी तक के हैं), जिनमें से ज्यादातर बांग्लादेश से हैं। डेटा इस ओर इशारा करता है- असम की आबादी शेष राष्ट्र की तुलना में तेजी से बढ़ी (50 व 60 के दशक में डेढ़ गुना और 70 के दशक में दोगुना तक)। वहां रहे लोगों ने भी इसे महसूस किया। समस्या इतनी बड़ी हो गई कि असम आंदोलन (1979-1985) उठ खड़ा हुआ, जो अवैध आप्रवासियों के खिलाफ लोकप्रिय आंदोलन था। यह मोटेतौर पर शांतिपूर्ण था पर कुछ हिंसक हत्याकांडों सहित इसमें कई मौतें भी हुईं। अगस्त 1985 में समझौते के साथ आंदोलन खत्म हुआ। इस पर आंदोलन के नेता और केंद्र ने हस्ताक्षर किए। 1985 के इस असम समझौते पर 33 साल पहले दस्तखत हुए थे, जिसे अब लागू किया जा रहा है और इससे एकदम नए किस्म की समस्याएं पैदा हो रही हैं। इस असम समझौते के मुताबिक केवल वे लोग, जो यह साबित कर सकें कि वे 24 मार्च 1971 के पहले मतदाता सूची में थे या उनके पूर्वज 24 मार्च 1971 के पहले मतदाता में सूची में थे, अपडेट की गई राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के लिए पात्र होंगे। जो यह साबित नहीं कर पाए तो? अभी तो ठीक-ठीक कोई नहीं जानता कि उनका क्या होगा। शायद वे अपील कर सकें या वे सारी प्रॉपर्टी और मतदान का अधिकार खो दें या उन्हें देश से बाहर भेजा जाए या कोई अन्य योजना तैयार की जा सकती है। इस बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं दिखती।

कहा जाता है कि कांग्रेस ने भूतकाल में अवैध आप्रवास को प्रोत्साहित किया। ज्यादातर आप्रवासी बांग्लादेश के मुस्लिम थे और संभावना थी कि वे कांग्रेस को वोट देंगे। विडंबना यह है कि कांग्रेस ने ही 1985 के इस दुष्कर समझौते पर दस्तखत किए थे, जिसमें 1971 के टेस्ट में नाकाम रहने पर नागरिकता छीन लेने का प्रावधान है। बेशक, कांग्रेस ने एनआरसी को अपडेट करने पर कभी अमल नहीं किया। स्थिति लंबित पड़ी रही, जो आमतौर पर कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन, भारत जैसे आसानी से उत्तेजित होने वाले देश में काम दे जाती है। एनआरसी को अपडेट करने के गंभीर काम की शुरुआत 2015 में हुई, जिसके तहत हाल ही में पहला मसौदा प्रकाशित हुआ। असम के 40 लाख मौजूदा नागरिकों को इससे बाहर कर दिया गया है। लोगों को आपत्ति जताने का अवसर देने के बाद, अपेक्षा है कि दिसंबर 2018 में अंतिम मसौदा प्रकाशित हो जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि एनआरसी को अब प्रकाशित करने में जरूरत से ज्यादा उत्साह की वजह यह है कि यह भाजपा के एजेंडे के अनुरूप है, जो अभी सत्ता में है। जो भी हो, तथ्य तो यह है कि इस पूरी कवायद से असम के लाखों रहवासियों पर अवैध आप्रवासी और अ-भारतीय होने का लैबल लग गया है। कल्पना कीजिए किसी जगह पर 40 साल रहना, परिवार बनाना और फिर यह कहे जाना कि आप यहां के नहीं हैं। यही उन लोगों के साथ होगा जो 1971 की कट-ऑफ के काफी बाद 1978 में आए। कल्पना कीजिए कि आपके कोई पूर्वज 1971 में मतदाता सूची में थे, यह साबित करने का कोई दस्तावेज नहीं होने के कारण आपको गलत तरीके से अवैध आप्रवासी घोषित कर दिया जाए। एनआरसी अपडेट करने के लिए लोगों के बीच काम करने वाले बिचौलियों व दलालों के लिए मौके की कल्पना कीजिए, जो पैसा लेकर 1960 से परदादा का नाम बेचेंगे। एक बार आधिकारिक रूप से ‘अवैध’ घोषित होने के बाद होने वाले भेदभाव, मानवाधिकार उल्लंघन की कल्पना कीजिए खासतौर पर यदि वे अल्पसंख्यक हों? राष्ट्रवाद, संप्रभुता और असम के लोगों के अधिकारों को संरक्षण देने के नाम पर हम ऐसी कवायद कर रहे हैं जो इतनी मनमानी, बांटने वाली और अमल में इतनी कठिन है कि यह समाधान की बजाय और समस्याएं निर्मित कर देगी।

यहां तक कि असम आंदोलन के व्यथित लोगों ने भी नागरिकता के लिए कट-ऑफ डेट को 1971 रखने की समझदारी दिखाई थी यानी जब उन्होंने 1985 में समझौते पर दस्तखत किए तो 14 साल पहले की तारीख तय की। क्या हम इतने मूर्ख लोग हैं। जब लोगों ने यहां काम किया, वोट दिए, संपत्ति निर्मित की, कर चुकाए,परिवार बनाए और भारत में 47 साल ज़िंदगी जी तो हम उनकी नागिरकता कैसे खत्म कर सकते हैं? यदि हमने असम समझौता लागू करने में देर की तो क्या अपने आप समय सीमा भी आगे नहीं बढ़नी चाहिए? 1985 की तर्ज पर आज यह तारीख 2004 की होगी। कोई भी व्यक्ति जो यह बता सके कि वे (या उनके पालक) असम में 2004 के पहले रहते और वोट देते आए हैं वह वैध निवासी है। क्या यह तर्कसंगत नहीं लगता?

व्यापक स्तर पर हमें अवैध आप्रवासियों पर नियंत्रण रखने की जरूरत तो है। इसके लिए हमारे पास बेहतर सीमा सुरक्षा और अधिक ठोस भारतीय पहचान होनी चाहिए। एक नीति होनी चाहिए कि ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाए जो किसी तरह भारत में आ जाते हैं। क्या हम उन्हें गिरफ्तार करें। उन्हें वापस भेज दें? दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह रहने पर मजबूर करें? या क्या हम इससे ऊपर उठ सकते हैं? हम हमारे सारे पड़ोसी देशों की स्थिति से परिचित हैं। उनमें किसी में भी वास्तविक लोकतंत्र नहीं है (हम भी बेहतर हो सकते हैं पर वे तो एकदम नाकाम हैं।) क्या हम उन लोगों को भगा दें जो बेहतर ज़िंदगी के लिए हमारे पास आते हैं या हम बड़े भाई बनकर उनका संरक्षण करें? यदि हम उन्हें पासपोर्ट और वोट देने का हक नहीं दे सकते तो क्या हम उन्हें ‘ग्रीन-कार्ड’ जैसा कुछ दे सकते हैं, हमेशा रहने और विदेशियों की तरह काम करने का अधिकार? कोई आसान जवाब नहीं है। बड़े दिल वाला क्षेत्रीय बड़ा भाई बनना एक विकल्प हो सकता है। इससे क्षेत्र में हमारी ताकत दिखाई देगी। अभी तो असम के विशिष्ट मामले में हमें एनआरसी प्रक्रिया पर पुनर्दृष्टि डालने की जरूर है और खासतौर पर 1971 की समय-सीमा में संशोधन करना चाहिए ताकि तकलीफ कम हो सके। और इस बार इन संशोधनों में दशकों का वक्त नहीं लगना चाहिए।

(लेखक के अपने विचार हैं।)

चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार

chetan.bhagat@gmail.com

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