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थाने में घुसकर पीटने का रोजनामचा भी सही नहीं लिख सकी पुलिस इसलिए छूटे 3 आरोपी

आसींद | सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शंभूगढ़ थाने में पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट के तीन आरोपियों...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 06, 2018, 03:15 AM IST

आसींद | सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शंभूगढ़ थाने में पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट के तीन आरोपियों को बरी कर दिया। मामला करीब आठ साल पुराना है। पुलिस थाने में हुई मारपीट का रोजनामचा भी सही नहीं लिखा गया था इसलिए आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।

प्रकरण के अनुसार 29 जुलाई, 2010 को रात करीब 9 बजे गोविंद जाट ने थाने पर फोन किया था। वह बिजली चालू करने के लिए कह रहा था। शंभूगढ़ थाने पर तत्कालीन संतरी जसवंतसिंह ने कहा कि यह थाना है। आप बिजली निगम में फोन करें। इस बात को लेकर दोनों के बीच फोन पर विवाद हुआ। इसके बाद गोविंद, रतन व हेमराज तीनों थाने पहुंच गए। इन्होंने जसवंतसिंह सहित दीनदयाल, बालूराम, ओमप्रकाश व महिला कांस्टेबल सरस्वतीदेवी से मारपीट की। जसवंतसिंह तो बेहोश भी हो गया था। सिपाही दीनदयाल की ओर से शंभूगढ़ थाने पर रात 11.30 बजे मामला दर्ज हुआ था। इसमें मारपीट व राजकार्य में बाधा का भी आरोप था। पुलिस ने गोविंद जाट सहित तीनों के खिलाफ आसींद की अदालत में चालान प्रस्तुत किया। बचाव पक्ष के वकील रामस्वरूप शर्मा ने रोजनामचे की प्रति पेश की। इसके अनुसार तो घटना 28 जुलाई, 2010 यानी कि थाने में बताई घटना से 1 दिन पहले ही रोजनामचे में दर्ज बता दी। इसी तथ्य को लेकर संपूर्ण कार्रवाई को न्यायालय ने संदेहास्पद माना। साथ ही पुलिस पर मिथ्या कार्रवाई करने का संदेह भी जताया।

डीआईजी व एसपी को कार्रवाई के निर्देश दिए

न्यायालय ने रोजनामचे का अवलोकन किया। पुलिस की सारी कार्रवाई झूठी मानते हुए अजमेर आईजी व भीलवाड़ा एसपी को संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए आदेश दिया। बताया गया कि शंभूगढ़ थाने से पुलिसकर्मियों का तबादला हो चुका है।

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