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अजमेर लोकसभा उपचुनाव: अबकी बार बीजेपी और कांग्रेस की राह नहीं आसान

बीजेपी के लिए जातिगत समीकरण साधना आसान नजर नहीं आ रहा, वहीं कांग्रेस अपनी अंदरूनी फूट व कमजोर संगठन से नहीं उबर पा रही

Dainik Bhaskar

Jan 02, 2018, 07:07 AM IST
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अजमेर लोकसभा उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही आसान नहीं है। केंद्र और राज्य की सत्ता के दम पर भाजपा चुनावी वैतरणी पार करने में पूरा दम लगाएगी, लेकिन सत्ता विरोधी स्वभाविक माहौल उसके लिए बड़ी परेशानी का कारण बनेगा। कांग्रेस सिर्फ सत्ता विरोधी माहौल की नाव पर सवार होकर चुनावी नैया पार नहीं लगा सकती, उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती अंदरूनी कलह और बिखरा संगठन ही रहेगा।

भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग दांव पर...

- केंद्र व राज्य में भाजपा की सरकार होने से भाजपा काे कुछ हद तक इसका लाभ मिलेगा लेकिन यह चुनाव उतना आसान नहीं है। हाल ही में गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने बयान दिया कि भाजपा के सामने कोई चुनौती नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है।

- राजनीति के मामलों के जानकारों का है कि सांवर लाल जाट के निधन के बाद अजमेर लोकसभा क्षेत्र में उप चुनाव भाजपा के लिए एक मुश्किल मामला हो सकता है, क्योंकि पार्टी जिस सोशल इंजीनियरिंग को लेकर चल रही है उसकी सफलता संदेहास्पद है। पिछले कुछ समय से जातिगत राजनीति के कई रंग अजमेर में देखने काे मिले हैं।

भाजपा के खिलाफ नाराजगी

- आनंदपाल के मामले में राजपूत समाज की भाजपा के खिलाफ नाराजगी सड़कों पर सामने आ गई। यह नाराजगी अब तक तक कायम है। सांवर लाल जाट राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे और लेकिन अब भाजपा को कोई दूसरा जाट नेता उनके आसपास भी नहीं है। ऐसे में जाटों को भाजपा के पक्ष में लामबंद रखना भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।

- सचिन पायलट खुद गुर्जर है और अगर पायलट मैदान में आ जाते हैं तो गुर्जर वोट कांग्रेस को मजबूती देंगे।

- अनुसूचित जाति वर्ग पहले कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक था, लेकिन पिछले कुछ सालाें में इस वोट बैंक की स्थिति काफी हद तक बदल गई है। अनुसूचित जाति वोट बैंक इस बार किसके साथ रहेगा यह देखना दिलचस्प होगा। ये वर्ग इस उप चुनाव में बड़ी भूमिका निभाएगा।

- रासा सिंह रावत ने भी इस बार चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उनका नाम पैनल तक में शामिल नहीं हुआ।

- लोकसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में रावत हैं और अब तक भाजपा का वोट बैंक माने जाते थे लेकिन अपने ही समाज से जुड़े भाजपा नेताओं से रावत नाराज हैं और यह नाराजगी वोटों में तब्दील हुई तो भाजपा के लिए मुश्किल बढ़ेगी।

दोनों दलों का बराबर का वर्चस्व रहा है...
- अजमेर लोक सभा सीट का इतिहास देखा जाए तो दोनों ही दलों का इस सीट पर लगभग बराबर वर्चस्व रहा है। भाजपा के राजनीतिक परिदृश्य में अलग पार्टी के रूप में उभरने से पहले कांग्रेस लगातार इस सीट पर कब्जा किए हुए थी।

- 1989 के बाद हालात भाजपा के पक्ष में हुए। 1989 से लेकर 1998 तक तीन संसदीय चुनाव में भाजपा के रासा सिंह रावत ने लगातार तिकड़ी जमाई।

- इसके बाद कांग्रेस को प्रभा ठाकुर के सांसद बनने पर राहत के कुछ पल हासिल हुए लेकिन यह समय काफी कम था।

- 1999 से लेकर 2009 तक दुबारा भाजपा के रासा सिंह रावत लगातार दो संसदीय चुनाव में जीत हासिल कर इस सीट से पांच बार चुनाव जीतने वाले पहले सांसद बन गए।

- इससे पहले कांग्रेस के दिग्गज चार-चार बार सांसद रहे थे।

- 2009 में कांग्रेस ने इस सीट पर सचिन पायलट जैसे कद्दावर गुर्जर नेता को उतारा और भाजपा ने अपने परंपरागत वोट बैंक से अलग हटकर वैश्य कार्ड खेला व किरण माहेश्वरी को प्रत्याशी बनाया।

- पायलट करीब 76 हजार वोटों से जीत हासिल कर सांसद बने और केंद्र में मंत्री पद भी हासिल किया।

- 2014 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले राज्यों में हो रहे चुनावों में मोदी लहर का असर साफ दिख रहा था।

- राजस्थान विधानसभा में भाजपा ने रिकार्ड सीटें हासिल की और कांग्रेस की करारी हार हुई।

- मोदी लहर पर सवार होकर सांवर लाल जाट ने पायलट को 1 लाख 71 हजार वोटों से करारी शिकस्त दी। पायलट के लिए राजनीतिक लिहाज से बड़ी चोट थी।

कांग्रेसी नेताओं को साथ रखना चुनौती
- कांग्रेस के लिए जितनी चुनौती भाजपा से नहीं है उतनी अपने अंदर से है। जिले में कांग्रेसी वरिष्ठ नेताओं को एक जाजम पर लाना टेढ़ा काम है।

- शहर के दोनों विधानसभा क्षेत्रों में तो यह हालात है कि शहर अध्यक्ष विजय जैन को बड़े नेता तवज्जो नहीं दे रहे हैं।

- पिछले दिनों मोइनिया इस्लामिया स्कूल में हुए कार्यकर्ता सम्मेलन को छोड़कर बाकी सभी कार्यक्रमों में कांग्रेसियों की हालत बेहद खराब नजर आई।

- बीएलए कागजों में बन गए लेकिन सम्मेलन में दस प्रतिशत भी मौजूद नहीं थे। संगठन स्तर पर भी कांग्रेस के हालात बेहद खराब है।

- पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह हो गई है कि कार्यकर्ता नहीं बचे हैं और जो हैं वह सभी अपने को नेता मान रहे हैं। एेसे में संगठन का झंडा उठाकर चलने वाले नहीं बचे हैं। कार्यक्रमों में वरिष्ठ कांग्रेसी खानापूर्ति के लिए जरूर आते हैं लेकिन फील्ड में उनकी सहभागिता नगण्य है।

यह उदाहरण है जो बताता है, आश्चर्यजनक हो सकते हैं परिणाम
- उप-चुनावों में कभी-कभी आश्चर्यजनक परिणाम आते हैं, जैसा कि नवंबर 2015 में मध्य प्रदेश के रतलाम में हुआ था, जहां कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया ने दिवंगत दिलीप सिंह भूरिया की पत्नी को हराया, जो भाजपा सांसद थे।

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