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BJP: परंपरागत वोट बैंक बचाने की चुनौती, कांग्रेस: विधानसभा क्षेत्र में नेताओं का अकाल

भाजपा के जिस परंपरागत वोट बैंक ने भारी बढ़त दिलाई वह कितना कायम रह पाएगा।

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2018, 07:04 AM IST
ajmer North constituency area analysis over ajmer bypolls

अजमेर. उत्तर विधानसभा सीट से इस लोक सभा उप चुनाव में किस पार्टी को बढ़त मिलती है यह देखना दिलचस्प होगा। इस बार जिस तरह की परिस्थितियां हैं उसमें देखना है कि पिछले चुनावों में भाजपा के जिस परंपरागत वोट बैंक ने भारी बढ़त दिलाई वह कितना कायम रह पाएगा।


इस बार जहां कांग्रेस ने ब्राह्मण कार्ड खेला है वहीं राजपूतों में कुछ घटनाओं को लेकर भाजपा से नाराजगी दिखाई दी है, उसके बाद यह प्रश्न खड़ा हुआ है।

इधर कांग्रेस की स्थिति यह है कि विधानसभा क्षेत्र में नेताओं का अकाल है। ऐसा कोई नेता नहीं दिखता है जो कांग्रेस को 2014 के लोक सभा चुनाव के 35 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर को पाटने के लिए ताकत लगा सके। विधानसभा क्षेत्र से पिछले तीन चुनावों से भाजपा के वासुदेव देवनानी काबिज है। करीब 14 साल की एंटी इनकंबेंसी का असर इस उप चुनाव में दिख सकता है।

2014 का लोकसभा चुनाव

सांवर लाल जाट ने सचिन पायलट को 1 लाख 71 हजार से ज्यादा वोटों से हराया और उत्तर विस क्षेत्र से भाजपा को 35 हजार 778 वोटों की बढ़त हासिल हुई थी।

परंपरागत वाेट: भाजपा - सिंधी, वैश्य, राजपूत व ब्राह्मण मतदाता साथ देते रहे हैं।

परंपरागत वोट : कांग्रेस - मुस्लिम और एससी वर्ग से मजबूती मिलती रही है।

वोट बैंक का बदलाव : इस बार दोनों पार्टियों के परंपरागत वोट बैंक में दो बड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं।

पहला बदलाव : कांग्रेस प्रत्याशी डॉ रघु शर्मा ब्राह्मण हैं। ऐसे में जातीयता लहर चली तो ब्राह्मण वोट बैंक भाजपा के हाथ से फिसल सकता है।

दूसरा बदलाव : आनंद पाल और फिल्म पदमावत लेकर राजपूत नाराजगी जता रहे हैं। वहीं मेयर पद के लिए सुरेंद्र सिंह शेखावत को अधिकृत उम्मीदवार नहीं बनाए जाने का असंतोष भी असर डाल सकता है।

भाजपा के लिए चुनौती : लोक सभा चुनाव 2014 में जो रिकार्ड 35 हजार वोटों बढ़त हासिल की थी उसे कायम रखना। अपने परंपरागत ब्राह्मण और राजपूत वोट बैंक में कांग्रेस की भारी सेंध को रोकना।

दूसरा बदलाव : आनंद पाल और फिल्म पदमावत लेकर राजपूत नाराजगी जता रहे हैं। वहीं मेयर पद के लिए सुरेंद्र सिंह शेखावत को अधिकृत उम्मीदवार नहीं बनाए जाने का असंतोष भी असर डाल सकता है।

भाजपा के लिए चुनौती : लोक सभा चुनाव 2014 में जो रिकार्ड 35 हजार वोटों बढ़त हासिल की थी उसे कायम रखना। अपने परंपरागत ब्राह्मण और राजपूत वोट बैंक में कांग्रेस की भारी सेंध को रोकना।

कांग्रेस के लिए चुनौती : लगातार 15 साल से विधानसभा और नगर निगम चुनावों में भाजपा बढ़त ले रही है। पिछले लोक सभा चुनाव की बढ़त को पाटते हुए अपने परंपरागत एससी-एसटी वोटों के साथ ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत वोटों को लामबंद करना।

यह है वोटों का जातिगत गणित
हालांकि निर्वाचन विभाग मतदाताओं का कोई जातिगत आंकड़ा जारी नहीं करता लेकिन राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस विधानसभा क्षेत्र में वैश्य करीब 50 हजार, मुस्लिम 28 हजार, एससी-एसटी 50 हजार, सिंधी 28 हजार, माली 14 हजार, रावत 12 हजार, गुर्जर 10 हजार, राजपूत 10 हजार, ब्राह्मण 12 हजार तथा क्रिश्चियन मतदाताओं की संख्या करीब 7 हजार है।

कांग्रेस में नेताओं का अकाल
इस विधानसभा सीट से कांग्रेस में बड़ा नाम डॉ श्रीगोपाल बाहेती का है जो दो बार चुनाव लड़े और हारे हैं। डॉ बाहेती को अशोक गहलोत गुट का झंडाबरदार माना जाता है। मौजूदा हालात में सचिन पायलट गुट सक्रिय दिखाई दे रहा है। ऐसे में बाहेती कितना असर डालेंगे यह देखना दिलचस्प होगा। एक जमाने में किशन मोटवानी इस सीट से कांग्रेस को जीत दिलाते आए थे लेकिन उनके बाद सिंधी वर्ग से कांग्रेस के पास कोई मजबूत नेता नहीं रहा। पार्टी की एकजुटता का दावा चुनावी परीक्षा में कितना खरा उतरेगा यह नतीजे बताएंगे।

2008 में आया था गैर सिंधी वाद का फैक्टर
- इस सीट पर 2008 के चुनाव में मतदाता पहली बार साफ तौर पर दो भागों में बंटे दिखाई दिए थे। सिंधी और गैर सिंधी में। इसके राजनीतिक कारण रहे।

- दरअसल इस सीट पर कभी भी कोई गैर सिंधी प्रत्याशी नहीं जीता, इसीलिए जनसंघ, जनता पार्टी, भाजपा या कांग्रेस में सक्रिय गैर सिंधी राजनेताओं के विधानसभा में पहुंचने का रास्ता लगभग बंद हो गया। दोनों ही दलों ने सिंधी को ही मैदान में उतारा। लेकिन 2008 में नए परिसीमन के बाद सिंधी मतदाता अजमेर उत्तर और दक्षिण में बंट गए और गैर सिंधी राजनेताओं की चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षाएं बलवती हो गईं।

- भाजपा ने सिंधी नेता वासुदेव देवनानी को मैदान में उतारा। कांग्रेस ने प्रयोग किया और डॉ. बाहेती पर दांव लगाया लेकिन कड़े मुकाबले में बाहेती 688 मतों से हार गए। वो भी तब जब भाजपा का परंपरागत वैश्य मतदाता उससे छिटका था। कारण तलाशे गए कि बाहेती क्यों हारे? तथ्य चौंकाने वाले सामने आए।

- कांग्रेस का परंपरागत मुस्लिम बहुल इलाकों में मतदान का प्रतिशत कम रहा। 2013 में दुबारा दोनों पार्टियों ने यही टिकट दोहराए लेकिन मोदी मैजिक शुरू हो चुका था और देवनानी इसके सहारे 20 हजार से वोटों से जीत गए।

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