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भास्कर बायइन्विटेशन: गुजरात चुनाव में विकास लुप्त रहा, जातिगत मुद्दे छाए रहे

गरीब, श्रमिक, बेरोजगार, अशिक्षित वंचित वर्गो के लोग बीजेपी के समर्थन में बहुत कम पाये जाते हैं।

Danik Bhaskar | Dec 20, 2017, 08:04 AM IST

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधानसभा के चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद भाषण में विद्वानों और विश्लेषकों द्वारा सही मूल्यांकन नहीं करने पर अप्रसन्नता जाहिर की। आभास हुआ कि जनता बीजेपी के साथ है और बुद्धिजीवी वर्ग उसके विरुद्ध। भारत के बुद्धिजीवी अत्यन्त विभेदीकृत और स्तरीकृत हैं। बहुत से बुद्धिजीवी शासन के साथ रहते है, चाहे शासन किसी भी राजनैतिक दल का क्यों न हो। ऐसे बुद्धिजीवी भी हैं जो शासन से दूरी रखते हुये, सोच व समझ से पढ़ते हैं, प्रकाशन करते हैं, और मुक्त टिप्पणियाॅं करते हैं। ऐसे बुद्धिजीवी भी है जो एक विशेष शासन के साथ लगाव रखना चाहते हैं। प्रधान मंत्री का संकेत उन बुद्धिजीवियों के बारे में ही होगा जो उनकी विचारधारा से भिन्न विचार वाले हैं। गुजरात के चुनाव बहुत महत्वपूर्ण रहे। बीजेपी चुनाव जीतने के लिये कटिबद्ध थी और काॅंग्रेस प्रधानमंत्री के प्रदेश में चुनाव जीत कर साख बढ़ाना चाहती थी। किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिये हर तरह के तरीके को जायज ठहरा कर प्रचार किया जाता है। बीजेपी ने यही किया।


जीत के समारोह मे प्रधानमंत्री ने ’विकास’ के नारे का अनेक बार उल्लेख किया। परन्तु चुनाव प्रचार में ’विकास’ लुप्त रहा। भावनाओं के प्रश्नों को उजागर किया गया। एक प्रदेश के चुनाव को पूरे भारत के चुनाव की तरह प्रस्तुत किया गया। गुजराती अस्मिता के खतरे की बात को अनेक बार दोहराया गया।

गुजरात में भाजपा की जीत सिर्फ आठ सीटों की ही है

बीजेपी की जीत मात्र आठ सीटों की है। यदि 99 से घटकर 91 सीटें रह जाती तो बीजेपी को गहरा आघात होता। बीजेपी निरन्तर हार के ड़र से त्रस्त थी। लगभग 10 सीटों मे एक हजार से कम का अन्तर है। इसके अलावा ग्रामीण गुजरात में बीजेपी को बहुत कम समर्थन मिला है। एक समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, यह कहा जा सकता है कि बीजेपी एक नगरीय दल रहा है, और परम्परात्मक दृष्टि से उच्च जातियों का समर्थन भी मिलता रहा है। नगरीयकरण से बीजेपी को लाभ हुवा है। गरीब, श्रमिक, बेरोजगार, अशिक्षित वंचित वर्गो के लोग बीजेपी के समर्थन में बहुत कम पाये जाते हैं।

चुनाव में विभाजनात्मक प्रवृत्तियां उभरी

गुजरात के चुनाव ’विकास की जीत’ नही है, और न ही ’जाति के विष’ का तिरष्कार है। इन चुनावों में अधिक दरारें व विभाजनात्मक प्रवृतियाॅं उभरी है। धार्मिक, जातिगत, ग्रामीण-शहरी खाई परक परतें देखी जा सकती हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी बीजेपी मे हार का डर हावी था। क्या प्रजातान्त्रिक मूल्यों के आधार पर संवाद के माध्यम से चुनाव नही लड़ा जा सकता? गुजरात के चुनावों में विशेषतः बीजेपी ने हर प्रकार से प्रतीकात्मक व सांस्कृतिक प्रतिमानों का दोहन करने का भरसक प्रयास किया। प्रधान मंत्री द्वारा कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर राहुल गाॅंधी के चुनाव पर अवांछनीय व अशोभनीय टिप्पणी की गई।

परिस्थिति के अनुसार हितों साधने की जुगत

देश में मध्यम वर्ग, उच्च मध्यम व मध्यम-मध्यम वर्ग परिस्थिति के अनुसार अपना हित साधते हैं। ऐसा करने मे वंचित वर्गो के लोग सक्षम नही होते। विमुद्रीकरण से सबसे अधिक दैनिक रोजगार वाले लोगों को अत्यन्त कष्ट हुवा। जयपुर शहर में लम्बी कतारें, लाइन में लगे रहने के झगड़े, और दैनिक रोजगार नही मिलने के कारण कर्ज के नीचे लाखों-करोड़ो लोग दब गये। उनको कर्ज के चंगुल से उठने में कई वर्ष तक झूझना पड़ेगा। जीएसटी द्वारा कर भार की वृद्धि के अलावा, छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, रेस्टोरेन्ट वालों को इसकी जटिलता से जूझना पड़ रहा है। इसके लिये दलालों का एक नया वर्ग उतर कर आया है।