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अजमेर: जाट बनाम अदर्स का नारा भुनाने में कामयाब रही कांग्रेस

भास्कर एनालिसिस : अजमेर लोकसभा में एकजुट जातियों ने बदली सियासत, मांडलगढ़ विधानसभा में बागी बने निर्णायक

Bhaskar News | Last Modified - Feb 02, 2018, 05:37 AM IST

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    जयपुर. तीन उप चुनावों में सबसे स्ट्रेटजिक सीट अजमेर लोकसभा सीट थी। अजमेर के 18.40 लाख वोटरों की नब्ज पकड़ने में कांग्रेस की रणनीति कामयाब रही। इसकी वजह कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की सामूहिक फील्डिंग के अलावा जातियों में फैला सरकार के प्रति आक्रोश भी रहा। डांगावास प्रकरण के बाद गुस्से की आग से झुलस रहा एससी वर्ग चुनाव में सरकार के खिलाफ रहा। अजमेर में सर्वाधिक वोट (3.25 लाख) एससी वर्ग के हैं। इसके बाद जाट वोटर सर्वाधिक है। इसी तरह आनंदपाल प्रकरण के बाद राजपूत संगठनों ने भाजपा के खिलाफ वोट के फरमान जारी किए, जिससे निर्णायक माने जाने वाले राजपूत वोटरों को भाजपा अपने पक्ष में वोट नहीं डलवा पाई। रही सही कसर जाट बनाम अदर्स की लहर ने निकाल ली।


    अजमेर लोकसभा सीट से सटते मेड़ता क्षेत्र के डांगावास गांव में पिछले साल जमीनी विवाद को लेकर 5 दलितों की हत्या की गई थी। लेकिन 8 माह बाद भी 34 आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने और सीबीआई जांच की मांग के बावजूद फौरी कार्रवाई को लेकर अजमेर के दलित समाज में भारी आक्रोश था। भाजपा ने इसे हल्के में ले लिया। भाजपा के कई दलित नेताओं के पास अजमेर के एससी वोटरों ने फोन करके कहा कि इस बार डांगावास का बदला लिया जाएगा। डांगावास हत्याकांड में ज्यादातर आरोपी जाट समुदाय के बताए गए और अजमेर में भाजपा की तरफ से जाट प्रत्याशी उतारे जाने से एससी वर्ग को बदला लेने का मौका मिल गया।

    इसी तरह भाजपा के पक्ष में पूर्व सांसद सांवर लाल जाट के निधन के बाद जाट समुदाय में उनके बेटे रामस्वरूप लांबा को टिकट के साथ सहानुभूति की लहर शुरू हो गई। इसको कांग्रेस ने समय रहते भांप लिया और अंदरखाने ब्राह्मण-राजपूत सहित ज्यादातर अगड़ी जातियों में फरमान जारी करवा दिए, कि यह चुनाव जाट बनाम अदर्स का है। इससे अंदरखाने भाजपा की जाट लहर के खिलाफ बड़ी लहर पैदा हो गई। चुनाव से ठीक पहले जयपुर से करणी सेना और राजपूत संगठनों का अजमेर में भाजपा के खिलाफ राजपूतों को वोट के ऐलान से भी असर पड़ा।

    आनंदपाल प्रकरण की सीबीआई जांच में राजपूत नेताओं को फंसाए जाने के आरोप लगाए गए। अजमेर में नसीराबाद को छोड़कर बाकी सभी विधानसभा सीटें भाजपा के पास है। लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका उल्टा असर रहा, सातों भाजपा विधायकों की सीटों पर कांग्रेस को बढ़त मिली। भाजपा को बढ़त केवल कांग्रेस की सीट नसीराबाद से ही मिली। इससे साफ है कि विधायकों के खिलाफ भी जनता में क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर आक्रोश है।

    अलवर : जसवंत यादव का टिकट ही भाजपा की हार की वजह

    अलवर उपचुनाव में डॉ. जसवंत का टिकट ही पार्टी की हार की वजह बन गया। उन्हें टिकट देने से यह संदेश गया कि सरकार के पास चुनाव लड़ने के लिए कोई योग्य प्रत्याशी नहीं बचा तो जाति कार्ड खेलने के लिए जसवंत को मैदान में उतार दिया। जसवंत पहले कांग्रेस में थे लेकिन रातोंरात पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। जब खुद भाजपा से विधायक बन गए तो अपनी पत्नी को 2009 में लोकसभा चुनाव लड़वा दिया। प्रचार के दौरान कई मौकों पर जनसभाओं में पार्टी विधायकों और लोगों की नाराजगी खुल कर सामने आई। लेकिन पार्टी समय रहते नहीं चेती। पोलिंग के दौरान यह नाराजगी खुलकर दिखी।

    मांडलगढ़ : भितरघात व ओवर कॉन्फिडेंस ने बिगाड़ा समीकरण

    मांडलगढ़ में कांग्रेस की जीत और बीजेपी की हार के लिए जिला स्तर पर पार्टी में भितरघात, प्रदेश स्तर पर प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालने वालों में ओवर कॉन्फिडेंस और निर्दलीय प्रत्याशी गोपाल मालवीय द्वारा दोनों ही पार्टियों के वोटों के समीकरण प्रभावित करना मुख्य कारण रहे हैं। इस चुनाव में कांग्रेस-बीजेपी की हार का अंतर 7.31% रहा जबकि निर्दलीय प्रत्याशी 22.79% वोट लाकर जीत-हार के अंतर से तीन गुना वोट लाकर दोनों ही संगठनों के गणित प्रभावित किए हैं। इस विधानसभा क्षेत्र की पूर्व विधायक कीर्ति कुमारी की जीत से पहले ये कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती थी। ऐसे में कांग्रेस की झोली में दोबारा ये सीट आई है। गौरतलब है कि कांग्रेस के विवेक धाकड़ को 39.50% वोट मिले हैं, जबकि शक्ति सिंह हाड़ा 32.19% वोट मिले है।

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