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अजमेर उपचुनाव: कई नेताओं के विधानसभा का टिकट भी तय करेगा उपचुनाव

सरकार के पास अब कुल आठ से दस माह का ही समय रह गया है जब वो चुनावों में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंकेगी।

पंकज यादव की रिपोर्ट | Last Modified - Jan 08, 2018, 06:44 AM IST

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    अजमेर. संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस के कई दिग्गजों के आगामी विधानसभा चुनाव का टिकट भी तय करेगा। जिस विधानसभा क्षेत्र से बढ़त या पिछड़ने का परिणाम आएगा उसके नेताओं का कद बढ़ जाएगा या टिकट की दावेदारी खतरे में पड़ जाएगी। भाजपा सत्ता में है इसलिए उसके नेताओं के लिए यह चुनाव सबसे अहम माना जा रहा है। अजमेर संसदीय उपचुनाव के बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव दिसंबर में होने प्रस्तावित हैं। सरकार के पास अब कुल आठ से दस माह का ही समय रह गया है जब वो चुनावों में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंकेगी।

    अजमेर उत्तर...
    इस सीट पर भाजपा के वासुदेव देवनानी लगातार तीसरी बार चुनाव जीते हैं। भाजपा में अभी भी उनके मुकाबले में कोई नेता टिकट का दावेदार नहीं है। देवनानी कई मौकों पर पूरे आत्मविश्वास से कह चुके हैं कि वे जीत का चौका भी लगाएंगे। पिछला चुनाव मोदी लहर पर सवार होकर उन्होंने 20 हजार 479 मतों से जीता था। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में 33 हजार 307 मतों की बढ़त दिला पाए थे। यदि उप चुनाव में वे अपने क्षेत्र से पार्टी को खासी बढ़त दिलाने में कामयाब हुए तो उनकी दावेदारी को कोई चुनौती नहीं मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो उन पर अंगुलियां उठनी शुरू हो जाएंगी। कांग्रेस में डॉ. श्रीगोपाल बाहेती की विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही दावेदारी कमजोर हुई है। पार्टी में अब इस क्षेत्र से भी किसी सिंधी उम्मीदवार को ही मैदान में उतारने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इसीलिए गिरधर तेजवानी और पूर्व पार्षद सुनील मोतियानी की सक्रियता बढ़ गई है। यदि कांग्रेस बढ़त नहीं ले पाई तो इनकी दावेदारी को ग्रहण लग जाएगा।

    अजमेर दक्षिण...
    अजमेर दक्षिण में सबसे ज्यादा खतरा महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल को है। वे भी मोदी लहर में 23 हजार 158 मतों के बड़े अंतर से जीती थीं । लोकसभा चुनाव में वे 19 हजार 451 मतों की बढ़त दिला पाईं। नगर निगम चुनावों में भाजपा का सबसे कमजोर प्रदर्शन अजमेर दक्षिण में ही रहा था। यदि वे पार्टी प्रत्याशी को बढ़त दिलाने में कामयाब हो गईं तो उनकी दावेदारी पर कोई आंच नहीं आने वाली, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो उनके लिए संकट खड़ा हो जाएगा। वैसे भी उनके राजनीतिक पार्टी प्रतिद्वंद्वी जिला प्रमुख वंदना नोगिया के रूप में एक महिला दावेदार को तेजी से आगे लाने में जुटे हुए हैं। कांग्रेस में युवा उद्यमी हेमंत भाटी ही प्रमुख दावेदार हैं। नगर निगम चुनावों में उन्होंने अकेले दम पर पार्टी की जोरदार वापसी कराई थी। यदि वे पार्टी प्रत्याशी को बढ़त दिलाने में कामयाब हो गए तो उनकी दावेदारी और मजबूत हो जाएगी, ऐसा नहीं हुआ तो अंगुलियां और नए दावेदार उठने लगेंगे।

    मसूदा...
    भाजपा की सुशील कंवर पलाड़ा ने पिछले चुनाव में यह सीट सबसे कम 4 हजार 475 मतों के अंतर से जीती थी। यहां सबसे रोचक पांच कोणीय मुकाबला था। डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी और वाजिद खान चीता ने कांग्रेस से बगावत कर चुनाव लड़ा था, भाजपा के पूर्व देहात अध्यक्ष नवीन शर्मा भी बागी के रूप में मैदान में थे। वाजिद और नवीन शर्मा अपनी-अपनी पार्टियों में लौट चुके हैं। रामचंद्र चौधरी का झुकाव भाजपा की ओर हो गया है और वे उप चुनाव में टिकट की दावेदारी भी कर चुके हैं। यदि भाजपा यहां से बढ़त नहीं ले पाई तो सुशील कंवर पलाड़ा की दावेदारी पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। यदि कांग्रेस बढ़त नहीं ले पाई तो ब्रह्मदेव कुमावत की दावेदारी कमजोर पड़ेगी।
    किशनगढ़...
    भाजपा के भागीरथ चौधरी ने पिछला चुनाव 31 हजार 074 मतों के बड़े अंतर से जीता था। जाट बाहुल्य इस विधानसभा क्षेत्र में उनका सीधा मुकाबला भी अपने सजातीय नाथूराम सिनोदिया से था। यदि भागीरथ चौधरी उप चुनाव में पार्टी प्रत्याशी को बढ़त नहीं दिला पाए तो उनकी दावेदारी कमजोर हो जाएगी। यदि कांग्रेस बढ़त नहीं ले पाई तो सिनोदिया के सामने भी दावेदारी का संकट पैदा हो जाएगा।

    पुष्कर...
    मोदी लहर पर सवार संसदीय सचिव सुरेश रावत 41 हजार 290 मतों के भारी अंतर से जीते थे। उनके मुकाबले में रावत समाज के ही कुछ और दावेदार भी थे। लेकिन पार्टी ने उन पर भरोसा जताया था। यदि उप चुनाव में वे पुष्कर विधानसभा क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी को बढ़त नहीं दिला पाए तो उनका टिकट खतरे में पड़ जाएगा। इस विधानसभा क्षेत्र में राजपूत मतदाता भी खासी संख्या में हैं, जो फिलहाल भाजपा से नाराज हैं। पुष्कर इलाके में राजपूत बाहुल्य गांवों में भाजपा के प्रति नकारात्मक प्रचार सुरेश रावत के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। यदि पार्टी प्रत्याशी को वे बढ़त दिलाने में कामयाब हो गए तो उनकी दावेदारी बरकरार रह सकती है।


    केकड़ी...
    केकड़ी विधानसभा क्षेत्र से मोदी लहर पर सवार भाजपा के शत्रुघ्न गौतम ने कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. रघु शर्मा को 8 हजार 867 के मामूली अंतर से हराया था। रघु शर्मा की हार के पीछे एक बड़ा कारण कांग्रेस के बागी पूर्व विधायक बाबू लाल सिंघाड़िया भी थे। यदि भाजपा यहां से बढ़त नहीं ले पाई तो गौतम की दावेदारी पर खतरे के बादल मंडराने लगेंगे। यदि बढ़त दिलाने में कामयाब रहे तो गौतम की दावेदारी और पुख्ता हो जाएगी। डॉ. रघु शर्मा अब खुद लोक सभा उप चुनाव में प्रत्याशी हैं लेकिन यहां से वे बढ़त पाने में नाकाम रहे तो उनके राजनीतिक जीवन पर भी असर पड़ेगा। डॉ. रघु शर्मा यदि जीतते हैं तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष भूपेंद्रसिंह राठौड़ आदि की विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी मजबूत हो जाएगी।

    नसीराबाद...
    सांवर लाल जाट इसी क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। बाद में मोदी लहर पर सवार होकर सांसद बने। उप चुनाव में कांग्रेस के राम नारायण गुर्जर ने यह सीट भाजपा से छीन ली थी। हालांकि अंतर बहुत कम था, लेकिन तब भाजपा की पूरी सत्ता और संगठन से उनका मुकाबला था। सांवर लाल जाट अब इस दुनिया में नहीं है, उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा लोस प्रत्याशी हैं। गुर्जर और जाट बाहुल्य इस सीट से यदि लांबा बढ़त नहीं ले पाए तो उनके राजनीतिक जीवन पर फुल स्टॉप लग जाएगा। ऐसे में पूर्व जिला प्रमुख सरिता गैना आदि की दावेदारी बढ़ जाएगी। यदि कांग्रेस प्रत्याशी बढ़त नहीं ले पाया तो राम नारायण गुर्जर की दावेदारी भी कमजोर पड़ेगी।

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