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राजस्थान उपचुनाव: रॉयल्टी छूट, पट्टे और आरक्षण से भी नहीं बना काम

चुनाव के बीच 8000 करोड़ रुपए के कार्यों के वादे भी नहीं बदल पाए वोटर का मिजाज

Bhaskar News | Last Modified - Feb 02, 2018, 05:46 AM IST

राजस्थान उपचुनाव: रॉयल्टी छूट, पट्टे और आरक्षण से भी नहीं बना काम

जयपुर. उपचुनाव की आंच के बीच सरकार ने वोटरों को लुभाने के लिए हर संभव प्रयास किए। अलवर क्षेत्र में पिछले डेढ़ माह में ही 5 हजार करोड़ रुपए के सड़क-नाली से लेकर पुल के निर्माण के वादे हुए। अजमेर में भी सरकार दो बार चार-चार दिन रही और 3 हजार करोड़ रुपए के कार्यों के ऐलान किया। इतना ही नहीं अजमेर-अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा को प्रभावित करने वाले माइन्स मुद्दे को भी भुनाने के लिए सरकार ने खदानों की बकाया लीज-रॉयल्टी में भारी छूट का ऐलान किया।

आचार संहिता लगने के बाद एक मंत्री ने शहरी सीमा में शामिल गांवों को पट्टे जारी करने की सरकार मंशा से अवगत कराया। इससे अजमेर के 230 गांव प्रभावित हो रहे थे। इसी तरह आचार संहिता से ठीक एक सप्ताह पहले गुर्जरों सहित पांच जातियों के लिए एक फीसदी आरक्षण लागू कर दिया गया। लेकिन तीनों क्षेत्रों की जनता ने कुछ और ही सोच रखा था।

नतीजे घोषणाओं के अनुरूप किसी क्षेत्र में नहीं आए। सरकार ने आचार संहिता लागू होने के बाद 8 जनवरी को माइन्स की एमनेस्टी स्कीम लागू की। खदानें अलवर से लेकर अजमेर और मांडलगढ़ सभी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में है। स्कीम के तहत 20 से 40 साल के खदान मालिकों की बकाया लीज राशि और रॉयल्टी में भारी छूट दी गई।

अजमेर विकास प्राधिकरण ने अपने मास्टर प्लान की शहरी सीमा में बड़ी संख्या में गांव शामिल किए। लेकिन 230 से अधिक गांवों के लोगों को पट्टे देने पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी, लेकिन सरकार ने एक आदेश जारी कर दिया था। उस आदेश पर स्टे पर 28 दिसंबर को आचार संहिता लागू होने के बाद शाम साढ़े छह बजे यूडीएच मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि हर हाल में पट्टे देने की सरकार की मंशा है। अटॉर्नी जनरल से राय लेकर इजाजत मिलने पर पट्टे जारी किए जाएंगे।

इसी तरह गुर्जर रायका रेबारी गाड़ियां लोहार बंजारा पांच जातियों को आचार संहिता लगने के एक सप्ताह पहले एक फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया गया। सरकार को पता है कि अजमेर और मांडलगढ़ में गुर्जरों के वोट अच्छी संख्या में है। इसके अलावा अलवर की एक विधानसभा सीट थानागाजी में भी गुर्जरों को निर्णायक वोट माना जाता है, लेकिन यह कार्ड भी काम नहीं आया।

बजरी संकट का तोड़ नहीं निकाल पाई सरकार
लोक-लुभावन घोषणाएं तो कई की गई, लेकिन प्रदेश पर छाए बजरी संकट का तोड़ सरकार नहीं निकाल पाई। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी में फंसे बजरी संकट के कारण बीकानेर को छोड़कर पूरे प्रदेश में बजरी खनन पर रोक है। मांडलगढ़ विधानसभा में तो बजरी खनन जीवन रेखा है। अलवर में भी बजरी खनन होता है। बजरी कारोबार बंद होने से जन मानस में खासा रोष है।

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