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वसुंधरा-पायलट के नेतृत्व की ‘अिग्न परीक्षा’ आज

अलवर और अजमेर लोकसभा व मांडलगढ़ विधानसभा के उपचुनाव से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 03:15 AM IST
वसुंधरा-पायलट के नेतृत्व की ‘अिग्न परीक्षा’ आज
अलवर और अजमेर लोकसभा व मांडलगढ़ विधानसभा के उपचुनाव से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट का सियासी भविष्य तो दांव पर होगा ही, साथ में 10 माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की दशा और दिशा भी तय होगी। कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता में वापसी की उम्मीद जिंदा रखने के लिए कम से कम दो सीटें जीतनी हाेंगी। तीनों सीटें जीतना कांग्रेस के सत्ता वापसी के दावों को मजबूती देगा। वहीं भाजपा के लिए तीनों सीटें जीतना न केवल वसुंधरा राजे के नेतृत्व को मजबूती देगा बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भी एडवांटेज साबित होगा। ये सीटें हारना भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के साथ ही वसुंधरा राजे के विरोधियों को फिर सक्रिय होने का मौका देगा। इस चुनाव की हार-जीत ही 17 विधानसभा सीटों की सियासत तय करेगी।। इसे विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल की के तौर पर देखा जा रहा है, ऐसे में यहां का रिजल्ट ही 10 माह बाद विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरण तय करेगा। फिलहाल, इन 17 सीटों में से कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट है जबकि भाजपा के पास 15, एक सीट पर राजपा का कब्जा है।

जानिए... इस उपचुनाव की हार-जीत किस तरह नेतृत्व पर डालेगी गहरा असर

वसुंधरा राजे

जीत : इन चुनावों की जीत ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सियासी भविष्य को मजबूती देगी। तीनों सीट जीतने की सूरत में आगामी विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे के नेतृत्व को नकारना केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी आसान नहीं होगा। दो सीटों की जीत भी वसुंधरा राजे विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए काफी है। एक सीट जीत विरोधियों को हावी होने का मौका देगी।

हार : भाजपा की तीनों सीटों पर शिकस्त का वसुंधरा राजे के मौजूदा नेतृत्व पर तो ज्यादा असर नहीं होगा लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, इस पर जरूर संशय होगा। दो सीटों की हार को भी प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ रुझान माना जाएगा तथा उनके करिश्माई नेतृत्व के दावे कमजोर होंगे। धौलपुर की जीत से उनके जो विरोधी हाशिए पर आए थे, उन्हें इन चुनावों की हार के बाद फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा।

कांग्रेस : अभी तो खोने को कुछ नहीं | अलवर और अजमेर की 16 और मांडलगढ़ सीट का आकलन 2013 के विधानसभा चुनाव के आधार पर करें तो इन 17 सीटों पर कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। 2015 में इन सभी सीटों पर कांग्रेस ने मात खाई थी। लोकसभा चुनाव में अलवर की राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ ही ऐसी सीट थी जहां कांग्रेस को 16 हजार मतों की बढ़त मिली थी, अलवर की बाकी सभी सीटों पर भाजपा को 2 लाख 82 हजार 872 वोटों की बढ़त हासिल हुई थी। विधानसभा चुनाव में अलवर की इन आठ सीटों पर भाजपा को कांग्रेस से 1 लाख 87 हजार 21 वोट ज्यादा हासिल हुए थे। हालांकि, सांवर लाल जाट के सांसद बनने पर हुए उपचुनाव में नसीराबाद सीट कांग्रेस ने भाजपा से 386 वोटों के मामूली अंतर से छीन ली थी।

सचिन पायलट

जीत : सचिन पायलट का सियासी भविष्य अजमेर पर ही टिका है। हालांकि, पायलट के नेतृत्व में नसीराबाद में विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को 386 वोटों से जीत हासिल हो चुकी है लेकिन लोकसभा चुनाव में 1 लाख 70 हजार वोटों से हुई उनकी हार विरोधियों को हावी होने का मौका देती रही है। ऐसे में यहां कांग्रेस की जीत से न केवल विरोधियों के मुंह बंद होंगे बल्कि उनके नेतृत्व को मजबूती मिलेगी। कांग्रेस तीनों सीटें जीतती है तो 10 माह बाद विधानसभा चुनाव में सचिन के नेतृत्व पर मुहर लगना पक्का है।

हार : अजमेर की हार पायलट के लिए बड़ा धक्का साबित होगी। यह सीट हारने पर पायलट के लिए मांडलगढ़ और अलवर की जीत के भी ज्यादा मायने नहीं होंगे। अजमेर हारने पर मांडलगढ़ और अलवर की जीत का श्रेय लेने कांग्रेस के कई नेता सामने आ जाएंगे। विधानसभा चुनाव में नेतृत्व परिवर्तन की भी संभावना बनी रहेगी।

भाजपा : गंवाने को है बहुत कुछ | अलवर, अजमेर और भीलवाड़ा की इन 17 विधानसभा सीटों पर भाजपा के कुछ पाने से ज्यादा खोने के आसार हैं। लोकसभा चुनाव में इन 17 में से 16 सीटों पर भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले थे। ऐसे में भाजपा यहां बहत कुछ गंवा सकती है। सिर्फ राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ सीट ही ऐसी थी जहां विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली।

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