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अजमेर का स्थापना दिवस आज... 1112 में अजय राज चौहान ने रखी थी गढ़ अजयमेरू की नींव

3 वर्ष पहले
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अजमेर| 27 मार्च 1112 को चौहान वंश के तेईसवें शासक राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू की स्थापना की तथा चौहान साम्राज्य की राजधानी बनाई। उसके बाद इसका नाम अजयमेर और फिर अजमेर हुआ। अजयमेरू की स्थापना का पुरातात्विक व ऐतिहासिक प्रमाण 27 मार्च 1112 का ही उपलब्ध है। कहीं राजा अजयपाल चौहान का और कहीं राजा अजयदेव चौहान का नाम अजमेरू के स्थापना के संबंध में उल्लेख आता है।

कर्नल टॉड ने राजा अजयराज चौहान को अजयमेरू दुर्ग का ही निर्माता माना है जो बाद में गढ़ बीठली और फिर तारागढ़ पड़ा। वर्ष 1940 से पूर्व चंद्रवरदाई द्वारा रचित \\\"पृथ्वीराज रासो\\\' ही चौहानों के इतिहास की जानकारी उपलब्ध थी। यह मात्र एक साहित्यक रचना व कल्पना पर आधारित महाकाव्य ही था पर वर्ष 1940 में प्रो. ब्यूहमर द्वारा कश्मीर से लाई गई ताड़पत्रों पर लिखित जयनक कश्मीरी द्वारा पुष्कर में रचित पृथ्वीराज विजय महाकाव्य की उपलब्धता ने यथार्थ की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त किया।

इतिहासकार डॉ. गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने पंडित चंद्रधर शर्मा के सहयोग से इसको 1940 में संपादित कर प्रकाशित किया। इससे प्रभावित होकर हरविलास शारदा ने इस ग्रंथ का सार अंग्रेजी में उपलब्ध कराया। इस ग्रंथ में अजयमेरू की स्थापना विक्रम सं. 1170 अर्थात वर्ष 1112 का उल्लेख है। इस तिथि के पूर्व यहां मानव बस्तियां अवश्य रही होगी पर अजयमेरू नाम का नगर का कोई भी पुरातात्विक व ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अजयमेरू को चौहान साम्राज्य की राजधानी बनाई गई। बाद में अजयमेरू का नाम अजमेरे और फिर अजमेर हुआ। राजा अजयराज चौहान के उत्तराधिकारी राजा अर्णोराज ने दो पहाड़ियां वर्तमान में बजरंग गढ़ पहाड़ी और खोबरा भैरू पहाड़ी के मध्य बांध का निर्माण कराया। जो वर्तमान आनासागर झील के नाम से विख्यात है। उन्होंने पुष्कर झील के चारों ओर सुंदर घाटों का भी निर्माण कराया। अर्णोराज के द्वितीय पुत्र विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव के शासनकाल में सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला। उन्होंने बीसलसर झील व बीसलपुर नगर स्थापित किए। इनके पश्चात पृथ्वीराज द्बितीय ने शासन किया और फिर सोमेश्वर राजा बना। इन्होंने पुष्कर के पास वैद्यनाथ धाम का निर्माण तथा गंगवाना (गंगाधारव शिव को लोक) (गगवाना) को शिव मंदिरों की नगरी बनाया।

चौहान वंश के पृथ्वीराज चौहान तृतीय महानतम सम्राट हुए इन्हें अंतिम हिन्दू सम्राट माना जाता है। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में उनके दरबारी कवि जयनक कश्मीरी ने लिखा है कि इन्द्र की अमरावती, कृष्ण की द्वारिका व रावण की लंका भी मेरे याने अजयमेरू की सौंदर्य के सम्मुख लजाती थी। पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली के चौहान साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनाया। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में ही सूफी संत हारून चिश्ती के शिष्य ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेरू में अपना आसरा लिया तथा इनकी समाधि स्थल मजार (दरगाह शरीफ) के रूप में विश्व विख्यात हुई।

1562 से 1579 के मध्य बादशाह अकबर प्रति वर्ष ख्वाजा साहिब के आस्ताने पर माथा टेकने आते रहे। उन्होंने यहां अकबरी मस्जिद बनवाई और समाधि स्थल को सुंदरता प्रदान की। आगरा से अजमेर तक कोस मीनारें का निर्माण कराया जो संचार सूत्र का काम करती थी। यहां अपने निवास के लिए दौलतखाना जो अकबर का किला के नाम से जाना जाता है का निर्माण कराया। अकबर ने नगर परकोटा त्रिपोलिया गेट, दिल्ली गेट, बांसपट्टान गेट, मदार व डिग्गी गेट का भी निर्माण कराया। अकबर के किले में ही हल्दीघाटी युद्ध की रूपरेखा बनी थी।

बादशाह जहांगीर ने अजमेर में करीब तीन वर्ष तक लगातार निवास कर मुगल साम्राज्य की कैम्प राजधानी का रूप प्रदान किया। उन्होंने दौलतबाग (सुभाष उद्यान) व तारागढ़ के पास चश्मा- ए-नूर का निर्माण कराया। अजमेर में ही इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के दूत सर थोमसरो ने 10 जनवरी 1616 को सूरत में व्यापार प्रारंभ की अनुमति प्राप्त की। बेगम नूर महल को नूरजहां का खिताब यहीं दिया। शाहजहां ने दरगाह शरीफ में शाहजहांनी मस्जिद तथा आनासागर बंदे पर बारहदरियां का निर्माण कराया। 1756 में अजमेर मराठों के अधिकार में आ गया। मराठों के बाद अंग्रेजों ने अजमेर को राजपुताना का केंद्र बनाया तथा यहां की रियासतों पर नियंत्रण स्थापित कराया। 1836 में अजमेर ऑक्सफोर्ड गवर्नमेंट कॉलेज खुला तथा 1875 में लार्ड मेयो की प्रेरणा से मेयो कॉलेज की स्थापना हुई। कर्नल डिक्सन ने अजमेर-मेरवाड़ा में अनेक तालाबों का निर्माण कराया। 1876 में अजमेर रेल सेवा से जुड़ा। 1890 में यहां रेलवे के लोको कारखाने स्थापित हुए। 1894 में पहला भाप का रेल इंजन यहीं बना। यहां 1883 में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से अजमेर का वर्णन पुष्कर का उल्लेख किए बगैर अधूरा है। यहां से करीब 11 किमी की दूरी पर स्थित पुष्कर के महत्व का बाल्मीकि रामायण और महाभारत में उल्लेख मिलता है। भारत पंच सरोवरों में से पुष्कर सरोवर भी है तथा यहां ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर है। यहां गायत्री शक्ति पीठ, चामुंडा मंदिर भी है। पांडवों ने अज्ञातवास में कुछ समय यहां भी बिताया। राम ने पिता दशरथ का तर्पण गया कुंड पर किया। सभी ऋषियों ने पुष्कर में साधना की। यह तपोभूमि है।

महेंद्र विक्रम सिंह संयोजक

इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज

(इन्टैक) - अजमेर चैप्टर

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