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आतंकवाद के साथ इस्लाम का नाम लेना मुसलमानों का अपमान: अजमेर दरगाह दीवान

ईदुल अजहा के मौके पर हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने एक बयान जारी किया

Dainik Bhaskar

Aug 22, 2018, 12:47 PM IST
Ajmer dargah diwan on statement on the occasion of eid

अजमेर. ईदुल अजहा के मौके पर सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के दरगाह दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने एक बयान जारी कर कहा कि आतंकवाद के साथ इस्लाम का नाम लेना मुसलमानों का अपमान है। ऐसा करने वाले न सिर्फ इस्लाम की शिक्षाओं और उसके इतिहास के बारे में जानकारी नहीं है, बल्कि वह लोग इस्लाम धर्म को आम लोगों के बीच बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं।

- दरगाह दीवान ने कहा कि ईदुल अजहा त्याग, आत्मइच्छा का समर्पण और आज्ञाकारीता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। लोगों को इसे अपने जीवन में अपनाने की जरूरत है। इस्लाम शांति भाईचारे मिलनसार से जीवन यापन करने की शिक्षा देता है। इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने बिल्कुल स्पष्ट संदेश दिए हैं कि इस्लाम धर्म के मानने वाले अनुयाई इस्लाम के उपदेशों नियमों की अनुपालना तो पूरे मन के साथ करें। साथ ही किसी दूसरे धर्म के बारे में किसी प्रकार का गलत प्रचार या असम्मान की दृष्टि नहीं रखें। ऐसे में यदि कोई इस्लाम धर्म के विरुद्ध ऐसे अनर्गल विचार प्रकट करता है कि इस धर्म में कट्टरता अथवा आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया जाता है तो वह गलत है। इस्लाम धर्म के कमोबेश एक लाख चौबीस हजार पैगंबरों ने केवल शांति का संदेश दिया है। आतंकवाद का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है, यदि कोई इस्लाम को आतंकवादी मजहब करार देता है तो वह केवल इस धर्म से घृणा का इजहार करते हैं।

हिंसा और इस्लाम में आग और पानी जैसा बैर

- उन्होंने कहा कि इस दौर में इस्लाम को आतंकवाद से इस तरह जोड़ दिया गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी ग़ैर मुस्लिम के सामने इस्लाम का शब्द ही बोलता है तो उसके मन में तुरंत आतंकवाद का ख़याल घूमने लगता है। जबकि हिंसा और इस्लाम में आग और पानी जैसा बैर है। जहां हिंसा हों वहां इस्लाम की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। इसी तरह जहां इस्लाम हो वहां हिंसा की हल्की सी भी छाया नही पड़ सकती। इस्लाम अमन व सलामती का स्रोत और मनुष्यों के बीच प्रेम को बढ़ावा देने वाला मजहब है।

- इस्लाम की शिक्षाओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस्लाम की शिक्षाओं से सहाबा -ए-कराम अमन व अमान का दर्स देते रहे। उनके बाद फिर हर दोर में उलेमा-ए-इस्लाम ,ओलिया-ए-किराम और सूफ़िया-ए-इजाम उल्फत व मोहब्बत का दर्स देते रहे। आज तक मजहब-ए-इस्लाम में उलफत व मोहब्बत का दर्स दिया जा रहा है। यह बात साबित है कि आज जो इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। जो गलत है। अगर कोई ऐसा व्यक्ति आतंकवाद करे जो टोपी और कुर्ता पहना हो तो उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि मुसलमान आतंकवादी है। मुसलमान केवल टोपी-दाढ़ी रख लेने का नाम नहीं है, बल्कि जिसके अंदर लोगों के ख़ून की हिफ़ाज़त करने का जज़्बा होगा ,नाहक़ क़त्ल और गारत को रोकने वाला होगा वह मुसलमान होगा। इस्लाम इसी की तालीम देता है।

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Ajmer dargah diwan on statement on the occasion of eid
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