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कमाई नहीं होने से 100 दुकानें हुई बंद

Ajmer News - कमाई नहीं होने की वजह से जिले भर में उचित मूल्य की 100 दुकानें अभी तक बंद हो चुकी है। इधर, विभाग ने 104 दुकानें आवंटित...

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2018, 03:10 AM IST
कमाई नहीं होने से 100 दुकानें हुई बंद
कमाई नहीं होने की वजह से जिले भर में उचित मूल्य की 100 दुकानें अभी तक बंद हो चुकी है। इधर, विभाग ने 104 दुकानें आवंटित करने के लिए जो आवेदन मांगे थे उनमें से 125 आवेदन ही सही पाए गए हैं। इसके चलते सभी दुकानों का आवंटन होना संभव नजर नहीं आ रहा है।

100 से अधिक दुकानें बंद हुई | कमाई नहीं होने की वजह से अभी तक जिले में 100 से अधिक दुकानें बंद हो चुकी है। भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ सकती है। सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में राशन की दुकान चलाना चलाना घाटे का सौदा है। शहरी क्षेत्र में एक दुकानदार को लगभग 25 से 30 क्विंटल गेहूं मिलता है। राशन विक्रेता को एक क्विंटल पर 77 रुपए मिलते है। यानी 30 क्विंटल पर करीब 2400 रुपए मिलते हैं। कैरोसिन और शक्कर नहीं के बराबर मिलती है। जानकार लोगों का कहना है कि शहरी क्षेत्र में दुकानदार को पांच से छह हजार रुपए की आय होती है। शहरी क्षेत्र की अपेक्षा में ग्रामीण क्षेत्र में दुकानदार को अधिक काय होती है। ग्रामीण क्षेत्र में एक दुकानदार को औसतन 70 क्विंटल गेहूं आवंटित होता है। यानि साढ़े पांच हजार रुपए से अधिक की आय होती है। सब आय मिलाकर सात से आठ हजार होती है। ग्रामीण क्षेत्र में लोगों ने घरों में दुकानें खोल रखी है, इस वजह से कम खर्चा आता है, जबकि शहरी क्षेत्र में यह खर्चा बहुत अधिक हो जाता है। सूत्रों के अनुसार जो 100 दुकानें बंद हुई है, वह शहरी क्षेत्र की अधिक हैं। विभाग ने अजमेर, पुष्कर, नसीराबाद, किशनगढ़, रूपनगढ़, पीसांगन, ब्यावर, टॉटगढ़, मसूदा, भिनाय, केकड़ी और सरवाड़ उपखंड क्षेत्र की दुकानों के लिए आवेदन मांगे थे।

आवेदन कम आने की वजह से विभाग ने आवेदन की तारीख 30 अक्टूबर रखी थी, लेकिन निर्धारित अवधि में 285 ही आवेदन जमा हुए हैं। शुक्रवार को आवेदनों की जांच के बाद 125 ही आवेदन सही पाए गए हैं। इतने कम आवेदन देखकर विभाग भी चकित है।

सूत्रों के अनुसार सफल आवेदन में कुछ दुकानें ऐसी है, जिनके लिए एक भी आवेदन नहीं मिला है। कुछ के लिए पांच से छह आवेदन आए हैं। ऐसे में विभाग के सामने समस्या यह है कि जिन दुकानों के लिए आवेदन नहीं आए हैं अथवा एक ही आया उनको कैसे आवंटित किया जाएगा। नियमानुसार एक से अधिक आवेदन होना चाहिए।

नई तकनीक और कम कमाई की वजह से नहीं मिले आवेदन

राशन की दुकानों के लिए पहले लंबी कतार लगती थी। एक दुकान के लिए कम से कम से कम चालीस से पचास आवेदन आते थे। आवंटन समिति में सरकार के जनप्रतिनिधि शामिल होते थे और यह माना जाता था कि सरकार से संबंधित पार्टी के लोगों को दुकान मिलेगी। पहले राशन सामग्री का वितरण मैनुअल होता था। इसके अलावा कैरोसिन भी मिलता था, लेकिन अब सामग्री का वितरण पीओएस मशीनों से होता है, जिसमें काला बाजारी लगभग समाप्त हो गई है। इसी प्रकार पहले जिले को 1100 केएल कैरोसिन का को ही मिलता था, लेकिन गैस सिलेंडर वितरित होने के बाद कोटा 300 केएल ही रह गया है। इसके चलते अब लोग दुकान लेने के इच्छुक नहीं है।

मुनाफे का गणित गड़बड़ाया तो घटी रुचि

जानकार लोगों का कहना है कि मैनुअल में दुकान विभाग से तो शत-प्रतिशत स्टॉक उठाता था, लेकिन वितरित आधी सामग्री ही करते थे। शेष सामग्री बाजार में बेच देते थे, जिससे अच्छी खासी आय हो जाती थी, लेकिन मशीन के माध्यम से अब यह संभव नहीं हो पा रहा है। मशीन से सामग्री वितरीत होने के बाद तीस प्रतिशत कम सामग्री उठ रही है। इसके अलावा विभाग ने दुकानों के लिए शर्तें काफी कड़ी रखी थी, जिसमें आवेदक की शैक्षणिक योग्यता स्नातक एवं कम्प्यूटर अथवा अन्य समकक्ष सरकारी संस्था का तीन माह का आधारभूत प्रशिक्षण होना, कम्प्यूटर का डिप्लोमा, आवेदक द्वारा तहसीलदार जारी एक लाख रुपए का हैसियत प्रमाण पत्र देने सहित अन्य शर्तों की वजह से भी आवेदन कम जमा हुए।


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