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समय पर बजट नहीं, स्कूल कर रहे अभिभावकों को परेशान

राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के तहत निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत बच्चों को एडमिशन देने के बाद बजट के अभाव में कई स्कूल उन...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:15 AM IST

राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के तहत निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत बच्चों को एडमिशन देने के बाद बजट के अभाव में कई स्कूल उन बच्चों और अभिभावकों को परेशान करने लगे हैं। हालात यह हैं कि अभिभावकों से फीस मांगी जा रही है और नहीं देने पर कई स्कूलों ने तो रिजल्ट तक रोक दिए हैं। ऐसे अभिभावकों को न तो स्कूल से राहत मिल पा रही है और न ही सरकारी स्तर पर। आरटीई में एडमिशन करवाने वाले अभिभावकों की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि वे बच्चों की फीस दे सकें, ऐसे में उन्हें बच्चों को स्कूल से निकालने के लिए भी दबाव बनाया जाने लगा है। भास्कर के पास पहुंचे कुछ अभिभावकों ने इस संबंध में शिकायत भी दी है।

महज 30 फीसदी ही मिला बजट, स्कूलों ने फीस के लिए बच्चों पर बनाना शुरू कर दिया दबाव

जटिल संशोधन ने निजी स्कूलों की बढ़ाई परेशानी

2014 के बाद आरटीई में राज्य सरकार ने काफी परिवर्तन किए हैं, जो संशोधन 2014 के बाद में है, उसके कारण आरटीई में प्रवेश प्रक्रिया जटिल हो गई है। कागजी औपचारिकता बढ़ने के कारण आरटीई में प्रवेश लेने के लिए बच्चों को काफी परेशानी हो रही है। आरटीई में 2014 से पूर्व किसी प्रकार की कोई तिथि निर्धारित नहीं थी, तब प्रवेश प्रक्रिया जुलाई-अगस्त तक चलती रहती थी, मगर 2014 के बाद जो संशोधन हुआ, उसमें तिथि निर्धारित कर दी गई, इस कारण अब प्रवेश प्रक्रिया के आवेदन 31 मार्च तक ही कर सकते थे। परिणामस्वरूप कई बच्चे प्रवेश लेने से वंचित रह गए। इस अधिनियम में 2014 से पहले जो कैचमेंट एरिया निर्धारित किया था, उसे अब हटा दिया गया है, इससे असुविधा बढ़ी है।

...तो फंड में कमी क्यों ? | सरकार शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, इसके बावजूद आरटीई के बजट में लेटलतीफी की जा रही है। आरटीई का जो भुगतान अभी तक पूरा हो जाना होता है, उसका कुछ पता नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक सत्र 2017-18 में महज 30 फीसदी बजट ही मिल पाया था।

कहां अटका है भुगतान | अभी तक जो आंकड़े सामने आए हैं उसके अनुसार वर्ष 2017-18 में कुल 947 स्कूलों ने जिसमें प्राथमिक और माध्यमिक दोनों शामिल हैं, ने अजमेर जिले से आरटीई के भुगतान के लिए आवेदन किए हैं। इसमें से कुल 405 स्कूलों को ही प्रथम किश्त का भुगतान मिल पाया है।

आय सीमा 2.5 लाख से घटाकर 1 लाख

आरटीई में ओबीसी और जनरल श्रेणी में आने वाले अभिभावकों की जो आय सीमा 2.5 लाख तक थी, उसे घटाकर अब 1 लाख कर दी है। एससी, एसटी, विधवा और बीपीएल के लिए किसी प्रकार की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। प्राथमिक सेटअप में कुल 598 स्कूलें हैं, जिसमें से मात्र 318 स्कूलों को ही प्रथम किश्त का भुगतान हुआ है, जबकि माध्यमिक प्रथम व द्वितीय में 274 स्कूलों में से 87 स्कूलों को अभी प्रथम किश्त का भुगतान हुआ है।

पोर्टल भी नहीं है व्यवस्थित : आरटीई के लिए बने पोर्टल की स्थिति भी सही नहीं है, पोर्टल पर एक अभिभावक 10 से 15 स्कूलों का चयन कर रहे हैं। इसके चलते जो आंकड़े आ रहे हैं उनकी गणना करना कठिन हो रहा है। जो कैचमेंट एरिया पहले निर्धारित था, पोर्टल पर उसे भी नहीं बताया गया है, इस कारण भी एक व्यक्ति कई स्कूलों में आवेदन कर रहा है। इससे इस अधिनियम के तहत कितने बच्चों ने आवेदन करे उसका सही आंकलन नहीं लग पा रहा है।

राज्य सरकार सरकारी स्कूल के बच्चों पर हर साल 18000 प्रति छात्र खर्च कर रही है, तो आरटीई के बच्चों के लिए न्यूनतम मूल्य क्यों दे रही हैं? निजी स्कूलों को बजट भी नहीं मिल रहा, जिससे परेशानी हो रही है। - कैलाश शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष, राजस्थान प्राइवेट एजुकेशन एसोसिएशन

निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों को परेशान करने की शिकायत नहीं मिली है। अगर निजी स्कूल ऐसा कर रहे हैं तो मामले की जांच करवाई जाएगी। अभिभावक इस मामले में हमें शिकायत दें। - हीरालाल सैनी, डीईओ माध्यमिक

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