निबंध में काेई प्रतिबंध नहीं बल्कि विचाराें का विस्तार हाेता है : मधु अाचार्य

Ajmer News - अजमेर| सम्राट पृथ्वीराज चाैहान राजकीय काॅलेज अजमेर में शनिवार काे राजस्थानी िनबंध में सांस्कृतिक चेतना विषय पर...

Bhaskar News Network

Oct 13, 2019, 06:45 AM IST
Ajmer News - rajasthan news there is no restriction in the essay but an expansion of thoughts madhu acharya
अजमेर| सम्राट पृथ्वीराज चाैहान राजकीय काॅलेज अजमेर में शनिवार काे राजस्थानी िनबंध में सांस्कृतिक चेतना विषय पर परिसंवाद का अायाेजन किया गया। इस परिसंवाद में राजस्थानी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए निबंध लेखक काे बढ़ावा देने की बात कही गई। राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकाराें ने इस परिसंवाद में हिस्सा लिया था। जिसमें उदघाटन सत्र में बताैर मुख्य अतिथि पद्मश्री सीपी देवल शामिल हुए थे। प्रमुख वक्ता के ताैर पर राजस्थानी परामर्श मंडल के संयोजक, वरिष्ठ साहित्यकार अाैर पत्रकार मधु अाचार्य “अाशावादी’’ ने शिरकत की थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार डाॅ. श्रीलाल माेहता ने की।

साहित्य अकादमी नई दिल्ली अाैर एसपीसी जीसीए के संयुक्त तत्वावधान में अायाेजित इस परिसंवाद में मधु आचार्य अाशावादी ने कहा कि आज राजस्थानी भाषा उपन्यास और कहानी लिखने वाले ज्यादा हैं लेकिन निबंध लिखने वालाें की संख्या कम हैं। जरूरत है कि राजस्थानी भाषा में निबंधों की पुस्तकें ज्यादा से ज्यादा प्रकाशित हाे ताकि भाषा और संस्कृति का संरक्षण किया जा सके। इस माैके पर मुख्य अतिथि चंद्रप्रकाश देवल ने कहा कि निबंध भाषा का आरसी है, उन्होंने राजस्थानी के शब्दों का महत्व बताया।अध्यक्षता करते हुए डाॅ. श्रीलाल मोहता ने कहा कि निबंध व्यक्ति, विचार, समाज से बंधा हुआ होता है।

पहले सत्र में कैलाश दान चारण ने “राजस्थानी निबन्ध मांय जुगबोध’’, डाॅ. नमामी शंकर आचार्य ने “राजस्थानी निबन्धां मांय संस्कृति’’ अाैर श्रीकृष्ण कुमार आशु ने “राजस्थानी निबन्धां मांय समाज सुधार, उपदेश अर नीति री बांता’’ विषय पर पत्र वाचन किया। इस सत्र के अध्यक्ष रहे डाॅ. सोहन दान चारण ने कहा कि राजस्थानी निबन्धों में संस्कृति के साथ जुग बोध को भी प्रस्तुत करने की जरूरत है। दूसरे सत्र में दो पत्रों का वाचन किया गया। डाॅ. मंगत बादल ने “राजस्थानी निबन्धां मांय आदमी रो उणियारों’’ अाैर विमला महरिया ने “राजस्थानी निबन्धां मांय ग्राम्य जीवन’’ विषय पर अपना पत्र प्रस्तुत किया। इस माैके पर सत्र के अध्यक्ष डाॅ. लक्ष्मीकांत व्यास ने कहा कि आज मनुष्य का मनुष्यत्व निजि स्वार्थ के कारण समाप्त हो रहा है, जिसके लिए निबंधकारों को विश्लेषणात्मक निबन्ध लिखने की जरूरत है।

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