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एक बार फिर सरकार के निशाने पर मीडिया

पिछले पचास वर्षों में भारत ने अपना कार्यकाल पूरा करने वाले बहुमत प्राप्त तीन शक्तिशाली प्रधानमंत्री देखे हैं।...

Danik Bhaskar | Apr 17, 2018, 05:20 AM IST
पिछले पचास वर्षों में भारत ने अपना कार्यकाल पूरा करने वाले बहुमत प्राप्त तीन शक्तिशाली प्रधानमंत्री देखे हैं। पहली इंदिरा गांधी थीं, जो 1971 के मार्च में विपक्ष के सफाए के बाद आई थीं। दूसरे 1984 में आए राजीव गांधी थे। अब तीसरे हैं नरेन्द्र मोदी, जो पांचवें वर्ष में कदम रखने ही वाले हैं। इन तीनों के बारे में समानता क्या है? इनमें से प्रत्येक ने अंतिम वर्ष में मीडिया को निशाना बनाया। इंदिरा गांधी ने तो पांचवां वर्ष शुरू होते ही सेंसरशिप लागू की (बाद में उन्होंने अपना कार्यकाल एक साल और बढ़ा लिया)। उनका तर्क था कि मीडिया नकारात्मकता व हताशा फैला रहा है और भारत को अस्थिर करने में लगे ‘विदेशी हाथ’ के साथ है। राजीव गांधी मानहानि विरोधी विधेयक लाए थे। तब वे बोफोर्स, जैल सिंह की चुनौती, वीपी सिंह के विद्रोह व कई अन्य समस्याओं से घिरे थे। वे नाकाम रहे।

अब मोदी ने ‘फेक न्यूज़’ से निपटने के नाम पर मुख्यधारा के मीडिया के खिलाफ पहल की है। इसे उतनी ही नाटकीयता से वापस ले लिया गया, जितनी नाटकीयता से इसकी घोषणा की गई थी। लेकिन, बाद में डिजिटल मीडिया के लिए मानक तय करने के उद्‌देश्य से समिति गठित कर दी। दलील यह है कि प्रेस के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और प्रसारकों के लिए न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी है पर डिजिटल मीडिया के लिए कोई नियामक संस्था नहीं है।

पत्रकारिता के सबसे पुराने सिद्धांतों में से है ‘तीन उदाहरणों का नियम।’ हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि शक्तिशाली सरकारों को कार्यकाल के आखिरी वर्ष में कुछ हो जाता है कि वे संदेशवाहक को निशाना बनाना चाहते हैं। शायद इसलिए कि जिस अगले कार्यकाल को वे मानकर चल रहे थे उसके बारे में बढ़ती असुरक्षा से वे निपट नहीं पाते। हम जानते हैं 1975 आते-आते इंदिरा गांधी 20 फीसदी की महंगाई दर और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से बेजार थीं। यह हमारा भ्रम होगा कि मतदाताओं ने उन्हें प्रेस पर अंकुश लगाने की सजा दी। यदि उन्होंने नसबंदी की महाभूल न की होती तो तो इमरजेंसी का ‘अनुशासन’ बहुत लोकप्रिय था। लेकिन, उनकी हार और जिन विरोधियों को उन्होंने जेल में डाला था उनके उत्थान के साथ एक सामाजिक प्रतिबद्धता निर्मित हुई व जनमत ने सेंसरशिप की भयावहता को स्वीकारा और प्रेस की स्वतंत्रता में भागीदार बना। प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले नियम न होने वाले देश में जनमत में यह बदलाव बड़ी बात थी।

इमरजेंसी में अपनी मिलिभगत से व्यथित सुप्रीम कोर्ट ने इन दशकों में इस सामाजिक प्रतिबद्धता को रीढ़ दी। प्रेस को काबू करने के इंदिरा गांधी के बड़े कदम का उल्टा असर हुआ। राजीव ने भी अपने पतन का दोष मीडिया के मत्थे मढ़ने की कोशिश की पर उसका भी उल्टा असर हुआ। शीर्ष भारतीय पत्रकार और यहां तक कि मालिकों ने भी प्रतिद्वंद्विता भुलाकर राजपथ के विरोध प्रदर्शन में वह एकजुटता दिखाई, जो इमरजेंसी में नदारद थी। राजीव पीछे हटे पर इस प्रक्रिया में भारत ने मीडिया की नई एकजुटता और स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्धता को देखा और उसे सराहा। शक्तिशाली सरकारों द्वारा मीडिया को काबू करने का हर प्रयास स्वतंत्रता को ही मजबूत बनाने में खत्म हुआ। क्या इस बार भी यही होगा?

किंतु आज दो नकारात्मकताएं भी हैं। एक, जिस सामाजिक प्रतिबद्धता की बात ऊपर की गई थी वह कमजोर पड़ रही है। दो, अब मीडिया अधिक विभाजित है। इसमें वैचारिकता व दृष्टिकोण के आधार पर हमेशा से विभाजन था- जैसा एक अच्छे लोकतंत्र में होना चाहिए। आज यह प्लेटफॉर्म के आधार पर भी विभाजित है। सरकार की नज़र इस विभाजन पर है। बड़ा प्रहार तब होगा जब दरारें गहराएंगी। जब सरकार कहती है कि प्रिंट व प्रसार माध्यमों की नियामक संस्था है पर डिजिटल की नहीं, तो इरादा बांटने का है। मीडिया के परम्परागत घराने जो प्रिंट, प्रसार व डिजिटल में काम करते हैं सोचेंगे कि इससे उन्हें चिंता नहीं है, क्योंकि वे अपनी-अपनी ‘व्यवस्थाओं’ के घेरे में हैं। इसलिए डिजिटल का उसकी नियति से मिलन होने दो। खासतौर पर तब जब यह मीडिया नए डिजिटल खिलाड़ियों को उनकी खिल्ली उड़ाने, उन्हें भ्रष्ट, अक्षम व समझौतावादी के रूप में दिखाने का प्रयास (कुछ हद तक सही) करते देख आगबबूला होता है। दूसरी तरफ कई नए डिजिटल खिलाड़ी मानते हैं कि इंटरनेट को काबू करना असंभव है। असली ज़िंदगी में ऐसा नहीं होता। सरकार सिर्फ एक अधिसूचना लाकर लाइसेंस जैसी कोई चीज या इससे बुरा कुछ ला सकती है। ऐसा हुआ तो आप अकेले इससे नहीं लड़ पाएंगे। आप को वही परम्परागत मीडिया लगेगा, जिससे कुछ को इतनी अरुचि है। इसका उल्टा भी सच है। ‘कोई रेवेन्यू मॉडल न होने वाले इन ‘अहंकारी’ पाखंडियों’ के प्रति पुराने जमे हुए संस्थानों की नफरत भी आत्म-घातक है। पिछले हफ्ते कठुआ से उन्नाव तक अन्याय की भयावह घटनाएं हावी रहीं। दोनों जगहों पर राजनीतिक प्रतिष्ठान का अहंकार न्याय की राह रोक रहा था। मुख्यत: सारे प्लेटफॉर्म पर मीडिया के शानदार काम ने बाजी पलट दी।

संकट के दौर में सबकी जरूरत होती है। कोई मुख्य धारा, गौणधारा या बहिष्कृत जैसा विभाजन नहीं है। हम असहमत होंगे, लड़ेंगे और प्राय: एक-दूसरे का आकलन करेंगे। हम पत्रकार होते ही ऐसे हैं (आपका रूपक चुराने के लिए माफ करें देवेगौड़ा)। जब प्रेस की आज़ादी दांव पर हो तो मौका यह सब करने का नहीं है। इसलिए दूसरे पर फैसला मत दो फिर उसकी पत्रकारिता से आपको कितनी ही नफरत क्यों न हो। आप अपनी आज़ादी तब सुरक्षित रख सकते हैं जब अपने प्रतिद्वंद्वियों और वैचारिक विरोधियों के लिए भी लड़ते हैं।

मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में यह बात कह रहा हूं जो आपातकाल के दौर में पत्रकारिता का छात्र था और अब मीडिया की तीनों धाराओं में एक साथ काम कर रहा हूं। मैं उन कई लोगों में से हूं, जो एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को कम वक्त देने के दोषी हैं। मेरा रवैया अंहकारपूर्ण व गलत था। हम पत्रकारों को अपने तमाम नए पुराने संस्थानों को मजबूत बनाना होगा। अब वक्त आ गया है कि हम आपसी सहमति से काम करें और सिद्धांतों की रक्षा करें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हम कहां और किस धारा में पत्रकारिता करते हैं। याद रहे, स्वतंत्रता को किस्तों में खत्म नहीं किया जा सकता।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta