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दर्शकों काे संग्रहालय में प्रदर्शित 19वीं सदी में बने हाेली खेलते राधा-कृष्ण के चित्र लुभाते हैं
संग्रहालय अाने वाले पर्यटकाें के लिए कागज पर पानी के रंग से बने अलवर शैली के 19वीं शताब्दी के राधाकृष्ण के हाेली के चित्र भी अाकर्षण के केंद्र हैं। एक चित्र में कृष्ण राधा काे गुलाल लगाते हुए दर्शाया गया है। इसमें सखियां गुलाल फेंकती हुई व सारंगी बजाती दिखाई हैं। हाेली के अन्य चित्राें में कृष्ण एक हाथ में गुलाल अाैर दूसरे में पिचकारी लिए हैं। उनके पास राधा खड़ी है। राधाकृष्ण पर सखियां गुलाल फेंक रही अाैर ढप बजा रही हैं। 19वीं शताब्दी में अलवर अाैर बीकानेरी शैली में बनी बारहमासा चित्रावली पर्यटकाें के लिए देखने के लिए प्रदर्शित की हुई है। इसमें फाल्गुन मास काे हाेली के चित्र के माध्यम से बताया गया है। इसमें लाेग एक दूसरे के साथ हाेली खेल रहे हैं। बारहमास के चित्र उसी परंपरा के अंग हैं। इनका अाधार ब्रजभाषा का काव्य साहित्य है। कवियाें ने प्रत्येक महीने की विशेषताअाें का वर्णन करते हुए लाेकजीवन काे चित्रित किया है ताे कहीं नायक नायिका की विरह वेदना के सहारे प्रकृति चित्रण किया है। हिंदी साहित्य में रीतिकालीन कवि केशवदास का बारहमास सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस पर अाधारित राजस्थानी व पहाड़ी शैली में चित्रावलियां बनी हैं। बाद में कई लाेक कवियाें ने भी बारहमासा का वर्णन लिखा है। हाेली पर केंद्रित 420 साल पुराना एक चित्र भी है, जिसमें महिलाअाें के साथ हाेली खेलते हुए मुगल शासक जहांगीर हैं। यह चित्र अभी संग्रहालय में जगह नहीं हाेने के कारण मालखाने में रखा है।
संग्रहालय में लगी 19 वीं शताब्दी की अलवर शैली में बारहमासा चित्रावली में फाल्गुन मास में अाने वाले हाेली के त्याेहार पर बनाई गई पेंटिंग। जिसमें महिला पुरुष पिचकारी से हाेली खेल रहे हैं।
अलवर. अपने बगीचे में हाेली खेलते मुगल शासक जहांगीर।