परिवार काे अार्थिक संबल देने के लिए पढ़ाई के साथ हुनर सीखा, बच्चाें की बनाई मनमाेहक कलाकृतियां देखकर लाेग बाेले-वाह

Alwar News - घाेड़ाफेर चाैराहे पर स्थित संस्कृत विद्यालय में सामर्थ्य फाउंडेशन, राेटरी क्लब अाॅफ अलवर व संस्कृत विद्यालय की...

Oct 13, 2019, 06:46 AM IST
घाेड़ाफेर चाैराहे पर स्थित संस्कृत विद्यालय में सामर्थ्य फाउंडेशन, राेटरी क्लब अाॅफ अलवर व संस्कृत विद्यालय की अाेर से शनिवार काे शुरू हुए दाे दिवसीय हैंडी क्राफ्ट मेले में स्कूली बच्चाें की बनाई कलाकृतियां प्रदर्शित की गई। ये किसी भी कुशल दस्तकार की बनाई कलाकृति से कम नजर नहीं अाई। इन कलाकृतियाें काे देखकर अफसर, प्राेफेसर व व्यवसायी भी यही करते नजर अाए कि वाह, बचपन में ही एेसी कला। स्कूली छात्र-छात्राअाें का हुनर चकित करने वाला है। ये शब्द कलाकृति बनाने वाले बच्चाें के लिए किसी मैडल से कम नहीं थे। इन बच्चाें की अाेर से दिवाली के लिए बनाई विभिन्न सजावटी वस्तुअाें का मेला रविवार काे भी चलेगा। मेले के लिए कलाकृतियां बनाने वाले इन बच्चाें की मेहनत, लगन व परिवार के लिए कुछ करने की चाह है। इन बच्चाें ने बताया कि आर्थिक रूप से जूझते अपने परिवार काे देखकर उनकी चाह थी कि कुछ एेसा करें जिससे परिवार का आर्थिक बाेझ कम हाे। साथ ही वे एेसा हुनर सीख सकें जाे उनके जीवन में काम अाए। उन्हाेंने अपनी चाह के अनुसार राह निकाली अाैर एेसा कार्य किया कि अन्य बच्चाें काे प्रेरणा दे रहा है।

पढ़ाई के लिए 10 किलाेमीटर साइकिल चलाकर मदनपुरी से संस्कृत स्कूल अाने वाली 11वीं कक्षा की चांदनी सैनी ने बताया कि उसके पिता माेहन लाल एक ढाबे पर काम करते हैं। उनकी मेहनत देखकर मैं भी कुछ करना चाहती थी। सामर्थ्य फाउंडेशन की अाेर से लगाए गए प्रशिक्षण शिविर में 3 महीने तक भाग लिया। घर वाले कहते थे कि तू अपनी पढ़ाई पूरी कर ले। मैं सजावटी सामान बनाने के साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी करती रही। इससे उन्हें शिकायत नहीं रही। संस्कृत स्कूल की ही पलक ने बताया कि सामर्थ्य फाउंडेशन के शिविर में मैंने दीए, हैंगिंग्स, डिजाइन की हुई बाेतल, अन्य कलाकृतियां, पूजा थाली बनाना सीखा। मेंरे पिता सिलाई का काम करते हैं। इसलिए मैंने शिविर में विभिन्न सामग्री बनाना सीखी। अब मुझे लगता है कि जीवन में एेसा हुनर सीख लिया है जाे मेरी सहायता करेगा। इसी विद्यालय की गामिनी ने बताया कि कुछ कलात्मक बनाने की मेरी रुचि रही है। पढ़ाई के समय पढ़ाई करती हूं। घर वालाें की इजाजत से प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया। छुट्टी के दिन कम से कम 4 घंटे व अन्य दिनाें में 2 घंटे कलाकृति बनाने के प्रशिक्षण शिविर में भाग लेती। स्कूल के बाद भी कई बार दाे घंटे जाकर दीपावली पर काम अाने वाली विभिन्न वस्तुएं बनाना सीखती। हम बच्चे पढ़ाई के साथ इस तरह की घरेलू वस्तुएं बनाना सीख लें ताे यह हमारा भविष्य संवार सकता है। इसी स्कूल के छात्र प्रियांशु शर्मा ने बताया कि पढ़ाई के साथ कुछ नया करने की बात मन में थी। एसयूपीडब्ल्यू के पीरियड में स्कूल में कलाकृतियां बनाना शुरू किया। शिविर में अाैर भी कई नई वस्तुएं बनाना सीखी। मुझे लगता है कि पढ़ाई के साथ हम इस तरह के काम खेल खेल में करें ताे बहुत उपयाेगी हाेगा।

3 हजार प्राॅडक्ट बनाए : इंडियन इन्स्टीटयूट अाॅफ क्राफ्ट एंड डिज़ाइन से पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद सामर्थ्य से जुड़कर इन बच्चो के साथ कुछ नया किया। बच्चाें काे सिखाना शुरू किया ताे इनकी संख्या 30 तक पहुंच गई। 3 महीने की मेहनत व बच्चों की लगन से हैंडक्राॅफ्ट मेला लगाने में कामयाब हुए। करीब 3 हज़ार प्राॅडक्ट बनाए।

-निकिता गर्ग, बच्चाें काे कला का हुनर सिखाने वाली प्रशिक्षक।

हैंडीक्राॅफ्ट मेला देखने कलेक्टर भी पहुंचे

हैंडीक्राफ्ट मेला देखने के लिए जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह भी पहुंचे। इनका स्वागत सामर्थ्य फाउंडेशन के शशांक झालानी, मनीष जैन, विकास गर्ग, बाबू झालानी व संस्कृत स्कूल प्रधानाचार्य डाॅ दीवान सिंह राजावत ने किया।

हैंडीक्राॅफ्ट मेले में बच्चाें की बनाई कलाकृतियाें काे देखते लाेग।

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