पाकिस्तानी दुल्हनों का हक छीनता है निकाहनामा

Alwar News - है। दस्तावेज को अपने हिसाब से लिखने के लिए कहने वाली महिलाओं पर गलत तौरतरीके अपनाने के आरोप लगते हैं। अमेरिका की...

Feb 22, 2020, 06:40 AM IST

है। दस्तावेज को अपने हिसाब से लिखने के लिए कहने वाली महिलाओं पर गलत तौरतरीके अपनाने के आरोप लगते हैं। अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली आयशा सरवारी से शादी के समय ऐसे करारनामे पर दस्तखत कराए गए जो उन्होंने नहीं देखा था। महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली एक्टिविस्ट चाहती हैं कि तलाक होने पर महिलाओं को परिवार की संपत्ति का ज्यादा हिस्सा मिलना चाहिए। लेकिन, लाहौर में ला कॉलेज की जुबैर अब्बासी कहती हैं, ऐसा होने में संदेह है।

पाकिस्तान सरकार ने 1961 में इस्लामी परंपरा में शामिल निकाहनामे को कानूनी शक्ल दी थी। धार्मिक नेताओं ने इस सुधार को गैरइस्लामी करार दिया था। सरकार का इरादा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने का था। कानून के मुताबिक पुरुष अपनी इच्छा से तलाक दे सकते हैं। चार शादियां कर सकते हैं पर उन्हें नई प|ी को अपनी बाकी प|ियों के बारे में बताना पड़ता है। महिलाओं के लिए पुरुषों के समान अधिकारों का जिक्र रहता है। लेकिन, असलियत अलग है। महिलाओं को तलाक लेने के लिए कोर्ट जाना पड़ता है। आमतौर पर उन्हें दहेज (मेहर) से वंचित होना पड़ता है। हालांकि, मेहर का प्रावधान कानूनी है। पंजाब प्रांत में 14 हजार निकाहनामों के विश्लेषण में पाया गया कि इनमें से 35% को अवैध तरीके से बदला गया है। इमाम और मैरिज रजिस्ट्रार अपने हाथ से दुल्हन के अधिकारों की रक्षा करने वाले प्रावधान बदल देते हैं। अधिकतर महिलाएं पढ़े बिना निकाहनामे पर दस्तखत कर देती हैं।

पेशावर में लगभग 75% महिलाओं का कहना था कि निकाहनामे पर उनसे कोई चर्चा नहीं की गई है। दस्तावेज को अपने हिसाब से लिखने के लिए कहने वाली महिलाओं पर गलत तौरतरीके अपनाने के आरोप लगते हैं। अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली आयशा सरवारी से शादी के समय ऐसे करारनामे पर दस्तखत कराए गए जो उन्होंने नहीं देखा था। महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली एक्टिविस्ट चाहती हैं कि तलाक होने पर महिलाओं को परिवार की संपत्ति का ज्यादा हिस्सा मिलना चाहिए। लेकिन, लाहौर में ला कॉलेज की जुबैर अब्बासी कहती हैं, ऐसा होने में संदेह है।

पाकिस्तान सरकार ने 1961 में इस्लामी परंपरा में शामिल निकाहनामे को कानूनी शक्ल दी थी। धार्मिक नेताओं ने इस सुधार को गैरइस्लामी करार दिया था। सरकार का इरादा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने का था। कानून के मुताबिक पुरुष अपनी इच्छा से तलाक दे सकते हैं। चार शादियां कर सकते हैं पर उन्हें नई प|ी को अपनी बाकी प|ियों के बारे में बताना पड़ता है। महिलाओं के लिए पुरुषों के समान अधिकारों का जिक्र रहता है। लेकिन, असलियत अलग है। महिलाओं को तलाक लेने के लिए कोर्ट जाना

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