स्वांग से ही हुई थी दशहरे पर रामलीला की शुरुअात
हाेली के त्याेहार ने शहर काे बहुत कुछ दिया है। हास्य कला के स्वांग से लेकर आध्यात्मिक भाव में रामलीला प्रदर्शन तक हाेली की देन है। शहर में आपसी भाईचारा बनाए रखने के लिए भजन जिकड़ी के कार्यक्रम 64 कुअाें अाैर 20 माेहल्लाें में विशेष रूप से आयोजित हाेते थे।
अलवर के महाराजा जयसिंह रथ में सवार होकर गुलालघोेटे फेंककर आमजन से हाेली खेलते अाैर मिलते थे। इसे देखने के लिए भीड़ जमा हाेती थी।
स्वांग के कलाकाराें के अभिनय काे अाज भी लाेग करते हैं याद : हाेली के कारण ही स्वांग की परंपरा शुरू हुई। इसने लाेगाें काे मनाेरंजन का साधन दिया। मुंशी बाजार, मोहल्ला अखैपुरा, पुराना कटला, मेहताबसिंह का नौहरा स्वांग कला के केन्द्र रहे। सेठ-सेठानी के स्वांग के लिए मुंशीबाग के बाबूलाल शर्मा के सेठ-सेठानी व फकीर, लालाराम गुप्ता के सेठ, नारायणलाल सैनी काे बोहरी व हुकम चन्द सिंघल के मुनीम के अभिनय को आज भी याद किया जाता है। मुंशीराम गुप्ता, मातादीन सोनी और राधेश्याम सोनी का नाम भी स्याहगोश के स्वांग के लिए जाना जाता है। गणगौर के स्वांग के लिए नत्थूसिंह सोमवंशी का नाम खास था। इसमें उस्ताद रामभरोसी स्वांग में नाचते और गाते तो तालियों की गूंज सुनाई देती थीं। हमारी मित्रमंडली में शामिल हरिशंकर गोयल, स्व. रूप शर्मा, स्व. राजेश शर्मा, मा. प्यारेसिंह, हीरालाल सोमवंशी के नेतृत्व में शहर में 25 वर्ष तक सेठ सेठानी के स्वांग का प्रदर्शन किया गया। अब इसे पहल सेवा संस्थान निकालता है।
स्वांग की हाेती थी प्रतियाेगिता : नगर परिषद की अाेर से स्वांग की इनामी प्रतियोगिता होपसर्कस पर होती थी। नगर परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष रामचन्द्र उपाध्याय ने 1957 में इसे शुरू किया। इसे देखने के लिए शहर के लाेग अाते थे। नगर परिषद अध्यक्ष रामजीलाल आर्य व ईश्वरीलाल सैनी के जमाने तक यह परंपरा चली। नगर परिषद हाेली के माैके पर माेहल्लाें में बनी खेलाें व कुंडाें में रंग घुलवाती थी। टाउन हॉल के पीछे कुंडे में टेसू के फूलों से बने रंग से शहर की डाेलची टीमों की प्रतियोगिता होती। हाेली डाेलची से खेली जाती थी।
प्रमुख व्यक्तियों के टाइटल दिए जाते थे : पहले अलवर के प्रमुख दैनिक, साप्ताहिक व पाक्षिक पत्र होली पर अपने विशेषांक निकालते। इसमें जिले और शहर के प्रमुख अधिकारी, नेता, व्यापारी, वकील, साहित्यकार, प्रमुखजन के सालभर के कार्य व्यवहार और उनके विशेष तौर-तरीके प्रवृत्तियों का विश्लेषण कर उनके नाम के आगे टाइटल देते थे। इन टाइटलों की लंबे समय तक चर्चा हाेती थी।
-हरिशंकर गोयल, एडवोकेट
हाेली पर निकलने वाले स्वांग के कलाकाराें की अभिनय क्षमता देखकर उस जमाने के मशहूर वकील द्वारका प्रसाद भार्गव ने कलाकाराें के समक्ष रामलीला का प्रस्ताव रखा। सन् 1916 में इन कलाकाराें ने जयनारायण मुखिया, छाेटेलाल कपूर, हरिप्रसाद शास्त्री, रामजीदास के नेतृत्व में रामलीला का प्रदर्शन शुरू किया। हाेली के हास्य ने दशहरे के अध्यात्म का रूप ले लिया। पहली बार केडलगंज क्षेत्र के द्वारका भवन में रामलीला शुरू हुई। बाद में रामलीला करने वाले इन कलाकाराें ने राजर्षि अभय समाज की स्थापना की तब से रामलीला का प्रदर्शन शुरू हुअा। बाद में भर्तृहरि नाटक का प्रदर्शन भी शुरू हुअा।
1916 में शुरू हुअा रामलीला का प्रदर्शन