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  | सिनेमा की ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ हैं महिलाएं

2 वर्ष पहले
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1936 में शांताराम की फिल्म ‘दुनिया न माने’ की किशोरी का विवाह 60 वर्ष के विधुर के साथ कराया जाता है। परंतु वह अपने पति को अपने निकट नहीं आने देती। कुछ समय पूर्व प्रदर्शित ‘नाम शबाना’ की नायिका एक आतंकवादी को मार देती है। ‘कहानी’ की नायिका भी बम ब्लास्ट करने वाले की हत्या कर देती है। महेश भट्ट की ‘बेगमजान’ अपने कोठे के लिए संघर्ष करते हुए जल्दबाजी में विचारहीन लोगों द्वारा बनाई गई सरहद को अस्वीकार करते हुए अलग किस्म का जौहर करती है। ‘क्वीन’ कंगना रनोट रानी लक्ष्मीबाई अभिनीत करने से पहले पसंद के युवा से विवाह करने के लिए ‘मनु’ को तनु बनकर बताती है कि ‘रंगरेज क्यों पूछता है कि रंग का कारोबार क्या है।’ ‘पिंक’ की युवती भरी अदालत में मानती है कि उसने पसंद के युवा से अंतरंगता बनाई परंतु उसकी अनिच्छा का भी सम्मान हो।

‘डर्टी वुमन’ पुरुष पाखंड से लड़ती है। अपनी सहमति के विपरीत आयोजित विवाह उत्सव से ‘हैप्पी’ भागकर पाकिस्तान जा पहुंचती है और वहां राजनीति करने वाले परिवार को हिला देती है। ‘राजी’ की नायिका दुश्मन के भेद जानने के लिए अपना जीवन जोखिम में डालकर दुश्मन देश के युवा से विवाह करके एक हमले को विफल करती है। इसके पूर्व गौरी शिंदे द्वारा निर्देशित ‘इंग्लिश विंग्लिश’में नायिका अमेरिका में अपनी बहन की बेटी के विवाह समारोह में हाथ बंटाने आती है परंतु अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी प्राप्त करके अपने दंभी पति को चौंका देती है। पांचवें छठे दशक में बनी फिल्मों की बात करें तो ‘मदर इंडिया’ का स्मरण होता है, जिसमें एक मां अपने बेटे को गोली मार देती है जो गांव की एक कन्या को अपहरण करके भाग रहा है। राज कपूर की ‘आवारा’में नायिका की प्रेरणा से ही नायक अपराध जगत से बाहर आ पाता है। फिल्म ‘श्री 420’ की नायिका का नाम ‘विद्या’ है और खलनायिका का नाम ‘माया’ है। प्रतीकों के मामले में यह फिल्म जायसी की ‘पद्मावत’ की तरह है। ज्ञातव्य है कि अंग्रेजी साहित्य की जेन ऑस्टिन अपना उपन्यास ‘प्राइड एंड प्रिज्युडिस’ लिखने के लिए घर खर्च से बचत करके चोरी छुपे कागज खरीदती है। महिला के कष्ट पुरुष के दंभ और पूर्वग्रह से ही जन्मे हैं। टाइटल ही सब कुछ कह देता है।

एमिली ब्रोंटे कहती हैं कि महिला का कभी कोई निजी कमरा नहीं होता। कुंवारी कन्या भाई बहन के साथ कमरा शेयर करती है तथा विवाह के बाद पति का कमरा ही उसका संसार बन जाता है। इतने बड़े जहां में स्त्री का निजी कुछ नहीं है। कमरा महज प्रतीक है। मैक्सिम गोर्की कहते हैं.. ‘बंदूक से चली हर गोली अंतोगत्वा किसी महिला की छाती में ही जा धंसती है।



जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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