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उपेक्षा की शिकार पुरासंपदा, कोई नहीं ले रहा सुध

अटरू उपखंड मुख्यालय से 35 किमी दूर स्थित धूमेन गांव में पुरासंपदा जगह-जगह बिखरी पड़ी है। उत्कृष्ठ कला की नमूना इन...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 05, 2018, 02:10 AM IST

अटरू उपखंड मुख्यालय से 35 किमी दूर स्थित धूमेन गांव में पुरासंपदा जगह-जगह बिखरी पड़ी है। उत्कृष्ठ कला की नमूना इन प्राचीन प्रतिमाओं की तरफ ध्यान देने वाला कोई नहीं है। धूमेन गांव में स्थित कंकाली माता का प्राचीन मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले यहां घना जंगल था और वन्य जीव रहते थे। उस समय यहां लोगों का आवागमन कम था। इस कारण प्राचीन धरोहर सुरक्षित थी। अब वन्यजीव व जंगल खत्म होने से प्राचीन धरोहर भी समाप्त होती जा रही है। पुरा संपदा जगह-जगह बिखरी पड़ी है व क्षतिग्रस्त हो रही है। मंदिरों के पास कई शिलालेख हैं, जिन पर कुछ लिखा हुआ है, लेकिन स्पष्ट नहीं दिख पाने से पढ़ने में नहीं आता है। मंदिर की सीढ़ियां व कई शिवलिंग टूटे हुए हैं।

लापरवाही

ग्रामीणों का कहना है कि यहां पर पुरातत्व विभाग खुदाई करवाए तो सैकड़ों मूर्तियां निकलने की उम्मीद

सकतपुर. क्षेत्र के धूमेन गांव में खंडित प्राचीन प्रतिमाएं।

धूमेन पहले था धूमनगर

ग्रामीण घांसीलाल गुर्जर, मोहनदास वैष्णव, कानसिंह हाड़ा, युधिष्ठिर राठौड़ सहित कई लोगों ने बताया कि धूमेन गांव का नाम पहले धूमनगर था। उस समय यहां पर 178 प्राचीन मंदिर थे, लेकिन मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए और प्राचीन प्रतिमाएं जमीन में दब गई। कई मूर्तियों को चोर ले गए। जो मूर्तियां यहां पर बची हैं उन पर भी मूर्ति तस्करों की नजर है। धूमेन गांव में स्थित अष्टभुजा गणेश प्रतिमा आज भी गांव वालों के सहयोग से सुरक्षित है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अभी तक ऐसी गणेश प्रतिमा नहीं देखी। इस मूर्ति को ले जाने के लिए चोरों ने कई बार कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सके। ग्रामीणों का कहना है कि यहां पर अगर पुरातत्व विभाग खुदाई करवाए तो सैकड़ों मूर्तियां निकलने की उम्मीद है। पुराने मंदिरों की प्रतिमाएं आज भी जमीन में दबी हुई हैं। वहीं कई देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया है। करीब 25 वर्ष पूर्व यहां से मूर्तियों की चोरी भी हुई थी। उस समय भी प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। जिसके चलते चोरों के हौसले बढ़ते गए और प्राचीन मूर्तियों की चोरी होती रही। जो मूर्तियां बची हैं उनके सार संभाल की जरूरत है। ग्रामीणों का कहना है कि पुरातत्व विभाग के अधीन होने के बावजूद भी प्रशासन ने कोई ध्यान नहीं दिया है।

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