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दुनिया की खाद्य सुरक्षा के आड़े आते धनी देशों के हित

Dainik Bhaskar

Dec 14, 2017, 04:15 AM IST

Bali News - वर्ष 2008के बाद भारी दबाव में चल रहा विश्व व्यापार संगठन ब्यूनस आयर्स के मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भी खाद्य सुरक्षा...

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वर्ष 2008के बाद भारी दबाव में चल रहा विश्व व्यापार संगठन ब्यूनस आयर्स के मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भी खाद्य सुरक्षा के मसले पर दबाव में गया है। अगर अमेरिका ने भारत और कई विकासशील देशों की सार्वजनिक भंडारण प्रणाली पर अपना कड़ा रुख जारी रखा और खाद्य सुरक्षा के स्थायी समाधान की बजाय किसी कमतर उपाय पर जोर दिया तो चार दिनों का यह मंत्री स्तरीय सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे ही निपट जाएगा। भारत और उसके साथ खड़े डब्ल्यूटीओ के बहुसंख्यक देश चाहते हैं कि सार्वजनिक भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्य सुरक्षा पर उन प्रतिबद्धताओं का पालन किया जाए, जो 2013 में बाली में और 2015 में नैरोबी के मंत्री स्तरीय सम्मेलन में व्यक्त की गई थीं। बाली सम्मेलन में शामिल किए ‘शांति अनुच्छेद’ के तहत अगर सरकार सार्वजनिक खरीद के 10 प्रतिशत के स्थापित मानक से ज्यादा जमा करती है तो भी उस पर कार्रवाई नहीं की जाएगी। दूसरी तरफ अमेरिका को इस पर कड़ी आपत्ति है। खाद्य सुरक्षा का यह विवाद उस समय और भी बड़ा हो जाता है जब अफ्रीका के कई देश मुख्य अनाजों के साथ खाद्य के अन्य पदार्थों की खरीद की छूट मांग रहे हैं और अमेरिका जैसे देश उसे सीमित करना चाह रहे हैं। इसलिए सवाल यह भी है कि सार्वजनिक खरीद सिर्फ गेहूं और चावल की ही होनी चाहिए या दूसरे भोज्य पदार्थों की। मौजूदा विवाद में विकासशील देशों की मांग है कि धनी देश खेती की सब्सिडी घटाएं जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया चाहते हैं कि ई-कॉमर्स और निवेश सुविधा को बढ़ावा दिया जाए। विकासशील देश इसे अमीर देशों की तरफ से उठाया गया नया मुद्‌दा मानते हैं और वे इसे छोटे विक्रेताओं के विरुद्ध एमेजॉन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में उठाया गया कदम मानते हैं। भारत 2013 के खाद्य सुरक्षा अधिनियम से भी बंधा हुआ है और वह खाद्य भंडारण में होने वाले भारी खर्च के बावजूद इसकी राजनीतिक अहमियत को समझता है। यह प्रणाली सूखा, अकाल और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में नागरिकों का जीवन तो बचाती ही है विश्व व्यापार को स्थिरता प्रदान करती है। जाहिर है कि कोई भी वैश्विक प्रणाली बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय पर ही चल सकती है और अगर वह स्वजन हिताय पर जोर देगी तो वह अपने ही बोझ तले दब जाएगी।

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