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हाेलिका दहन ताे दूर उसकी लाै भी नहीं देखता विश्नाेई समाज

एक वर्ष पहले
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पेड़ व वन्यजीवों को बचाने के अपने प्राण न्यौछावर करने वाला बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण संरक्षण व आस्था के चलते होली दहन करना तो दूर उसकी लौ भी नहीं देखते हैं। होली दहन की लौ नहीं देखने के पीछे भी उनकी मान्यता है कि यह आयोजन भक्त प्रहलाद को मारने के लिए था अाैर विष्णु भगवान ने 12 करोड़ जीवों के उद्धार के लिए वचन देकर कलयुग में भगवान जांभोजी के रूप में अवतरित हुए ।

विश्नाई समाज स्वयं को प्रहलाद पंथी मानते हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा न सिर्फ पानी की बर्बादी रोकता है बल्कि पर्यावरण को बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। विश्नोई समाज प्रहलाद पंथी है इसलिए होली दहन को सूतक समय मानते हैं। होली दहन की घड़ी निकलने के बाद धुलंडी के दिन सूतक निवृत्ति के लिए सुबह यज्ञ होता है। इस दौरान बनने वाले पाहल को हर छोटे-बड़े एक संकल्प के रूप में लेते है। विश्नोई टाइगर्स वन्यजीव एवं पर्यावरण संस्था के ब्लॉक अध्यक्ष भीखाराम बताते हैं कि जांभोजी ने अपने 29 नियमों में सबसे ज्यादा जोर पर्यावरण संरक्षण पर दिया था। होली पर रंग साफ करने लिए हजारों लीटर पानी की बर्बादी होती है।

होलिका दहन के बाद प्रह्लाद के बचने पर कलश स्थापना


होली दहन से पूर्व संध्या पर होलिका जब प्रहलाद को लेकर आग में बैठती है, तभी से प्रहलाद पंथी शोक मनाते हैं विश्नोई समाज में आज भी यह परंपरा मौजूद है शाम को सूरज छिपने से पहले ही हर घर में शोक स्वरूप खिचड़ा (सादा भोजन) बनता है। सुबह खुशियां मनाई जाती हैं तब हवन पाहल ग्रहण करते हैं। ग्रंथों में ऐसा उल्लेख है प्रह्लाद की वापसी पर हवन कर कलश की स्थापना की थी । ऐसी मान्यता है, होली पर स्थापित प्रहलाद पंथ आगे चलकर हरिशचंद्र ने त्रेता युग में पुन: स्थापित किया द्वापर में युधिष्ठिर ने इसी पंथ को स्थापित किया कलयुग में विष्णु अवतार गुरु जांभोजी ने इसी पंथ को पुन: स्थापित किया।

जरूरी है होली का पाहल (कलश) करना

होलिका दहन से पूर्व जब प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठती है, तभी से शोक शुरू हो जाता है सुबह प्रहलाद के सुरक्षित लौटने व होलिका के दहन के बाद विश्नोई समाज खुशी मनाता है, लेकिन किसी पर कीचड़, गोबर, रंग नहीं डालते हैं। विश्नोई पंथ के प्रवर्तक भगवान जंभेश्वर विष्णु के अवतार हैं।

होलिका दहन को मानते हैं सूतक, रात में खाते हैं खींच

होली के अगले दिन सूतक से निवृत्ति व शुद्धि के यज्ञ किया जाता हैं। मंदिर पर संतों के सान्निध्य में 120 शब्दों के उच्चारण व प्रहलाद चरित्र के वाचन से पाहल बनाते है। होली के दिन दोपहर बाद सूतक लगने कारण लोग सूर्यास्त से पूर्व ही बाजरे के खींच बनाकर रात में खाते है। दूसरे दिन पाहल लेने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं ।
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