बांदीकुई

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सिकंदरा पहुंचने पर जैन संत का पुष्प वर्षाकर जुलूस निकाला

राष्ट्रीय संत विरागसागर महाराज ने कहा कि संसार का प्रत्येक प्राणी सुख की अभिलाषा में जीता है व कमाई करता है और...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 02:00 AM IST
राष्ट्रीय संत विरागसागर महाराज ने कहा कि संसार का प्रत्येक प्राणी सुख की अभिलाषा में जीता है व कमाई करता है और जिंदगी भर के लिए सुख शांति की कल्पना करता है। जबकि वह भूल जाता है कि जब पल का भरोसा नहीं तो कल का क्या पता।

विराग सागर महाराज ने ये उद्गार गुरुवार को जैन मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं को प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वच्छता केवल झाडू लगाने से नहीं आती बल्कि मन व हृदय को स्वच्छ रखने से आती है। उन्होंने कहा कि बेटा हो अथवा बेटी उनकी रक्षा करो तथा अच्छे संस्कार दो तभी तुम्हारा जीवन मंगल हो सकता है। इससे पहले बुधवार शाम को महाराज के सिकंदरा आगमन पर समाज के लोग बैंडबाजों के साथ महाराज सहित उनके साथ आए संतों को जुलूस के रूप में लेकर मंदिर पहुंचे। इस दौरान जैन समाज के महावीरप्रसाद जैन, पूर्व पंचायत समिति सदस्य मुकेश जैन, कमल जैन, अजीत जैन, भागचंद जैन, उत्तम जैन, महेंद्र जैन सहित अन्य मौजूद थे।

कलश यात्रा निकाली

दौसा| आलूदा ग्राम में संगीतमय भागवत कथा गुरुवार को सांवरिया जी मंदिर पर शुरू हुई। इस दौरान कलश यात्रा निकाली गई। दादू दयाल आश्रम के गायत्री मंदिर में पूजा अर्चना कर कलश यात्रा बैंडबाजे के साथ बाजार, बावड़ी वाले शिव मंदिर, मिश्र मोहल्ला होते हुए कथा स्थल पर पहुंची। कलश यात्रा का जगह जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। रामधुनी, प्रभात फेरी सत्संग मंडल की ओर से स्वागत द्वार लगाए गए। भागवत पोथी का पूजन रामबाबू शर्मा एवं आशा शर्मा ने किया। कथा वाचक राम सुमिरन दास महाराज ने कहा कि भागवत श्रवण करने मात्र से सभी पापों का नाश होता है। इस मौके पर जगदीश प्रसाद, मोहनलाल, मुकेश कामदार, बाबूलाल, प्रहलाद सोनी, जगदीश जोशी, राधेश्याम, महेश, कैलाश आदि मौजूद थे।

बांदीकुई| शहर के सिकंदरा रोड स्थित बाढ़ बच्छी का में आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत कथा को लेकर गुरुवार को गाजे बाजे के साथ कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा देवनारायण मंदिर से शुरु हुई। कलश यात्रा का कई जगह स्वागत हुआ। भागवत कथा का समापन 8 फरवरी को होगा। रोजाना सुबह 11 से शाम 4 बजे तक भागवत कथा आयोजित होगी।

सिकंदरा. जुलूस के रूप में संतों को लेकर आते जैन समाज के लोग।

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